बिजनेस स्टैंडर्ड - उभरते बाजार और निवेशकों की दृष्टि
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उभरते बाजार और निवेशकों की दृष्टि

आकाश प्रकाश /  October 21, 2018

हालिया गिरावट के बावजूद अधिकांश निवेशक भारतीय बाजारों को बहुत सस्ता नहीं मानते। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश

 
पिछले दिनों मैं अमेरिका में था जहां मैंने तमाम वैश्विक निवेशकों से मुलाकात की। इस दौरान वैश्विक बाजारों में उथलपुथल का दौर रहा। बहरहाल, यात्रा के दौरान जो जानकारीपरक बातें मेरे सामने आईं, वे इस प्रकार हैं: 
 
1. उभरते बाजारों की परिसंपत्तियां भारी संकट में हैं। अधिकांश समझदार निवेशकों ने बीते समय में अमेरिकी शेयरों से पैसा निकालकर उभरते बाजारों और गैर अमेरिकी बाजरों में निवेश किया है लेकिन यह तरीका कामयाब नहीं रहा है। निवेशकों ने इस वर्ष अमेरिकी शेयरों और उभरते बाजारों के बीच के अंतर का बहादुरीपूर्वक सामना किया है। एसऐंडपी 500 हालिया बिकवाली के बावजूद 3 फीसदी ऊपर है। जापान के अलावा शेष एशियाई बाजार डॉलर के संदर्भ में 20 फीसदी तक नीचे हैं। इस वर्ष केवल अमेरिकी शेयर और नकदी ही सकारात्मक रहे हैं। अमेरिकी शेयरों का बेहतर प्रदर्शन मई से ही जारी है। चीन में अफरातफरी का माहौल है। इसमें सबसे अधिक योगदान टेक कंपनियों का है। उभरते बाजारों में सबसे अधिक शेयर हिस्सेदारी वाली कंपनी टेंसेंट के शेयर 40 फीसदी तक गिरे हैं। आकार, आर्थिक प्रदर्शन और कंपनियों की गुणवत्ता को देखते हुए चीन का जो आकार है, वही अब उसे नुकसान पहुंचा रहा है। 
 
ज्यादा चिंता की बात यह है कि आप एक वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो देखेंगे कि पांच साल या 10 वर्ष वाली अमेरिकी प्रतिभूतियां उभरते बाजारों पर भारी हैं। परंतु यह भी सच है कि इस पोर्टफोलियो बदलाव पर अमल करने का यह सबसे कठिन समय है। इस बात की संभावना है कि कुछ परिसंपत्ति आवंटकों को उनकी समितियां इस बात के लिए मजबूर करें कि वे उभरते बाजारों में अपनी हिस्सेदारी कम करें और अमेरिका में बढ़ाएं। अल्पावधि में उभरते बाजारों के लिए संकेत अच्छे नहीं हैं।
 
2. आईएलएफएस डिफॉल्ट मामले और इसके संभावित असर को लेकर जबरदस्त रुचि देखने को मिली। अधिकांश निवेशकों को लगता था कि भारतीय वित्तीय तंत्र बेहतर नियमन वाला है। ऐसे में इस डिफॉल्ट से लोगों का चौंकना लाजिमी था। आखिर इस कंपनी को इतनी छूट क्यों दी गई? ऐसा लगता है, मानो इस मामले में नियामकीय ढील का भरपूर फायदा उठाया गया है। प्रबंधन क्या कर रहा था? कंपनी का बोर्ड क्या कर रहा था? यह संचालन की विशुद्ध नाकामी थी। रेटिंग एजेंसियों के बारे में तो जो न कहा जाए वही बेहतर। आम राय यही बनी कि सरकार द्वारा आईएलएफएस का नियंत्रण अपने हाथ में लेना ही इस संकट को आगे फैलने से रोकने का प्रमुख तरीका है। इस संकट ने कई निवेशकों के उस नजरिये की पुष्टि कर दी कि भारत में बुनियादी ढांचा क्षेत्र में पैसे बनाना बहुत मुश्किल है। देश के ग्रीनफील्ड बुनियादी ढांचे में निवेश कौन करेगा-डेवलपर या फाइनैंसर, यह आज भी लाख टके का सवाल बना हुआ है। सरकार अपने दम पर बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं कर सकती। अगर हमें बुनियादी क्षेत्र के लिए निजी निवेश नहीं मिलता है तो देश 8 फीसदी की दर से कैसे विकसित होगा? यह एक वाजिब सवाल है।
 
हर किसी को यह अंदाजा हो गया कि देश में गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (एनबीएफसी) के जश्न के दिन समाप्त हो गए हैं। मूल्यांकन का समायोजन भी समझ में आता है। नई कंपनियों के लिए काफी मुश्किल हो सकती है। वे पूंजी कहां से जुटाएंगी और किस लागत पर? अधिकांश बातें इसी सवाल के इर्दगिर्द घूम रही हैं। बीते कुछ वर्षों के दौरान देश की ऋण वृद्धि में एनबीएफसी का योगदान करीब 30 फीसदी का रहा है। अगर इसमें मंदी आती है तो घरेलू बाजार में ऋण की कमी हो जाएगी? क्या निजी बैंक इस कमी को पूरा कर पाएंगे? क्या ऋण की यह संभावित कमी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी? किसी तरह की कटौती के अलावा बैंकों को आईएलएफएस के 1300 करोड़ डॉलर के कर्ज का बोझ भी वहन करना होगा। जाहिर है घरेलू बाजार में ऋण की भारी कमी की आशंका है।
 
3. बचत के वित्तीयकरण को लेकर कुछ चिंताएं उपजी हुई हैं लेकिन अधिकांश लोगों का यही मानना है कि दुनिया के अन्य देश भी अपने-अपने ऋण बाजार में ऐसे झटकों से गुजर चुके हैं। कुल बचत के प्रतिशत के रूप में वित्तीय बचत में बढ़त जारी रहनी चाहिए। आईएलएफएस के झटके के कारण दीर्घावधि के इस रुझान में कोई बदलाव आता नहीं दिखता। सभी यह मानते हैं कि भारत में अब एक बड़ा और जीवंत घरेलू संस्थागत निवेशक आधार है। यह देश को उभरते बाजारों में बिकवाली से बचा सकता है।
 
4. यस बैंक में भी काफी रुचि देखने को मिली। इसके शेयर कई वैश्विक निवेशकों के पास है। यही वजह है कि निवेश में कई अरब डॉलर की कमी आई है। आवंटक आरबीआई के निर्णय से चकित हैं क्योंकि बैंक का प्रदर्शन बहुत अच्छा था। उन्हें लग रहा है कि पता नहीं आरबीआई को ऐसा क्या पता है जो सार्वजनिक नहीं है। 
 
5. भारत के मामले में यह बात सही है कि एक बार शीर्ष आठ शेयरों से परे जाने पर बाजार में काफी गिरावट देखने को मिलती है। मिडकैप सूचकांक 35 फीसदी नीचे हैं और स्माल कैप सूचकांक डॉलर के संदर्भ में 50 फीसदी तक नीचे हैं। इसके बावजूद अधिकांश लोग यह नहीं सोचते कि व्यापक बाजार में शेयर अभी भी कम दर पर हैं। अवसर तो हैं लेकिन यह वर्ष 2013 नहीं है जब सब कुछ एकदम सस्ता था। हालांकि गुणवत्तापूर्ण शेयर फिर भी महंगे थे। हर कोई आय का इंतजार कर रहा था। भारतीय बाजार के विस्तार का दौर समाप्त हो चुका है। बाजार के भविष्य का निर्धारण अब आय वृद्धि से ही होगा। बीते पांच वर्ष में भारतीय कॉर्पोरेट आय ने मोटे तौर पर निराश किया है। यह सात फीसदी से कम रही है। जरूरत इस बात की है कि हम दो अंकों की मजबूत वृद्धि हासिल कर लें। आय में इस कमजोरी को लेकर भी काफी भ्रम रहा है लेकिन क्या कोई मूलभूत बदलाव आया है?
 
6. अमेरिका और चीन के बीच छिड़े कारोबारी युद्ध को लेकर भी चिंता का माहौल था। अधिकांश लोगों को लगा कि इसका संबंध कारोबार से नहीं है और दोनों देशों के बीच भूराजनैतिक तनाव है। यह जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था में यकीनन धीमापन आएगा। उभरते बाजारों के नजरिये से देखा जाए तो सबसे बड़ी चिंता है चीनी मुद्रा का अवमूल्यन। अधिकांश लोगों को लगा कि रुपये का समायोजन हो चुका है लेकिन अगर रेनमिनबी में गिरावट आई तो उसका असर अन्य उभरती मुद्राओं पर भी होगा।
 
7. भारतीय राजनीति को लेकर कोई खास बातचीत नहीं हुई। अधिकांश लोगों को लगता है कि भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी दोबारा चुनाव जीतेंगे। ज्यादातर को कोई विकल्प नजर नहीं आता।
Keyword: india, america, trade, economy,,
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