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बुरा विचार

संपादकीय /  October 21, 2018

ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार देश में भुगतान व्यवस्था के नियमन के विषय पर टकराव की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। समस्या की शुरुआत पिछले महीने हुई जब सरकार द्वारा मौजूदा भुगतान एवं निस्तारण व्यवस्था अधिनियम, 2007 में संशोधन करने के लिए गठित अंतरमंत्रालयीन समिति ने नए अधिनियम का प्रस्ताव रखा। समिति की अध्यक्षता वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभागीय सचिव को सौंपी गई थी लेकिन इसमें आरबीआई का भी प्रतिनिधित्व था। समिति के मुताबिक सरकार को मौजूदा कानून में संशोधन के बजाय एक नया कानून लाना चाहिए। अब तक जहां आरबीआई इसका प्रभारी है, वहीं अनुशंसा में कहा गया है कि भुगतान तंत्र के लिए एक अलग नियामक बनाना चाहिए। समिति का मानना था कि सरकार को आरबीआई के साथ मशविरा कर नया नियामक नियुक्त करना चाहिए। आरबीआई ने समिति की अनुशंसाओं से तीखी असहमति जताई और 19 अक्टूबर को इस मामले पर अपनी असहमति का पत्र भी जारी किया। ऐसी तमाम वजहें हैं जिनके चलते कई लोगों को लगा कि एक स्वतंत्र भुगतान नियामक की जरूरत है। उदाहरण के लिए यह एक नया क्षेत्र है जहां तकनीक की बदौलत तेजी से बदलाव आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में विषय विशेषज्ञों की आवश्यकता है जो स्वतंत्र रूप से काम कर सकें क्योंकि आरबीआई के मौजूदा ढांचे के अधीन काम करना नवाचार और प्रतिस्पर्धा को रोक सकता है।

 
आरबीआई के पास पहले ही ढेर सारा नियामकीय बोझ है और इसे लेकर चिंता जताई जा रही हैं कि वह इस नए उभरते क्षेत्र के लिए त्वरित नियामकीय हल सुझा पाएगा या नहीं। हालांकि आरबीआई ने अपने असहमति पत्र में इन तमाम शंकाओं का ठोस उत्तर दिया है। सरकार और आरबीआई के बीच विवाद का असल मुद्दा भुगतान नियामक के नेतृत्व का है। इसका उत्तर देते हुए आरबीआई ने सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा है कि भुगतान तंत्र के कामकाज को लेकर कोई कुछ भी सोचे लेकिन नियमन का काम तो आरबीआई के हाथ में ही होना चाहिए। उसने कहा है कि भुगतान मुद्रा से जुड़ा मसला है जो आरबीआई द्वारा नियमित होता है। इसी तरह हर भुगतान तंत्र का एक बैंक खाता होता है। उसका नियमन भी बैंकिंग नियामक करता है। तथ्य यह है कि देश में कई भुगतान तंत्रों पर बैंकों का दबदबा है और आरबीआई का नियमन शायद उनके लिए अधिक सुसंगत होगा। बल्कि आरबीआई से विनियमन न कराने से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए निस्तारण बैंक खातों में किया जाता है और इस पर अंतिम मुहर आरबीआई की होती है। ऐसे में दो नियामक होना यकीनन थोड़ा विचित्र परिस्थितियां उत्पन्न कर देगा। कार्ड से होने वाले भुगतान को लेकर भी ऐसा ही संकट होगा क्योंकि कार्ड बैंक जारी करते हैं जबकि वे भी दोहरे नियमन के अधीन आ सकते हैं। 
 
चूंकि भुगतान तंत्र का कामकाज शेष बैंकिंग और व्यापक मौद्रिक तंत्र के साथ घुला-मिला है। इसलिए अलग नियामक की नियुक्ति उलट प्रभाव वाली हो सकती है। नियमन और भुगतान सेवाओं की जवाबदेही को एक नए नियामक को सौंपना जोखिम भरा भी हो सकता है जबकि आरबीआई का रिकॉर्ड बेहतरीन रहा है।  इस बहस को हल करने की कुंजी यह समझने में निहित है कि भुगतान तंत्र को एकीकृत नियमन की आवश्यकता है न कि समन्वित नियमन की। आरबीआई को इस प्रक्रिया से बाहर रखना अंतरराष्ट्रीय मानक व्यवहार का भी उल्लंघन होगा। इसके बजाय अगर सरकार अभी भी चाहती है कि भुगतान नियामक बोर्ड में उसके नामित सदस्य हों तो आरबीआई ने उनको शामिल करने की इच्छा दिखाई है बशर्ते कि पूरा नेतृत्व आरबीआई के हाथ में रहे। बेहतर होगा कि सरकार अलग नियामक पर जोर देना छोड़ कर आरबीआई के साथ मतभेद समाप्त करे।
Keyword: RBI, payment, bank,,
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