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अमेरिकी प्रतिबंध : ईरानी तेल आयात पर भारत की परेशानी

शाइन जैकब / नई दिल्ली October 21, 2018

भारत ईरान पर चार नवंबर से शुरू हो रहे अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के रास्ते तलाश रहा है ताकि तेहरान से तेल खरीदना जारी रख सके।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में पश्चिम एशियाई देशों के तेल मंत्रियों से अपील की कि वे भारत के लिए तेल की कीमत रुपये के संदर्भ में तय करने पर विचार करें। इससे साफ है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमत से भारत की समस्या बढ़ती जा रही है।  भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 फीसदी से अधिक आयात करता है लेकिन उसे तेल की बढ़ती कीमत और रुपये की गिरती कीमत की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन केवल इन्हीं वजहों से देश में तेल आयात का बिल नहीं बढ़ रहा है। ईरान से तेल की आपूर्ति भी दांव पर लगी है। इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। वह भी 90 दिन के मानक के बजाय 30 दिन की क्रेडिट ही देता है। 
 
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में हुए ईरान परमाणु सौदे से बाहर होने की घोषणा करने के बाद तेहरान पर फिर से कुछ प्रतिबंध लगा दिए थे। इससे ईरान से तेल आयात करना विवादास्पद मुद्दा बन गया है। विदेशी मुद्रा भुगतान एक अंतरराष्ट्रीय निपटान व्यवस्था के जरिये होता है जिस पर अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का दबदबा है। इसलिए अमेरिका के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।  अहम सवाल यह है कि क्या भारत को अमेरिका से उस तरह की विशेष छूट मिलेगी जैसी कुछ एशियाई खरीदार उम्मीद कर रहे हैं। या भारत ट्रंप के फरमान को खारिज कर देगा? पिछले हफ्ते पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर आगे बढ़ेगा लेकिन यह कहना आसान है। इससे मेंगलौर रिफाइनरी ऐंड पेट्रोकेमिकल्स (एमआरपीएल), इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) जैसी सरकारी कंपनियों और नयारा एनर्जी (पहले एस्सार ऑयल) जैसी निजी कंपनियों में अफरातफरी की स्थिति है। नयारा एनर्जी का 40 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आता है। 
 
ईरानी तेल पर चार नवंबर से प्रतिबंध लागू होने की आशंका है। इसे देखते हुए तेल कंपनियां अपना भंडार बढ़ाने में लगी हुई हैं। सितंबर में भारत ने ईरान से रोजाना 528,000 बैरल कच्चे तेल का आयात किया जो अगस्त से एक फीसदी ज्यादा और पिछले साल सितंबर की तुलना में 27 फीसदी अधिक है।  प्रधान ने कहा, 'हम नहीं जानते हैं कि हमें छूट मिलेगी या नहीं। हालांकि नवंबर में ईरान से तेल आयात करने के लिए दो कंपनियों को नामित किया गया है।' इनमें आईओसी और एमआरपीएल शामिल है। इन दो कंपनियों ने नंवबर में करीब 12.5 लाख टन तेल आयात का ऑर्डर दिया है। भारत का कहना है कि वह दिसंबर में भी तेल खरीद के अपने वादे को पूरा करेगा। 
 
सूत्रों के मुताबिक भारत ने अमेरिका को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है लेकिन उसे अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है। एक सूत्र ने कहा, 'भारत ने अमेरिका से कहा है कि इससे उसके चालू खाता और राजकोषीय घाटा प्रभावित हो सकता है क्योंकि भारतीय आयात में स्वीट ग्रेड ब्रेंट क्रूड की करीब 28 फीसदी हिस्सेदारी है।' विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ एशियाई देश चार नवंबर तक अमेरिकी छूट की उम्मीद कर रहे हैं। भारत में डेलॉयट टच तोमात्सू के पार्टनर देवाशिष मिश्रा ने कहा कि इस बात के संकेत हैं कि अमेरिका बीपी और सेरिका जैसी कुछ उत्पादक कंपनियों और कुछ एशियाई खरीदारों को कुछ समय के लिए छूट देगा ताकि वे वैकल्पिक इंतजाम कर सकें।
 
सितंबर में ही प्रतिबंधों से संबंधित समस्याओं के संकेत दिखने शुरू हो गए थे। पिछले महीने आई कच्चे तेल की अधिकांश खेप वास्तव में अगस्त के लिए थी जो इसलिए अटक गई थी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों ने ईरानी कच्चे तेल का बीमा करने से हाथ खड़े कर दिए थे। ईरान के बीमा मुहैया कराने के बाद ही इसे जारी किया गया। आने वाले दिनों में भी भुगतान और बीमा की समस्या बनी रहेगी। पिछले प्रतिबंधों के दौरान दोनों देशों ने सरकारी यूको बैंक के जरिये रुपये में भुगतान के लिए करार किया था। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि कोलकाता के यूको बैंक का अमेरिका के साथ कोई लेनदेन नहीं था। लेकिन अब यह रास्ता बंद हो गया है क्योंकि यूको बैंक ने अमेरिका में कुछ कारोबार किया है। सरकार ईरान के निजी बैंक पसरगड के जरिये रुपये में भुगतान के विकल्प पर भी विचार कर रही है जिसकी पहले से ही मुंबई में एक शाखा है। 
 
आईओसी के चेयरमैन संजीव सिंह ने कहा कि ईरान अपने भुगतान का कुछ हिस्सा रुपये में स्वीकार कर रहा है। हालांकि उन्होंने इसके अनुपात का खुलासा नहीं किया। उन्होंने कहा, 'देखते हैं बात कैसे आगे बढ़ती है।' अगर प्रतिबंधों के दौर में भारत ईरान से आयात जारी रखता है तो वह फ्री ऑन बोर्ड (एफओबी) के बजाय फिर से लागत, बीमा और मालवहन (सीआईएफ) मॉडल अपना सकता है। सीआईएफ मॉडल के तहत विक्रेता (इस मामले में ईरानी कंपनी) लागत वहन करता है और बीमा शुल्क सहित मालवहन का भुगतान करता है। एफओबी मॉडल में खरीदार जहाज की सेवाएं लेता है और आयात आदि का खर्च उठाता है।
 
भारत और ईरान के बीच हुए करार के मुताबिक भारतीय तेलशोधक कंपनियों को इस वित्त वर्ष के दौरान ईरान से 2.1 करोड़ टन तेल का आयात करना था। अगर भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करना पड़ा तो उसे हाजिर बाजार से कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है या वह पश्चिम एशियाई देशों से अतिरिक्त आपूर्ति का विकल्प तलाश करना पड़ सकता है। दोनों ही विकल्प बहुत महंगे होंगे। अमेरिका में वॉशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार और अमेरिकी नागरिक जमाल खशोगी की हत्या के विरोध में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ हथियारों का बड़ा सौदा रद्द करने की धमकी दी है। अगर ऐसा होता है तो भारत के लिए इसके गहरे परिणाम होंगे। दुनिया में 10 फीसदी कच्चे तेल की मांग सऊदी अरब से पूरी होती है। उसने धमकी दी है कि अगर अमेरिका उसके खिलाफ कार्रवाई करता है तो फिर वह तेल की कीमत तिहरे अंकों में पहुंचा देगा।
 
ईरान के साथ संबंधों बनाए रखने की मुख्य वजह यह है कि भारत को बढ़ती अर्थव्यवस्था की ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए तेहरान की जरूरत है। दोनों देशों के बीच सालाना 13 अरब डॉलर का द्विपक्षीय कारोबार होता है जिसमें नौ अरब डॉलर भारत के कच्चे तेल के आयात का बिल है। लेकिन दोनों देशों के मजबूत ऐतिहासिक संबंध भी हैं। तेलशोधन के क्षेत्र में भारत के महाशक्ति बनने में ईरान ने अहम भूमिका निभाई थी। 1947 में बर्मा शेल, स्टैंडर्ड वेक्यूम या कॉलटैक्स में से किसी भी पश्चिमी तेल कंपनी ने भारत में तेलशोधक कारखाना लगाने के भारत सरकार के अनुरोध को नहीं माना। 1960 के दशक में ईरान ने मद्रास रिफाइनरीज (अब चेन्नई पेट्रोलियम कॉरपोरेशन) की स्थापना में भारत की मदद की। इस पुराने दोस्त के साथ भारत के संबंध अब ट्रंप के रुख पर निर्भर हैं।
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