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रिटेल एनबीएफसी को चाहिए इक्विटी पूंजी

कृष्ण कांत / मुंबई October 21, 2018

नकदी के सख्त हालात और रकम जुटाना महंगा होने के चलते रिटेल गैर-बैंक लेनदारों को अपनी बढ़त की रफ्तार बनाए रखने के लिए अतिरिक्त इक्विटी पूंजी जुटानी होगी। उद्योग का औसत बैलेंस शीट लिवरेज अनुपात वित्त वर्ष 2018 में उछलकर 10 साल के उच्चस्तर 6.3 गुने पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 5.9 गुना और वित्त वर्ष 2010 में 4.1 गुना रहा था। इसकी तुलना में उद्योग की दिग्गज और मौजूदा संकट में कम से कम प्रभावित लेनदार एचडीएफसी का कर्ज-इक्विटी अनुपात पिछले वित्त वर्ष में सिर्फ 3.9 गुना रहा।कुल मिलाकर पांच गैर-बैंक रिटेल लेनदारों का कर्ज-इक्विटी अनुपात पिछले वित्त वर्ष में 10 या इससे ज्यादा रहा और अन्य तीन का लिवरेज अनुपात 8 से 10 के बीच रहा। विश्लेषकों ने कहा, ये चीजें उन्हें बॉन्ड व वाणिज्यिक प्रतिभूतियों के बाजार में होने वाले उतारचढ़ाव के प्रति क्षणभंगूर बनाती है। इन आंकड़ों में उद्योग के दो सबसे बड़े गैर-बैंक लेनदार हाउसिंग डेवलपमेंट ऐंड फाइनैंस कॉरपोरेशन और बजाज फाइनैंस शामिल नहीं हैं। दोनों कंपनियों का कर्ज-इक्विटी अनुपात वित्त वर्ष 2018 के दौरान औसतन 3.9 गुना रहा। इनके आंकड़ों को शामिल करने के बाद उद्योग का लिवरेज अनुपात पिछले वित्त वर्ष में घटकर 4.9 गुने के सम्मानजनक स्तर पर आ जाता है, जो आठ साल का निचला स्तर है। पिछले वित्त वर्ष में एचडीएफसी ने करीब 125 अरब रुपये की नई पूंजी जुटाई, वहीं बजाज फाइनैंस ने करीब 45 अरब रुपये जुटाए, जो इन्हें बॉन्ड बाजार की मौजूदा मुश्किलों से मोटे तौर पर प्रतिरक्षित बनाता है।
 
यह विश्लेषण 23 सूचीबद्ध खुदरा गैर-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों (एनबीएफसी) की वित्तीय स्थिति पर आधारित है, जो बीएसई 500 इंडेक्स का हिस्सा हैं। इस नमूने में शामिल अहम एनबीएफसी हैं एचडीएफसी, बजाज फाइनैंस, एलआईसी हाउसिंग फाइनैंस, जीआईसी हाउसिंग, इंडियाबुल्स हाउसिंग, पीएनबी हाउसिंग और केन फिन होम्स। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख धनंजय सिन्हा ने कहा, कुछ महीने पहले तक नकदी की स्थिति ठीक थी और खुदरा एनबीएफसी की प्रतिभूतियों की अच्छी मांग (खास तौर से म्युचुअल फंडों की तरफ से) थी। इसे देखते हुए लेनदारों को अपनी बैलेंस शीट में बढ़ोतरी को लेकर किसी तरह की आशंका नहीं थी और इनकी बढ़त की तेज रफ्तार जारी थी।
 
विश्लेषकों ने कहा कि इक्विटी के जरिए पूंजी जुटाने के लिए इक्विटी की बिक्री अपरिहार्य हो जाती है, जो मौजूदा इक्विटी निवेशकों के तेवर पर निर्भर है क्योंंकि इससे कंपनियों की भविष्य की प्रति शेयर आय और प्रति शेयर लाभांश पर असर पड़ता है। उदाहरण के लिए अतिरिक्त इक्विटी पूंजी (बचाकर रखी गई आय समेत) की हिस्सेदारी का योगदान पिछले तीन साल (वित्त वर्ष 2015-18 के बीच)में उद्योग की अतिरिक्त परिसंपत्तियों की बढ़त में महज 10 फीसदी रहा। इसकी तुलना में अतिरिक्त उधारी  की हिस्सेदारी उद्योग के कर्ज में हुई अतिरिक्त बढ़ोतरी में करीब तीन चौथाई रही। कर्ज बाजार पर निर्भरता के जरिए अपनी बढ़त की रफ्तार बनाए रखने की उद्योग की क्षमता को लेकर विशेषज्ञ संदेह जता रहे हैं। इक्रा के प्रमुख (वित्तीय क्षेत्र की रेटिंग) कार्तिक श्रीनिवासन ने कहा, सख्त नकदी के हालात और ब्याज दरों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के चलते थोक फंडिंग एनबीएफसी के लिए अब एक मसला बन गया है। गैर-बैंक लेनदारों को अब या तो अपने लोनबुक की बढ़त की रफ्तार पर चोट झेलनी होगी या अपने कारोबार की रफ्तार बनाए रखने के लिए नई इक्विटी जुटानी होगी।  उनके मुताबिक, वैसी हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों के लिए फंड की जरूरत सबसे ज्यादा होगी, जिनका कर्ज-इक्विटी अनुपात उद्योग में सबसे ज्यादा है। 
Keyword: NBFC, retail, share,,
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