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अदालती हस्तक्षेप के अनचाहे परिणाम

शेखर गुप्ता /  October 19, 2018

केरल के हिंदुत्ववादी नेता या तो मूर्ख हैं या फिर उनके पास दुष्टïता से पूर्ण हास्यबोध है। वरना वे सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश का विरोध क्यों करते जिसमें उसने सभी महिलाओं (10 से 50 वर्ष तक रजस्वला उम्र समेत) को भगवान अयप्पा के सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाजत देने को कहा है।

अयप्पा, भगवान शिव और मोहिनी के पुत्र हैं। मोहिनी को भगवान विष्णु का स्त्री रूप माना जाता है। खैर विरोध करने के बजाय उन्हें न्यायाधीशों को गुलदस्ते भिजवाने थे और आशीष देना था। इसलिए कि सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिक पीठ का 4-1 से दिया गया निर्णय चाहे जितना सदिच्छापूर्ण रहा हो, इसने हिंदुत्व को वह दिया जो आरएसएस-जनसंघ-भाजपा नेताओं की दो पीढिय़ां दे पाने में नाकाम रही हैं: केरल में आधार तैयार करने की राजनीतिक वजह।

हिंदुत्ववादियों के लिए केरल फतह इसलिए भी अहम है क्योंकि यह आखिरी किला है। तमिलनाडु में दोनों प्रमुख दल द्रमुक या एआईडीएमके, भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं। केवल केरल ही ऐसा राज्य है जहां दोनों प्रतिद्वंद्वी गठबंधन माकपा का एलडीएफ और कांग्रेस का यूडीएफ, भाजपा से समान दूरी बरतते हैं।

आरएसएस वहां अपने पांव जमाने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसके कार्यकर्ता वाम कार्यकर्ताओं के साथ खूनी संघर्ष से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद तिरुवनंतपुरम में शशि थरूर को चौंकाने के अलावा पार्टी हिंदू वोट जुटाने में नाकाम रही। अदालत के आदेश ने केरल और आरएसएस तथा भाजपा को हिंदू भावनाओं का मुद्दा थमा दिया है।

क्या वे इसके बल पर अपना आधार बना सकेंगे? केरल की विशिष्टï राजनीति के बारे में जानने के लिए आपको लोगों से बात करनी होगी। आप देख सकते हैं कि हिंदुत्ववादी ताकतों को इससे जगह बनाने का अवसर मिला है। आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठन सबरीमला विरोध के लिए केवल केरल नहीं बल्कि समूचे क्षेत्र से महिला कामगारों को जुटा रहे हैं।

संस्कृतनिष्ठ हिंदी बोलने वाली महिलाओं को देखते ही अंदाजा लग जाता है कि वे आरएसएस से प्रशिक्षित हैं। अब वे केरल में हैं और हों भी क्यों न? आखिर राजनीति और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को केवल वाम और उससे अधिक वाम तक सीमित तो नहीं रखा जा सकता। सबरीमला एक सबक है कि कैसे ताकतवर संस्थानों के हस्तक्षेप से अनचाहे परिणाम सामने आ सकते हैं। आस्था के मामलों पर कानून और संविधान के सिद्घांतों का यंू लागू किया जाना कितना तार्किक है, यह एक कठिन प्रश्न है। 

क्या दैवीय अवतारों का विचार तार्किक है? या फिर क्या एक ही ईश्वर के अनेक रूप होने की बात? यह मामला इतना जटिल हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया टीम तक ने काली को देवी दुर्गा बता दिया। क्या आप कोई ऐसा शोधपत्र प्रस्तुत कर सकते हैं जिसमें किसी दैवीय चरित्र के अनेक रूपों के विचार का समर्थन किया गया हो? या फिर इस बात का कि अयप्पा भगवान शिव और मोहिनी के मिलन से पैदा हुए जो विष्णु का स्त्री रूप थीं?

क्या कोई अदालत इस बात के प्रमाण मांग सकती है कि पवित्र कुरान पैगंबर से कहे गए अल्लाह के शब्दों की किताब है? क्या तमाम जनजातीय आस्थाओं, सूर्य और चंद्र की उपासना या बलिप्रथा को लेकर ऐसे प्रमाण मांगे या जुटाए जा सकते हैं? 

भारतीय समाज जटिल है जहां असंख्य आस्थाएं, विश्वास और रिवाज सहअस्तित्व में हैं। यहां किसी पेड़ या चट्टान पर भगवा रंग या थोड़ा सा चूना पोत देने भर से बड़ी तादाद में लोग वहां पूजा अर्चना शुरू कर देते हैं। यही बात पुरानी परित्यक्त कब्रों पर लागू होती है। क्या अदालतें इनसे जुड़े मसलों की भी सुनवाई करेगी?

क्या कोई ईसाई महिला सर्वोच्च न्यायालय से कह सकती है कि वह कैथलिक मत में महिलाओं को समान अधिकार और पादरी बनने का हक दिलाए? क्या ईसाई पादरियों के चयन के लिए यूपीएससी जैसी संस्था बनाई जा सकती है? क्या एक हिंदू महिला न्यायाधीशों से कह सकती है कि वह आरएसएस को आदेश दे कि महिलाओं को संस्था में उच्च पदों पर आसीन किया जाए? आरएसएस प्रमुख के पद पर किसी महिला को देखना बहुत प्रीतिकर होगा। कौन जाने किसी दिन ऐसा हो भी जाए लेकिन यकीन जानिए अदालत के आदेश पर ऐसा नहीं होगा।

हमारे शांतिपूर्ण सहअस्तित्त्व की एक बड़ी वजह यह है कि हम भारतीय अपने पड़ोसियों का साथ देते हैं और बतौर एक देश हम आस्था जैसे मामलों में दखल नहीं देते। हिंदू कोड बिलों को लेकर बहुत बहस हुई और अभी भी यह विवादित मुद्दा है। मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं कि हिंदू पर्सनल लॉ और रीति रिवाजों में पंडित जवाहरलाल नेहरू जो सुधार संसदीय बहस और बहुमत के साथ ले आए, वह सर्वोच्च न्यायालय का बेहतर से बेहतर पीठ भी नहीं ला सकता था। 

शाहबानो प्रकरण पर निर्णय को संसद ने बदल दिया। उसी अदालत ने अब तीन तलाक को अवैध करार दिया है और चूंकि सत्ताधारी दल की राजनीति अलग है। इसलिए वह इसे अपराध ठहराने पर लगी है। क्या आप वास्तव में देख पा रहे हैं कि कैसे पुलिस आम घरों में जाकर लोगों की धरपकड़ करेगी और उन पर अभियेाजन चलाएगी? इससे पहले ही असुरक्षित महसूस कर रहे समुदाय में एक तरह की अफरातफरी पैदा होगी।

तीन तलाक निश्चित रूप से एक मध्ययुगीन विचार है। कई इस्लामिक देशों और समाजों तक ने इसे त्याग दिया है। भारतीय मुस्लिमों को भी यही करना चाहिए लेकिन यह सुधार आंतरिक होना चाहिए किसी पुलिसिया या अदालती जोर से नहीं। सबरीमला पर अदालत के आदेश की वजह हम समझते हैं।

यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मसला है। आप किसी महिला को अपने प्रिय देवता की पूजा करने से केवल इसलिए नहीं रोक सकते कि वह मां बनने की उम्र की है और अपनी यौनिकता से कुंवारे देवता को आकृष्टï कर सकती है। आप समानता के नाम पर फैसला दे देते हैं। तमाम संपादकीय और टीवी के प्राइमटाइम पर आपकी तारीफ होती है और इस बीच मुद्दों की बाट जोह रहे सामाजिक कार्यकर्ता अगले मुद्दे की ओर बढ़ जाते हैं। 

क्या अदालतों के लागू न होने वाले निर्णयों को लेकर कोई शोधपत्र या सार्वजनिक बहस है? दोपहिया वाहन पर चलने वाली महिलाओं के लिए हेलमेट अनिवार्य करने का आदेश अदालत बार-बार देती रही है। सिखों के विरोध की बात कहकर इसे भी नकार दिया गया। हालांकि तमाम समझदार सिख महिलाएं हेलमेट पहन रही हैं और कोई भीड़ उनको नहीं रोक रही।

अभिनेत्री गुल पनाग जिन्हें बाइक चलाना बेहद पसंद है, उन्हें आप हमेशा हेलमेट में पाएंगे। उनको इसके लिए किसी अदालती आदेश की जरूरत नहीं। वह रुढि़वादी रोकटोक की चिंता भी नहीं करतीं। बड़ी संख्या में सिख महिलाएं इसे अपना रही हैं, वह भी बिना किसी अनिवार्यता के। 

अब अदालत कुछ मुस्लिम समुदायों में महिलाओं के खतने के मुद्दे से निपट रही है। उसने इसे गैरकानूनी करार दिया है लेकिन क्या इस आदेश का पालन हो पाएगा? मैं कह सकता हूं कि भाजपा शासित महाराष्ट्र और गुजरात में, जहां ऐसे पंथ के लोग रहते हैं, वहां भी सरकार पुलिस को ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं करने देगी।

राजनेता अक्सर न्यायाधीशों से अधिक समझदार होते हैं। मोदी और उनकी सरकार तीन तलाक के मुद्दे पर खासे उत्तेजित हैं लेकिन महिलाओं के खतने के विषय में एकदम चुप। मोदी बोहरा सैयदना समुदाय और उनके धर्मगुरु के साथ नजर आते हैं। याद रहे कि सर्वोच्च न्यायालय ने बनारस के एक कब्रिस्तान को लेकर शिया-सुन्नी समुदाय के 40 वर्ष पुराने विवाद पर स्थगन आदेश दे दिया क्योंकि राज्य सरकार ने कहा कि इसका क्रियान्वयन नहीं हो सकता। किसी भी विवादित मुद्दे पर अगर सही दिखने की कोशिश से इतर कोई भी राय रखने का प्रयास किया जाए तो उसे गलत समझे जाने का जोखिम रहता है। क्या महिलाओं को सबरीमला में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए? मेरा जवाब है कि उन्हें बिल्कुल इसकी इजाजत मिलनी चाहिए। क्या सिख महिलाओं को बिना हेलमेट के बाइक पर चलने देना चाहिए।

मेरा जवाब है कतई नहीं। तीन तलाक पर मेरा मामला है कि यह मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय है और महिलाओं का खतना घृणित। ये सब समाप्त होना चाहिए लेकिन यह काम राजनीतिक और सामाजिक सुधारकों को करने देना चाहिए। क्या इसे न्यायिक हस्तक्षेप से हल किया जा सकता है? मैं इससे इनकार करता हूं क्योंकि इसके अनचाहे परिणाम सामने आएंगे। केरल में अदालत ने तो एक बेहतर दुनिया बनाने के क्रम में फैसला दिया लेकिन वहां भाजपा को मुद्दा मिल गया। यह मुद्दा राजनीतिक के साथ नैतिक और आध्यात्मिक भी है।

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