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'मी टू' से 'देम टू' की तरफ भी बढ़े यह अभियान

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  October 18, 2018

कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए बने कानूनों की सीमाएं पिछले दो हफ्तों में उजागर हो गई हैं। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के 'मी टू' खुलासों ने मीडिया और मनोरंजन जगत की महिलाओं में ऐसे ही आरोप लगाने से उपजे तूफान को दस्तक दे दी। इनमें से कुछ आरोप तो नब्बे के दशक से भी संबंधित हैं लेकिन इन्हें पुराने मामले बताकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इन मामलों के पुराने होने से उन पर कुछ सीमाएं भी लग जाती हैं जो इस समाज की ही बनाई हुई हैं। महिलाएं उस समय खुलकर बोल नहीं सकीं और अगर उन्होंने ऐसा किया तो समाज ने न तो उन पर यकीन किया और न ही ध्यान दिया। 21वीं सदी के दूसरे दशक के अंत में महिलाओं को इस अधिकार से वंचित करना गलत होगा। 

 
लेकिन विशाखा मामले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ रोकने के लिए बनाया गया कानून भी इस पहलू पर चुप्पी साधे हुए है। हालांकि इसकी वजह यह है कि जब नब्बे के दशक के अंतिम दौर में यौन उत्पीडऩ से संबंधित दिशानिर्देश पहली बार जारी किए गए थे तब यह परिप्रेक्ष्य मौजूद भी नहीं था। हालिया घटनाक्रम के आलोक में इन प्रावधानों पर पुनर्विचार करना महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के लिए उपयोगी कार्य हो सकता है। मेनका ने कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों को सशक्त करने के लिए अपनी आवाज बुलंद की है।
 
समय की बाधा इस चुनौती का महज एक पहलू है। दूसरा पहलू हमें बॉलीवुड में लगे आरोपों में देखने को मिल चुका है। यह पहलू संस्थागत ढांचों के बाहर काम कर रहे क्षेत्रों में महिलाओं की दुर्दशा से जुड़ा हुआ है। मीटू अभियान के तहत आवाज बुलंद करने वाले फिल्मी लोगों में अधिकतर अभिनेत्रियां ही हैं। उनकी शिकायतों को देखते हुए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि डांसर, वेशभूषा सहायक, मेकअप आर्टिस्ट और अन्य काम करने वाली महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिलता है। यही दलील निर्माण स्थलों पर काम करने वाली महिलाओं, घरेलू नौकरानियों, खुदरा एवं आतिथ्य क्षेत्र, कृषि और तमाम गैर-संगठित क्षेत्रों में सक्रिय महिलाओं पर भी लागू होती है।
 
विशाखा मामले में आए फैसले में कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत निवारण समिति का गठन अनिवार्य कर दिया गया था लेकिन उसमें भी इस बिंदु से सही तरीके से नहीं निपटा गया है। इस कानून के तहत भारत में हरेक जिले में स्थानीय शिकायत समिति जरूरी है। संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने यहां स्थानीय शिकायत समितियां बना दी हैं। मेनका गांधी ने यौन उत्पीडऩ से संबंधित ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करने के लिए 'शी' बॉक्स की भी शुरुआत की है।
 
सुनने में यह बढिय़ा लग सकता है। लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया इतनी टेढ़ी है कि वह बेअसर ही हो जाती है। एक बुनियादी समस्या यह है कि कम कामकाजी महिलाएं ही इन समितियों की मौजूदगी और उनसे संपर्क साधने के तरीके के बारे में जानती हैं। हालत यह है कि एक कानूनी फर्म ने इन समितियों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए आरटीआई आवेदन की सलाह दे दी। इससे यौन उत्पीडऩ रोकने का मकसद ही धरा रह जाता है। समस्या का एक हिस्सा यह है कि संस्थागत शिकायत समितियों और जिला स्तर की समितियों के लिए निर्धारित प्रक्रिया एक जैसी है। किसी दफ्तर के भीतर की शिकायतों के निपटारे में निर्धारित प्रक्रिया का कारगर हो पाना संभव है। लेकिन जिला स्तर की समिति बहुत कम कारगर हो पाती है। खासकर जब आरोपी उसके सामने उपस्थित होने से मना कर देता है या शिकायत में किसी राजनीतिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति का नाम शामिल हो।
 
मेरी राय में बड़ी मुश्किल यह है कि स्थानीय शिकायत समितियों के निर्णयों को लागू कराने का दायित्व जिलाधिकारी पर ही होता है। इस पद का चरित्र असल में अद्र्ध-राजनीतिक होने से बारंबार होने वाले स्थानांतरण सजा की तरह ही होते हैं। इस वजह से स्थानीय शिकायत समितियों को राजनीतिक दखल से बचाने के लिए दूसरा तरीका तलाशना होगा। एक हद तक सक्षम साबित हो रहीं उपभोक्ता अदालतों की तर्ज पर इन मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक  अदालतें बनाई जा सकती हैं। लेकिन फिलहाल इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है क्योंकि कानून ने दीवानी अदालतों के अधिकारों से लैस आंतरिक शिकायत समितियों को कार्रवाई का अधिकार दिया हुआ है। आखिरकार, उफान के इस दौर में एक कलंक को न्योता देने की कीमत पर भी मैं यह सुझाव देती हूं कि यौन उत्पीडऩ कानून लैंगिक रूप से तटस्थ होना चाहिए। भले ही यौन उत्पीडऩ के मुख्य पीडि़त महिलाएं ही होती हैं लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका में शुरू हुए मीटू अभियान के दौरान कुछ पुरुषों ने भी दूसरे पुरुषों के खिलाफ यौन शोषण के आरोप लगाए थे। 'हाउस ऑफ काड्र्स' के सितारे केविन स्पेसी की धमकी इस स्थिति को बयां करती है। 
 
भारत में जब तक समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक अपराध माना जाता रहा, पुरुषों की तरफ से अपने पुरुष बॉस या सहकर्मियों के खिलाफ उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज कराने के मौके ही नहीं आते थे। महिला समलैंगिकों के मामले में भी यही बात लागू होती है। लेकिन गत सितंबर में आए उच्चतम न्यायालय के फैसले ने हालात को बदल दिया है। ऐसी स्थिति में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ कानून के दायरे को लैंगिक विभेद से परे रखना इस तथ्य की स्वीकारोक्ति होगी कि महिलाएं अब कार्यस्थलों पर ताकतवर भूमिका में आने लगी हैं और कर्मचारियों को उन महिलाओं की यौन आकांक्षाओं से बचाकर रखने की भी जरूरत है। इस कानून का नाम बदलकर कार्यस्थल पर कर्मचारियों के यौन उत्पीडऩ (निवारक एवं समाधान) अधिनियम रखने से इसमें निष्पक्षता का नजरिया शामिल होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे कार्यस्थलों पर लैंगिक मामलों को संभालने के विवादास्पद मसले में अधिक विश्वसनीयता भी आएगी।
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