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आमदनी के वितरण में असमानता का फासला

पार्थसारथि शोम /  October 18, 2018

आय के वितरण में खास प्रगति नहीं हुई है लेकिन शीर्ष स्तर पर आय की असमानता में थोड़ी कमी हुई है। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
आय वितरण पर जब मैंने पिछली बार लिखा था तो वर्ष 2013-14 के आंकड़े ही उपलब्ध थे। अब वर्ष 2015-16 के आंकड़े भी आ चुके हैं। इन आंकड़ों में शामिल 20 वर्ष से अधिक की उम्र के लोगों की संख्या 1981 में 35.1 करोड़ थी जो 2013-14 में बढ़कर 77.8 करोड़ और 2015-16 में 81 करोड़ हो गई। इस समूह के निचले 50 फीसदी हिस्से और उससे ऊपर के 40 फीसदी लोगों पर गौर करें तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता है कि आय वितरण में सुधार भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। आंकड़े इस कड़वी हकीकत को बयां कर देते हैं।
 
पहली तालिका समय के साथ आय वितरण में आए बदलाव को दर्शाती है। वर्ष 1980-81 से लेकर 2015-16 के दौरान राष्ट्रीय आय में श्रमशक्ति के निचले हिस्से की हिस्सेदारी 23 फीसदी से घटकर 15 फीसदी पर आ गई। इसी तरह ऊपरी हिस्से के 40 फीसदी लोगों की हिस्सेदारी भी 45 फीसदी से गिरकर 29 फीसदी रह गई। इसके उलट शीर्ष 10 फीसदी आबादी की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी सात फीसदी से बढ़कर 21 फीसदी पर जा पहुंची। हालांकि आंकड़ों से यह रोचक पहलू भी सामने आता है कि वर्ष 2013-14 और 2015-16 के बीच शीर्षस्थ एक फीसदी तबके की वजह से पैदा होने वाली आय असमानता में गिरावट आई। इस तालिका के आखिरी दो कॉलम सकारात्मक या नकारात्मक वृद्धि दरों के जरिये इस नतीजे की पुष्टि भी करते हैं। पहला कॉलम बताता है कि 1980 से लेकर 2016 के दौरान इस हिस्सेदारी में किस तरह बदलाव आया है। यह बताता है कि समूहों की आय घटी है। फिर भी 2014-16 के आंकड़े बताते हैं कि शीर्ष 10 फीसदी में शामिल 9 फीसदी लोगों की आय में सकारात्मक वृद्धि को छोड़कर बाकी सभी आय समूहों की हिस्सेदारी कम हुई है।
 
दूसरी तालिका औसत राष्ट्रीय आय के अनुपात में सभी समूहों की औसत आय के बारे में है। पहली पंक्ति समग्र आबादी के बारे में है। अगर वर्ष 1980-81 पर गौर करें तो निचली 50 फीसदी श्रमशक्ति औसत राष्ट्रीय आय का आधा हिस्सा कमा रहा था जबकि उससे ऊपर के 40 फीसदी लोग औसत आय का 1.1 गुना ही कमा रहे थे। इस तरह 1980-81 में भी करीब 90 फीसदी आबादी मुश्किल से ही औसत राष्ट्रीय आय के करीब पहुंच पा रही थी। लेकिन 2013-14 तक उनकी हिस्सेदारी घटकर औसत आय की क्रमश: 30 फीसदी और 70 फीसदी ही रह गई है। वहीं शीर्ष नौ फीसदी लोगों की आय औसत आय की 3.9 गुना हो गई। शीर्ष पर बैठे एक फीसदी लोगों की आय औसत आय की 21.3 गुना हो चुकी है जो पहले 7.3 गुना ही थी। साफ है कि बीते साढ़े तीन दशकों में राष्ट्रीय औसत के संदर्भ में शीर्ष 10 फीसदी लोगों की औसत आय जबरदस्त बढ़ी है जबकि 'निचले' 90 फीसदी तबके की आय में गिरावट आई है।
 
अगर शीर्ष एक फीसदी तबके पर गौर करें तो अव्वल 0.1 फीसदी लोगों की औसत आय औसत राष्ट्रीय आय की 20 गुना से बढ़कर 82 गुना हो चुकी है। वहीं शीर्ष 0.01 फीसदी लोगों की आय 341 गुना हो चुकी है जबकि उच्चतम 0.001 फीसदी लोगों की आय राष्ट्रीय औसत की 1362 गुना हो चुकी है। इस तरह समय बीतने के साथ उच्चतर आय वाले समूहों में भी बढ़ोतरी की दर खूब तेज हुई है। तालिका का आखिरी कॉलम हरेक साल की आय वृद्धि दर का सार है और औसत दर्शाता है। यह वृद्धि दर में तीव्र बढ़ोतरी भी दर्शाता है जो 2 फीसदी से बढ़कर 14 फीसदी हो चुका है। साफ है कि 1980-81 और 2015-16 के दौरान आय वितरण की स्थिति बदतर हुई है।
 
फिर भी 2013-14 और 2015-16 के कॉलम की तुलना करने पर एक रोचक बात पता चलती है। इस अवधि में शीर्ष एक फीसदी आबादी की औसत आय और राष्ट्रीय औसत आय के बरक्स उनके घटकों में मामूली गिरावट आई है। यह गणना में किसी आकस्मिक खामी का नतीजा भी हो सकती है फिर भी इससे बेहतर बदलाव का इशारा जरूर मिलता है। अन्य सभी समूहों (कुल आबादी का 99 फीसदी हिस्सा) का औसत भी या तो सुधरा है या स्थिर रहा है। इस तरह आय का पुनर्वितरण शीर्ष एक फीसदी से शीर्ष नौ फीसदी समूह की तरफ हुआ है। 
 
चीन और रूस की तुलना में भारत कहां पर है? तीसरी तालिका के मुताबिक भारत में सभी समूहों की वास्तविक आय वृद्धि हुई है। यह अलग बात है कि आय बढऩे के साथ वृद्धि दर तेजी से बढ़ती है। चीन में आय बढऩे से आय वृद्धि दर भी काफी तीव्र रही है। लेकिन रूस में अविश्वसनीय रूप से निचले 90 फीसदी जनसमूह की वास्तविक आय में गिरावट आई है जबकि शीर्ष 0.1 फीसदी लोगों की आय वृद्धि दर ने चीन को भी पछाड़ दिया है। यह आय वितरण में अत्यधिक गिरावट को पुख्ता करता है।
 
आखिरी सवाल है कि भारत के 'मध्यम वर्ग' में शामिल लोग कौन हैं? पहली तालिका का पहला कॉलम देखें तो निचली 50 फीसदी आबादी की औसत वार्षिक आय 45,000 रुपये और उससे ऊपर के 40 फीसदी तबके की औसत आय 1.13 लाख रुपये है। किसी भी स्वीकार्य शब्दावली में इन लोगों को मध्य वर्ग बताना एक भ्रांति ही होगी। निचले 90 फीसदी लोगों से ऊपर के नौ फीसदी लोगों की औसत आय छह लाख रुपये वार्षिक यानी 50,000 रुपये मासिक है। अगर हम इस समूह को मध्य वर्ग में रखते हैं तो बाकी 90 फीसदी आबादी यानी भारत में 20 साल से अधिक उम्र के तीन-चौथाई लोग तो मध्य वर्ग से नीचे ही आ जाते हैं।
Keyword: india, income, economy,,
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