बिजनेस स्टैंडर्ड - 'ऑर्गेनिक' का बाजार
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'ऑर्गेनिक' का बाजार

वीर अर्जुन सिंह और निकिता पुरी /  October 18, 2018

ऑर्गेनिक उत्पाद बेचने वाली कंपनियां और सजग उपभोक्ता मिलकर एक नए उद्योग का ठोस शक्ल दे रहे हैं। लेकिन नीतिगत खामियों को दुरूस्त किए बगैर आगे की राह आसान नहीं होगी। बता रहे हैं वीर अर्जुन सिंह और निकिता पुरी

 
कर्टनी करदाशियां ने कुछ समय पहले ट्विटर पर अपनी एक तस्वीर पोस्ट की जिसमें वह एक तरणताल के बगल में आरामकुर्सी पर सफेद बिकिनी पहने हुए बैठी थीं। उस तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा था, 'मैं यह तय करती हूं कि हमेशा ऑर्गेनिक ही खरीदूं।' कर्टनी की बहनों किम, कोल और काइली ने भी उनकी इस बात से सहमति जताई। कर्टनी के करीब 2.3 करोड़ फॉलोअर इस बयान को देखकर ऑर्गेनिक यानी जैविकउत्पादों के बारे में जानने के लिए उत्सुक हुए। हालांकि वह तस्वीर महज एक विज्ञापन थी और कर्टनी के ऐप पर ऑर्गेनिक भोजन के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लोगों को एक साल के लिए करीब 1,700 रुपये चुकाने पड़े।
 
इतनी राशि में तो भारत में चार सदस्यों वाला एक परिवार महीने भर के लिए ऑर्गेनिक उत्पाद खरीद सकता है। सलाहकार फर्म ईवाई और उद्योग एवं वाणिज्य मंडल एसोचैम की एक साझा रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है। अगर कर्टनी करदाशियां वाले प्रकरण में से ग्लैमर और शख्सियत वाले पहलू को हटाकर देखें तो आप भी इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि ऑर्गेनिक एक जरूरी खर्च होता जा रहा है। भारत में नए ऑर्गेनिक उत्पाद तेजी से बढ़ रहे हैं। इन ब्रांड की कामयाबी अतीत की उस समझ को नए कलेवर में पेश करने का नतीजा है जिसके मुताबिक बढिय़ा सेहत के लिए प्राकृतिक खानपान जरूरी होता है। जहरीले माहौल में ऑर्गेनिक जैसा कोई भी उत्पाद किसी नए विज्ञान की तरह हाथों-हाथ बिकता है। ईवाई-एसोचैम रिपोर्ट कहती है कि भारतीय डिब्बाबंद ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार एक अरब डॉलर का भी आंकड़ा पार कर जाएगा और इसके सालाना 17 फीसदी की दर से बढऩे की संभावना है।
 
जहां उपभोक्ता मार्केटिंग के दौरान 'ताजा' एवं 'प्राकृतिक' शब्दों के अतिशय इस्तेमाल को लेकर अब नाखुशी जताने लगे हैं वहीं 'ऑर्गेनिक' शब्द को लेकर आकर्षण बढ़ा है। इन उपभोक्ताओं का एक तबका नई जानकारियों से लैस है, स्वास्थ्य को लेकर सजग है और पर्यावरण को सहेजने में मदद करने वाले उत्पादों को खरीदने में खुशी महसूस करता है। लेकिन ऑर्गेनिक खरीदारों में अधिकांशत: वे लोग हैं जो हरेक 'केमिकल' उत्पाद को बिना जांचे-परखे खारिज करने को तैयार होते हैं। जहां दोनों तरह के लोग रसायन-मुक्त उत्पादों के नाम पर अधिक राशि खर्च करने के लिए तैयार हैं, वहीं वे उन उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर सशंकित भी रहते हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों के मूल्यों में ब्रांडों के आधार पर काफी फर्क है और असली ऑर्गेनिक उत्पादों की पहचान के लिए जारी अलग-अलग 'लोगो' असमंजस बढ़ाने का काम करते हैं।
 
सरकार ने हाल में इस संदेह को दूर करने की कोशिश की है। खाद्य क्षेत्र के नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने प्राकृतिक एवं ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए साझा लोगो 'जैविक भारत' जारी किया है। ऑर्गेनिक खेती के लिए दिशानिर्देश तय करने वाली नोडल एजेंसी राष्ट्रीय ऑर्गेनिक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) ने भी पिछले साल दिसंबर में एक अधिसूचना जारी की थी जिसमें सभी ऑर्गेनिक उत्पादकों और विक्रेताओं को 1 जुलाई 2018 तक ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करना अनिवार्य कर दिया गया था। हालांकि सीधे बाजार में अपने उत्पाद बेचने वाले छोटे किसानों को इस शर्त से छूट दी गई थी। किसानों और समर्थक संगठनों ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया था। उनका कहना था कि किसानों को परंपरागत खेती से ऑर्गेनिक खेती की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए ढांचागत एवं प्रक्रियागत उपाय नहीं किए गए हैं। इन विरोधों के मद्देनजर सरकार ने अपनी अधिसूचना को स्थगित कर दिया और उसमें किए जाने वाले बदलावों के बारे में संबद्ध पक्षों से चर्चा कर रही है।
 
संपोषणीय एवं समग्र कृषि गठबंधन (आशा) की राष्ट्रीय संयोजक कविता कुरुगंती सरकार के इस कदम को बेतुका बताती हैं। वह कहती हैं, 'सरकार ने अनिवार्य प्रमाणन के लिए 27 दिसंबर को जारी अधिसूचना में कहा था कि अगर आप आज आवेदन करते हैं तो 2-3 साल बाद ही आपको एक ऑर्गेनिक उत्पादक किसान के तौर पर प्रमाणित किया जाएगा।' उनका कहना है कि प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए केवल छह महीने का वक्त ही देना पूरी तरह अनुचित है। वैसे जो किसान पारंपरिक खेती से ऑर्गेनिक खेती की तरफ रुख करना चाहते हैं उनके लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) के जरिये बनता है जिसमें कम-से-कम चार किसान मिलकर ऑर्गेनिक प्रमाण हासिल करने के लिए आवेदन कर सकते हैं और एक-दूसरे के ऑर्गेनिक उत्पादों की गवाही भी देते हैं। हालांकि कविता का दावा है कि कई इलाकों के किसानों ने समूह के तौर पर प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए आवेदन किया था लेकिन कभी भी उस पर कार्रवाई नहीं हुई। दूसरा तरीका सरकारी मान्यता वाली 28 तृतीय पक्ष एजेंसियां (टीपीए) हैं जिनमें से इकोसर्ट और कंट्रोल यूनियन जैसी कई एजेंसियां प्रमाणपत्र देने के पहले वैश्विक मानकों का पालन करती हैं। ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करने में 10,000 से लेकर 70,000 रुपये के बीच खर्च पड़ता है। इसके अलावा हरेक साल उसके नवीनीकरण पर भी अलग से खर्च करना होता है। 
 
ऑर्गेनिक खेती में लगे किसानों के बीच काम करने वाली संस्था नवधान्य की संस्थापक वंदना शिवा कहती हैं, 'जहां रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी मिलने का सिलसिला जारी है वहीं सरकार किसानों को ऑर्गेनिक तरीकों से खेती के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं देती है।' ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया की प्रामाणिकता को लेकर संदेह का भाव होने से मामला और गड़बड़ हो जाता है। जब प्रमाणपत्र देने का काम करने वाली एजेंसियां किसी किसान के खेती संबंधी तौर-तरीकों की पड़ताल के लिए पहुंचती हैं तो वे प्राय: साफ नजर आने वाले संकेत ही देखना चाहती हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए खुदरा बिक्री शृंखला ऑर्गेनिक मांड्या शुरू करने वाली मधु चंदन एस सी कहती हैं कि ऑर्गेनिक किसान के प्रमाणन के लिए पहुंचने वाली एजेंसियों के लोग अक्सर आसपास बिखरी खाद की बोरियों पर निर्भर रहते हैं। अमेरिका से लौटकर 2014 में अपना ऑर्गेनिक कारोबार शुरू करने वालीं मधु कहती हैं, 'हालत यह है कि अगर 200 किसानों ने प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया हुआ है तो उनमें से केवल 20 लोगों के खेतों की ही मिट्टïी का परीक्षण किया जाता है।' कविता इस पूरी प्रक्रिया को 'दृष्टिगत सत्यापन' करार देते हुए कहती हैं कि मृदा परीक्षण वाले खेतों का चयन भी सुविधा के आधार पर किया जाता है। प्रमाणित ऑर्गेनिक किसानों से उनकी फसल खरीदी जा सकती है लेकिन ऑर्गेनिक मांड्या जैसे खुदरा विक्रेताओं के लिए भी टीपीए प्रमाणन लेना जरूरी है। पहले दो वर्षों में तो ऑर्गेनिक मांड्या ने ग्राहकों के बीच अपने भरोसे के चलते कारोबार किया और अभी एक साल पहले ही उसे ऑर्गेनिक कारोबार का प्रमाणपत्र मिला है। 
 
वैसे दिल्ली स्थित खुदरा विक्रेता एवं निर्यातक लाइव ऑर्गेनिक के सह-संस्थापक गगन सिंह का मानना है कि किसानों की तुलना में खुदरा विक्रेताओं के लिए ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करना कहीं अधिक आसान है। भारत के किसानों का बहुत बड़ा तबका आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है और कई बार तो उनकी आय नकारात्मक ही होती है। ऐसे में सबसे अच्छा तो यही होगा कि ऑर्गेनिक किसानों के बजाय खुदरा विक्रेता ही इस प्रमाणन की लागत भरें। गगन कहते हैं, 'मैंने उत्तर प्रदेश में 25 किसानों का एक समूह बनाया है ताकि उन्हें पीजीएस व्यवस्था के तहत प्रमाणपत्र मिल सके।'
 
मुंबई में भी खुदरा ऑर्गेनिक विक्रेता के तौर पर प्राकृतिक ने वर्ष 2013 में अपना कामकाज शुरू किया था। इसकी संस्थापक धर्मिष्ठा गोयनका बताती हैं कि उनकी टीम महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों के साथ मिलकर काम करती है। इसके अलावा विदेशी खरीदारों की तलाश में भी उनकी टीम ऑर्गेनिक किसानों की मदद करती है। धर्मिष्ठा कहती हैं, 'ऑर्गेनिक तरीके से खेती करने पर उपज घट जाती है। इसी वजह से तैयार उत्पाद सामान्य उत्पादों की तुलना में 45-50 फीसदी तक महंगा होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हम किसानों को पहले ही यह बता देते हैं कि हमें उनसे क्या और कितना खरीदना है? किसान उसी के हिसाब से खेती करते हैं।' लाइव ऑर्गेनिक्स के गगन सिंह कहते हैं कि ऑर्गेनिक उत्पाद की प्रामाणिकता की मुहर ग्राहक के लिए मायने रखती है लेकिन इस उद्योग की प्रगति के लिए विश्वास की डोर जुडऩी भी जरूरी है।
 
एफएसएसएआई ने वर्ष 2012 में किए गए एक देशव्यापी सर्वे में 68.4 फीसदी नमूनों में मिलावटी दूध पाया गया था। दूध की इसी मिलावट से परेशान योग प्रशिक्षक शशांक टी ने अब ऑर्गेनिक मांड्या से ऑर्गेनिक दूध खरीदना शुरू किया है। हालांकि इसके लिए उन्हें सामान्य दूध की तुलना में करीब दोगुनी कीमत चुकानी पड़ती है। शशांक कहते हैं कि ए-2 किस्म का यह दूध ऑर्गेनिक खेतों में घूमते हुए चारा खाने वाली देसी गायों से निकलता है और स्वाद एवं रंगत के मामले में यह आम दूध से काफी अलग है। ऑर्गेनिक मांड्या स्टोर की संस्थापक मधु कहती हैं, 'ये गाय रासायनिक उर्वरक और स्टेरॉयड वाले चारे से दूर रखी जाती हैं। किसी भी तरह के रसायन से मुक्त चारे की ही वजह से उन गायों का दूध ऑर्गेनिक होता है।'
 
हालांकि इस तरह का दावा करने वालीं वह इकलौती नहीं हैं। दिल्ली स्थित ऑर्गेनिक खुदरा विक्रेता 4एस फूड्स भी ऑर्गेनिक तरीके से निकले दूध की बिक्री करीब 1500 परिवारों को रोजाना करता है। इसके संस्थापक गजेंद्र सिंह कहते हैं, 'हम अपने खेतों में ऑर्गेनिक चारा उपजाते हैं और अपने मवेशियों को वहां चरने के लिए खुला छोड़ देते हैं। हम अपने दुधारू पशुओं को ऑक्सीटोसीन या एंटीबॉयोटिक्स जैसे हॉर्मोन के इंजेक्शन भी नहीं देते हैं।' हालांकि उनका 4एस फूड्स अभी तक प्रमाणित ऑर्गेनिक विक्रेता नहीं बना है। उनका कहना है कि अमेरिका की तरह भारत में भी एक दुग्ध उत्पादक के लिए दो गायों के लिए एक हेक्टेयर खेत की उपलब्धता जरूरी की गई है जिसे पूरा कर पाना एक तरह से नामुमकिन है। उनकी बिक्री काफी हद तक आपसी भरोसे पर आधारित है। 
 
हरियाणा में फेयर डेयरी नाम से ऑर्गेनिक दूध बिक्री केंद्र चलाने वाले सुनील पंवार भी गजेंद्र की राय से इत्तेफाक रखते हैं। पंवार कहते हैं, 'हम साफ-सफाई और अवशिष्ट निपटान के मामले में बेहद सख्त मानकों का पालन करते हैं।' फेयर डेयरी अपने ग्राहकों को बेचे जाने वाले दूध के परीक्षण के नतीजों से भी अवगत कराती रहती है।  इसी तरह मांसाहारी उत्पादों को भी ऑर्गेनिक स्वरूप में बेचा जा रहा है। बेंगलूरु स्थित स्टार्टअप ब्राउन एप्रन पोल्ट्री एवं ऑर्गेनिक मुर्गे मुहैया करा रहा है। उसका दावा है कि उसके फार्म में तैयार मुर्गों की ही तरह स्वच्छंद विचरण करने वाले मुर्गे भी पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं क्योंकि दोनों ही कीटनाशकों एवं बचावकारी दवाओं से मुक्त होते हैं। हालांकि ब्राउन एप्रन के फार्म वाले मुर्गे 200 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकते हैं जबकि ऑर्गेनिक किस्म वाले मुर्गे 449 रुपये किलो बिकते हैं। ब्राउन एप्रन के सह-संस्थापक फैज अजीम कहते हैं, 'अधिकतर खरीदारों के लिए कीमत सबसे बड़ी बात होती है। हम समय-समय पर दोनों ही तरह के मुर्गों को परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भेजते रहते हैं ताकि स्टेरॉयड, बचावकारी दवाओं या दूसरे रसायनों की गैर-मौजूदगी की पुष्टि हो सके।' दूसरे ऑर्गेनिक विक्रेताओं की ही तरह ब्राउन एप्रन का भी अपने आपूतिकर्ताओं के साथ विश्वास का रिश्ता है। उसे कभी भी ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र की जरूरत महसूस नहीं हुई है।
 
छोटे स्तर पर कामकाज शुरू करने वाले कई ऑर्गेनिक ब्रांड भी नियमों के अनुपालन और प्रमाणन संबंधी चुनौतियों के बोझ तले दब जाते हैं। त्वचा देखभाल के कोयंबटूर स्थित ऑर्गेनिक ब्रांड जूसी केमिस्ट्री ने खानपान में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों के इस्तेमाल से कम समय में ही जगह बना ली है। प्रीतेश और मेघा अशर की पति-पत्नी जोड़ी ने वर्ष 2014 में किचन से अपना काम शुरू किया था लेकिन आज इसके उत्पाद 7,500 वर्ग फुट क्षेत्र में तैयार होते हैं। जूसी केमिस्ट्री को पिछले साल ही ऑर्गेनिक प्रमाणन मिला है। प्रीतेश कहते हैं, 'भारत में त्वचा देखभाल ब्रांडों के लिए ऑर्गेनिक मानदंडों का अभाव होने से हमने फ्रांसीसी फर्म इकोसर्ट से प्रमाणन देने को कहा था।'
 
वह कहते हैं कि उत्पादन का लाइसेंस लेने से लेकर ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र हासिल करने तक नियमों के अनुपालन की जद्दोजहद काफी लंबी है लेकिन इससे बेहतर प्रबंधकीय लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है। इसके बावजूद रोजमर्रा की जंग नई चुनौतियां लेकर आती है। आपूर्तिकर्ताओं से प्रामाणिक ऑर्गेनिक उत्पाद जुटाना ऐसी ही एक चुनौती है। अशर दंपती का यही जज्बा उपभोक्ताओं को पसंद आता है। जूसी केमिस्ट्री के उत्पाद खरीदने वाली दिल्ली निवासी तृप्ति चावला कहती हैं, 'मैंने जब अपने लिए मुफीद त्वचा देखभाल उत्पाद के लिए उनसे सलाह मांगी तो मेघा ने खुद मेरे सवालों के जवाब दिए। किसी प्रमाणपत्र के बजाय वह उत्पाद ही हमें अपने बारे में सबसे अच्छी तरह बताता है।'
 
हालांकि एक आम उपभोक्ता के लिए ऑर्गेनिक एवं गैर-ऑर्गेनिक उत्पादों के बीच फर्क कर पाना आसान नहीं होता है। सेहतमंद स्नैक मुहैया कराने वाले ग्रैनी ब्रांड के संस्थापक मानस अरविंद इसका एक आसान जवाब देते हैं, 'आप वही काटते हैं जो आप बोते हैं। अगर आप अपने उत्पादक किसान को जानते हैं तो अपने खाद्य उत्पाद के ऑर्गेनिक होने के बारे में जान सकते हैं।' यही वजह है कि झज्जर, रेवाड़ी और हिसार जैसे जिलों में ऑर्गेनिक खेती करने वाले किसान रविवार की सुबह अपना स्टॉल लगा भी नहीं पाए होते हैं कि उनके खरीदार पहुंच जाते हैं। नौ बजने तक अधिकतर किसानों की सारी उपज बिक चुकी होती है। ऐसे ही एक किसान भीम सिंह हरी सब्जियां लेकर आए थे। बिक्री से काफी खुश नजर आ रहे भीम सिंह कहते हैं, 'हमें मंडी में 2,000 रुपये की भी सब्जियां बेचने में सारा दिन लग जाता है लेकिन यहां पर महज 2 घंटे में 6,000 रुपये से अधिक की बिक्री हो गई।'
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