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बढ़ते प्रतिफल, आईएलऐंडएफएस से ऋण योजनाओं का रिटर्न कम

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई October 17, 2018

ऋण योजनाओं का प्रदर्शन कमजोर रहा है क्योंकि प्रतिफल बढ़ा है और कुछ योजनाओं के जरिए आईएलऐंडएफएस में किए गए निवेश पर रिटर्न सिकुड़ा है। लिक्विड व अल्ट्रा शॉर्ट टर्म फंड सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले के तौर पर उभरे हैं और एक साल का रिटर्न क्रमश: 6.7 फीसदी व 5.8 फीसदी रहा है। दूसरी ओर डायनेमिक व लंबी अवधि वाले फंडों का रिटर्न निचले पायदान यानी क्रमश: 1.7 फीसदी व 1 फीसदी रहा। यह जानकारी वैल्यू रिसर्च के आंकड़ों से मिली। फंड्सइंडिया की प्रमुख (म्युचुअल फंड रिसर्च) विद्या बाला ने कहा, सबसे अहम बात अवधि की है और कम अवधि वाले फंडों ने बेहतर प्रदर्शन किया है, वहीं लंबी अवधि वाले फंडों को प्रतिफल में बढ़ोतरी का झटका लगा। बॉन्ड की कीमत जब बढ़ती है तो प्रतिफल घटता है और जब प्रतिफल बढ़ता है तो बॉन्ड की कीमतें कम होती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले एक साल में दरों में 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी की है।
 
आरबीआई ने 5 अक्टूबर की नीतिगत बैठक में यथास्थिति बनाए रखी, जिससे ब्याज दर के मोर्चे पर थोड़ी राहत मिली। कोटक महिंद्रा ऐसेट मैनेजमेंट ने नीतिगत फैसले के बाद एक नोट में कहा था, यथास्थिति को देखते हुए हमें लगता है कि अल्पावधि की दरें नरम होंगी, वहीं लंबी अवधि का प्रतिफल सीमित दायरे में रह सकता है। रुपया व कच्चे तेल की चाल आने वाले समय के लिए बाजार की दिशा तय कर सकती है। 10 वर्षीय सरकारीप्रतिभूतियों का प्रतिफल 115 आधार अंक बढ़कर 7.91 फीसदी पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 6.76 फीसदी रहा था।
 
दूसरी ओर आईएलऐंडएफएस में निवेश का अल्पावधि वाले फंडों पर गहरा असर पड़ा। कुछ फंड हाउस ने आईएलऐंडएफएस और इसकी सहायक कंपनियों की ऋण प्रतिभूतियों में खासा निवेश किया था। आईएलऐंडएफएस की रेटिंग घटाए जाने के बाद इन योजनाओं को अपने निवेश पर भारी कटौती झेलनी पड़ी। रेटिंग में कमी से योजनाओं के एनएवी पर असर पड़ा और निवेशकों के रिटर्न को भी झटका लगा। नकदी की सख्त स्थिति ने म्युचुअल फंडों को एक या दो दिन वाली वाणिज्यिक प्रतिभूतियां बेचने में मुश्किल हुई। कुछ बड़े फंड हाउस ने पिछले महीने निवेश निकासी की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए बैंकों से उधार लिया।
 
म्युचुअल फंड उद्योग की कुल प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां अगस्त के आखिर के 25.2 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले सितंबर में घटकर 22 लाख करोड़ रुपये रह गई। ज्यादातर नुकसान लिक्विड व फिक्स्ड इनकम योजनाओं से हुई रिकॉर्ड निकासी के चलते हुआ, जिसमें बड़े निवेशकों ने रकम झोंकी थी। सितंबर में दो श्रेणियों में 2.4 लाख करोड़ रुपये की निकासी हुई, जो जनवरी 2008 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इक्रा के मुताबिक, इसके अतिरिक्त अग्रिम कर भुगतान के चलते तिमाही में उच्च निकासी, मनी मार्केट की सख्ती और प्रतिफल में बढ़ोतरी ने भी निकासी में इजाफा किया। बाला ने कहा, एक्रुअल फंडों का नुकसान मार्क टु मार्केट है। निवेशक जब तक अल्पावधि वाली ऋण योजनाओं में निवेश बनाए रखते हैं, उनका रिटर्न बेहतर रहने की संभावना है। लंबी अवधि वाले फंडों पर हालांकि दबाब बना रहेगा, जब तक कि ब्याज दरों का चक्र नहीं बदलता।
Keyword: IL&FS, fund, share, LIC, sidbi, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस सर्विसेज,
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