बिजनेस स्टैंडर्ड - विदेश में पढ़ाई और सैरसपाटे पर बढ़ता भारत का डॉलर व्यय
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 16, 2018 02:58 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

विदेश में पढ़ाई और सैरसपाटे पर बढ़ता भारत का डॉलर व्यय

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 17, 2018

भारत के चालू खाते के घाटे में हुई वृद्धि की वजहों और इसे काबू में रखने के लिए जरूरी कदमों को लेकर जारी विमर्श के दौरान पिछले कुछ वर्षों में भारत से विदेश भेजी जाने वाली रकम में हुई बढ़ोतरी का भी जिक्र आया है। साफ तौर पर इस चर्चा का मकसद भारत से विदेश भेजी जाने वाली रकम में पिछले कुछ वर्षों में आई तेजी के कारणों की सही पड़ताल करना है। यह जानने की भी कोशिश करेंगे कि क्या इस पर लगाम लगाई जा सकती है और अगर हां तो उसके लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? 

 
भारतीय रिजर्व बैंक की उदारीकृत मुद्रा-प्रवाह योजना (एलआरएस) के तहत भारत से बाहर भेजे गए डॉलर का नवीनतम संकलन यह दिखाता है कि डॉलर निकलने के आंकड़ों में कितनी तेजी आई है? बिजनेस लाइन रिसर्च ब्यूरो के लिए के. गुरुमूर्ति की बनाई यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2010-11 में भारत से विदेश भेजी गई रकम 1.16 अरब डॉलर थी लेकिन वर्ष 2017-18 में यह बढ़कर 11.33 अरब डॉलर हो गई। इस तरह महज सात वर्षों में ही भारत से बाहर भेजी जाने वाली रकम करीब 10 गुना बढ़ गई। 
 
करीब से देखें तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। विदेश रकम भेजने के क्रम में वर्ष 2010-15 के दौरान भारत से सालाना 1-1.33 अरब डॉलर बाहर गए। इसके बावजूद उस समय के चालू खाता घाटे में इसका अंशदान 1.2 फीसदी से 5 फीसदी तक ही था। लेकिन वर्ष 2015-16 में भारत से 4.64 अरब डॉलर की मुद्रा विदेश भेजे जाने से हालात नाटकीय रूप से बदल गए। यह एक साल पहले की तुलना में 248 फीसदी का तीव्र उछाल दिखा रहा है।  वित्त वर्ष 2016-17 में बाहर भेजा गया धन 76 फीसदी बढ़कर 8.17 अरब डॉलर पर पहुंच गया। हालांकि वर्ष 2017-18 में इस प्रवाह में थोड़ी सुस्ती रही और यह 39 फीसदी की बढ़त के साथ 11.33 अरब डॉलर रहा। इस अवधि में विदेश भेजी गई रकम इतनी अधिक हो गई कि चालू खाते के घाटा में उसका अनुपात बढ़ता गया। वर्ष 2015-16 में यह रकम चालू खाते के घाटे की 21 फीसदी, 2016-17 में 57 फीसदी और 2017-18 में 23 फीसदी रही। 
 
इस बढ़ोतरी की एक वजह यह कही जा सकती है कि एलआरएस के तहत तय की गई सीमा में छूट देकर उसे 2.5 लाख डॉलर प्रति व्यक्ति कर दिया गया। एलआरएस के तहत भारत का कोई भी नागरिक विदेश यात्रा, विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों की देखभाल, इलाज, उपहार, शिक्षा और डेट, इक्विटी एवं रियल एस्टेट में निवेश के मद में विदेशी मुद्रा खर्च कर सकता है। अगस्त 2013 में भारत का चालू खाता घाटा बढऩे और अमेरिकी फेड रिजर्व की बॉन्ड खरीद योजना बंद करने की तैयारी को देखते हुए इसे सख्त बनाया गया था। 
 
वर्ष 2013 में बरती गई सख्ती के तहत एलआरएस सीमा को 2 लाख डॉलर से कम करते हुए 75,000 डॉलर प्रति व्यक्ति कर दिया गया था। लेकिन बाद में भुगतान संतुलन की हालत सुधरने पर एलआरएस सीमा में नरमी बरतते हुए दो बार बदलाव किया गया। जून 2014 में इसे 75,000 से बढ़ाकर 1.25 लाख डॉलर प्रति व्यक्ति कर दिया गया जबकि 2015 में इसे दोगुना करते हुए प्रत्येक भारतीय नागरिक को एक साल में 2.5 लाख डॉलर तक बाहर भेजने की छूट दे दी गई। इस सीमा में सख्ती बरतने का काम मनमोहन सिंह सरकार ने किया था और उसे नरम करने का काम बाद की मोदी सरकार ने किया। हालांकि नरमी के चलते भारत से बाहर जाने वाले डॉलर की मात्रा बढऩे का तर्क पूरी तरह फिट नहीं बैठता है क्योंकि वर्ष 2011-13 के दौरान एलआरएस सीमा के 2 लाख डॉलर होने के बावजूद सालाना करीब 1 अरब डॉलर ही बाहर भेजे गए। 
 
लेकिन डॉलर बाहर भेजने की दर में हुई बढ़ोतरी से अधिक अहम बात वर्ष 2015 के बाद व्यय मदों के स्वरूप में आया बदलाव है। वर्ष 2014-15 तक भारतीय नागरिक सबसे अधिक डॉलर उपहार के लिए भेजते थे और उसके बाद विदेश में शिक्षा ग्रहण करने, इक्विटी या डेट में निवेश और विदेश में रहने वाले करीबी रिश्तेदारों की देखभाल का नंबर आता था। वर्ष 2010-11 से 2014-15 के दौरान हरेक साल इन सभी मदों का समेकित हिस्सा बाहर भेजी गई डॉलर राशि का 70-79 फीसदी तक रहता था। 
 
लेकिन 2015-16 के बाद से हालात नाटकीय रूप से बदल गए। उपहार और इक्विटी एवं डेट में निवेश मदों का हिस्सा काफी कम हुआ है और उसकी जगह विदेश में सैर-सपाटे के मद में तीव्र वृद्धि हुई है। करीबी रिश्तेदारों की देखभाल और विदेश में शिक्षा के मद की अब भी बड़ी हिस्सेदारी है। इस तरह पिछले तीन वर्षों में केवल तीन मदों- विदेश यात्रा, रिश्तेदारों की देखभाल और विदेश में पढ़ाई का ही सम्मिलित अंशदान 70-79 फीसदी तक हो गया। खास बात यह है कि विदेश में रहने वाले नजदीकी रिश्तेदारों की देखभाल के मद में भी बड़ा हिस्सा पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाले छात्रों का ही है। इस तरह असल में विदेश में पढ़ाई और यात्रा का ही भारत से बाहर भेजे गए डॉलर के तीन-चौथाई हिस्से पर कब्जा रहा।
 
बड़ी बात यह है कि भारत से बाहर भेजी रही रकम अब भी महज 11 अरब डॉलर के अपेक्षाकृत निम्न स्तर तक ही रही है। ऐसी स्थिति में अगर एलआरएस सीमा कम की जाती है तो वह अखरोट तोडऩे के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करने जैसा ही होगा और उससे अनावश्यक खलबली मचेगी। इसके बजाय डॉलर खर्च करने के भारतीयों के तरीके के बारे में सही सबक सीखना चाहिए। अगर भारत के लोग विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई पर सबसे ज्यादा डॉलर खर्च कर रहे हैं तो हमारे नीतिकारों को घरेलू पर्यटन ढांचे को मजबूत बनाने और अधिक सक्षम विश्वविद्यालयों के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। तात्कालिक तौर पर इन कदमों से बहुत असर नहीं पड़ेगा लेकिन लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था के लिए इसके समग्र लाभ काफी होंगे।
Keyword: dollar, rupees, education, tourism, रुपये, गिरावट,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पटरी पर लौट रहा देश का निर्यात?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.