बिजनेस स्टैंडर्ड - निजी बनाम सार्वजनिक की बहस से परे
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निजी बनाम सार्वजनिक की बहस से परे

देवाशिष बसु /  October 17, 2018

आईएलऐंडएफएस के संकट ने कंपनियों के स्वामित्व ढांचे और प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
दिन-प्रतिदिन टुकड़ों-टुकड़ों में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) में भारी अनियमितता से जुड़े पहलू सामने आ रहे हैं। अल्पावधि कर्जों के भुगतान में चूक से पैदा हुए हालात ने वित्तीय बाजारों को अपने चपेट में लिया तो कुछ लोगों को यह लगा कि समूह महज वित्त के अभाव का सामना कर रहा है। इसका पैसा बड़ी ढांचागत परियोजनाओं में फंसा हुआ था और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने उसे कर्ज देना बंद कर दिया था। ऐसी स्थिति में समूह को कम अवधि वाली उधारी लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी के बाद भुगतान में चूक की शुरुआत हुई। लेकिन असली समस्या कहीं अधिक गहरी और खतरनाक है।
 
पहला झटका यह था कि किसी को भी आईएलऐंडएफएस समूह के भीतर की कंपनियों की संख्या के बारे में पता ही नहीं था। गत 1 अक्टूबर को जब इसके स्वतंत्र निदेशकों को बर्खास्त किया गया तो सरकार ने एक लंबी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि इस समूह में 169 कंपनियां सक्रिय हैं। लेकिन यह गलत जानकारी थी। सरकार को यह सूचना कंपनी रजिस्ट्रार कार्यालय से मिली थी जिसके पास खुद सही जानकारी नहीं थी। फिर अमेरिका की कारोबारी सूचना एजेंसी रेड इंटेलिजेंस ने समूह की कंपनियों की संख्या 241 होने का दावा किया। लेकिन उदय कोटक ने अपनी पहली प्रेस ब्रीफिंग में इन कंपनियों की संख्या 348 बताकर मीडिया को अचंभे में डाल दिया। सच तो यह है कि संख्या अब भी साफ नहीं है।
 
इस बीच याराना निभाने की कहानियां भी जोरशोर से फैल रही हैं। शीर्ष प्रबंधन में शामिल लोगों की पत्नियों, बच्चों, भाई और दामाद ने समूह को अपनी निजी जागीर की तरह 25 वर्षों तक चलाया। शासन व्यवस्था का इस्पाती ढांचा कहे जाने वाले आईएएस से आए लोग भी वेतन, भत्ते और कारोबारी अनुबंधों के तौर पर करोड़ों रुपये चूस रहे थे। यह शासन एवं प्रबंधन की भारी नाकामी है। आईएलऐंडएफएस का यह गड़बड़झाला वामपंथ एवं दक्षिणपंथ दोनों तरफ के विचारकों को अजीब स्थिति में डालेगा। सार्वजनिक स्वामित्व के अंश वाले एक समूह का वित्तीय पतन होने के बाद दक्षिणपंथी विचारक स्वामित्व के ढांचे को ही इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। इसे सही ठहराने की वजह यह है कि भारत में अक्सर सरकारी स्वामित्व को हरेक समस्या का रेडीमेड समाधान बता दिया जाता है। नेताओं और सरकारी बाबुओं के लिए यह समाधान इन इकाइयों से फायदा उठाने का बढिय़ा बहाना होता है। उनके पास गलत कामों के तमाम प्रलोभन होते हैं जबकि उनकी जवाबदेही तय करने का कोई प्रयास नहीं होता है। इसी तरह निजी क्षेत्र की संलिप्तता वाला वित्तीय घोटाला होने पर वामपंथी विचारक फौरन निजी स्वामित्व को लोभी एवं बेलगाम होने के आधार पर दोषी ठहरा देते हैं। लेकिन इतना तय है कि अकेले निजी स्वामित्व ही अच्छे आचरण की गारंटी नहीं हो सकता है।
 
पहले भी कह चुका हूं कि आईएलऐंडएफएस दोनों वैचारिक खेमों को चित कर देता है। यह एक अनूठी चुनौती पेश करता है। सिटीबैंक के तेजतर्रार एवं पेशेवर माहौल में प्रशिक्षित बैंकर रवि पार्थसारथी ने 1987 में इस कंपनी की शुरुआत की थी। लेकिन इसके फंड का बड़ा हिस्सा स्टेट बैंक, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक और एलआईसी जैसे सरकारी स्वामित्व वाले संस्थानों से ही आया। आईएलऐंडएफएस का कारोबार ढांचागत क्षेत्र में था जहां पर केंद्र एवं राज्य सरकारों से सैकड़ों तरह की मंजूरियां लेनी होती थीं। इसके लिए आईएलऐंडएफएस ने खुद को बढिय़ा वेतन देने वाली किसी सरकारी कंपनी की तरह पेश किया और आईएएस अफसरों को भी अपने साथ जोड़ लिया। लेकिन अंदरखाने इसका संचालन एक निजी जागीर की ही तरह होता रहा जिसकी कमान पार्थसारथि के हाथों थी। पार्थसारथि पर परियोजनाओं में अचानक नए पहलू जोड़ देने, असहमति जताने वाले लोगों को डराने-धमकाने से लेकर प्रमुख पदों पर करीबियों की नियुक्ति और अपनी पसंद से ही चलने के आरोप लगते रहे। यह समूह इस संकट तक कैसे पहुंचा?
 
आईएलऐंडएफएस 'पेशेवर अंदाज में संचालित' कंपनियों का एक अजीब समूह है। ये कंपनियां सार्वजनिक स्वामित्व और निजी नियंत्रण के मिले-जुले असर वाली हैं। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज, स्टॉक होल्डिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एसएचसीआईएल) और नैशनल स्टॉक डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) भी ऐसे ही  संस्थान हैं। ऐसी कंपनियों को लाइसेंस और मंजूरी के मामले में एक सरकारी कंपनी की तरह नजर आने से तमाम लाभ मिलते हैं। जरा इनके नाम पर गौर कीजिए। ये सभी सुनने में सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी लगती हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप में इन कंपनियों का संचालन कुछ लोगों की निजी जागीर के ही तौर पर होता है जिन्हें बोर्ड से ताकत मिलती है। ये सभी कंपनियां सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, केंद्रीय सतर्कता आयोग और नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक (सीएजी) के दायरे से बाहर हैं। यह भी दिलचस्प है कि ये सभी कंपनियां सूचीबद्ध न होकर बाजार की समीक्षा से बचने को तरजीह देती हैं। 
 
खुद को तकनीकी रूप से बेहद सक्षम बताने वाली एनएसडीएल आयकर विभाग के बेहद महत्त्वपूर्ण कर सूचना नेटवर्क के संचालन का काम पाने में भी सफल रही। लेकिन उस पर प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की लिस्टिंग प्रक्रिया में धांधली का आरोप भी लगा। आईपीओ के सूचीबद्ध होने के पहले ही शेयर खरीद के आवेदकों ने गिने-चुने डिपॉजिटरी खातों में हजारों शेयर जमा करा दिए जिससे डेटाबेस संभालने में एनएसडीएल की क्षमता का खूब माखौल उड़ा। इसी तरह एसएचसीआईएल के आलाकमान ने एलआईसी, आईसीआईसीआई बैंक, आईडीबीआई, भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन और यूटीआई की तरफ से मनोनीत निदेशकों की नाक के नीचे से एक कीमती सहायक इकाई को ठिकाने लगा दिया था। सिंगापुर की एक कंपनी के साथ हुए ई-स्टांप अनुबंध में पैसा खाया जा रहा था। इस समूह में नए खिलाड़ी के तौर पर जीएसटीएन लिमिटेड भी शामिल हो गई है जिस पर जीएसटी का तकनीकी ढांचा संभालने का दायित्व डाला गया है। ऐसी स्थिति में सरकार इस कंपनी में अपनी अंशधारिता को बढ़ाकर 100 फीसदी करने जा रही है।
 
आईएलऐंडएफएस का संकट और एनएसई, एनएसडीएल एवं एसएचसीआईएल में हुए घोटाले हमें सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के तयशुदा खांचों से अलग देखने के लिए मजबूर करते हैं। इन सभी मामलों में असल मुद्दा यह था कि क्या कंपनियों ने बेहतर प्रशासन के बुनियादी उसूलों को नजरअंदाज किया था? इन सभी कंपनियों के बोर्ड सो रहे थे, एक ही प्रबंधन टीम दशकों से कमान संभालती आ रही थी जिससे उसमें सत्ता का दंभ आ गया और ये कंपनियां आरटीआई या सार्वजनिक बाजारों की निगरानी में भी नहीं थीं। आखिर में, हरेक मामले में संबंधित नियामक न केवल घोटाले का पता लगाने में नाकाम रहे बल्कि दोषियों को बच निकलने भी दिया। वास्तव में, अतिशय कुप्रबंधन के ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जानी चाहिए। क्या हम आईएलऐंडएफएस के हुक्मरानों के साथ यह सिलसिला शुरू कर सकते हैं?
Keyword: IL&FS, fund, share, LIC, sidbi, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस सर्विसेज,
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