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अंग्रेजी गजट में देखिए सन 1883 का गुडग़ांव

विवेक देवराय /  October 16, 2018

आज का गुरुग्राम (गुडग़ांव) सन 1883 में कैसा नजर आता था? उस वक्त सिंचाई सुविधाएं कैसी थीं और बीमारियों का इलाज किस प्रकार किया जाता था। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विवेक देवराय 

 
सन 1883-84 में प्रकाशित गुडग़ांव के डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में लिखा गया, 'मुगल काल के फलने-फूलने के दिनों में गुडग़ांव को शायद इतिहास विहीन कहा जाता था लेकिन उसके पतन के साथ ही यह जिला एक बार फिर इतिहासकारों के पन्नों पर जगह पाने लगा है। इसके साथ ही यहां घटित घटनाओं को भी जगह मिलने लगी जो अन्यथा अतिरंजित और विसंगतिपूर्ण ढंग से लोगों की स्मृतियों में ही जिंदा रहती थीं। जिले के मध्य में राव बहादुर सिंह, उत्तर में बहादुरगढ़ और फरुर्खनगर के बलोच प्रमुख और दक्षिण में भरतपुर के दिग्गज जाट शासक सूरज मल।' 
 
गुडग़ांव जिला कुछ इस प्रकार था, 'उस वक्त यह जिला (पाली परगना शामिल नहीं जिसे 1863 में दिल्ली को स्थानांतरित कर दिया गया था) 11 परगना से मिलकर बना था- झारसा, सोहना, नूह, हथिन, पलवल, होडल, पुन्हाना, फिरोजपुर, बहोरा, रेवाड़ी और शाहजहांपुर। सन 1803 में यह अंग्रेजी नीति का सिद्घांत था कि  जहां तक संभव हो यमुना को ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र की सीमा बनाया जाए तथा सीमा और विदेशी भूभाग  के बीच अद्र्घ स्वायत्त राज्यों को बफर स्टेट बनाकर रखा जाए। इस नीति के प्रभाव के चलते ही धीरे-धीरे इस जिले का अधिकांश हिस्सा ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया।'
 
सिंचाई की कहानी भी बहुत दिलचस्प है, 'पुराने जमाने में जब स्थानीय शासकों का शासन था तो अधिकांश सिंचाई पहाड़ी झरनों पर बनाए गए बांधों से की जाती थी। परंतु सिंचाई विभाग के अधीन इनमें से अधिकांश धीरे-धीरे नष्टï हो गए क्योंकि इनसे बहुत अधिक राजस्व हासिल नहीं होता था। परंतु सन 1879 में जब डिस्ट्रिक्ट फंड कमेटी ने कार्यभार संभाला तब से कुछ पुराने बांधों में सुधार कार्य किया गया और कई नए बांध बनाए गए।'  अन्य जिलों की बात करें तो सिंचाई के चलते स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ समस्याएं भी सामने आईं। 
 
इसमें लिखा है, 'नूह के आसपास के बाढ़ वाले इलाकों में प्रचुर बारिश वाले वर्षों में बुखार के मामले बहुत अधिक संख्या में देखने को मिलते हैं। नूह में कम ही लोग लंबे समय तक स्वस्थ रह सकते हैं। जिले के ऊपरी स्थान जिनमें पलवल और पूर्वी नूह और फिरोजपुर आदि शामिल थे, अपेक्षाकृत स्वस्थ क्षेत्र माने जाते हैं। लेकिन आगरा नहर के साथ लगे रास्ते पर भी बुखार की समस्या देखने को मिली और इसके साथ ही वह ऊपरी मैदानी इलाकों तक भी आ गई। सन 1878-79 में जिले के पूर्वी हिस्से में और 1879-80 में पूरे जिले में बुखार का प्रकोप फैल गया। रेवाड़ी कस्बा सन 1873 में सहीबी नदी के आकस्मिक रूप से चढ़ आने के बाद से ही अस्वस्थ है।'
 
बीमारियों का इलाज किस प्रकार होता था? यह बताता है, 'आम कृषि आधारित आबादी के बीच शायद ही दवाओं का कोई प्रचलन है। बुखार बीमारी का सबसे आम प्रकार था और उसके लिए छाछ में महीन चूर्ण डालकर लिया जाता और पानी पिया जाता है। कई बार खेतों में जमकर मेहनत की जाती ताकि पसीना बहे। बिच्छू के डंक मारने पर डंक मारने वाली जगह पर प्याज जैसे पौधे की जड़ को रगड़ा जाता, बिच्छू को जलाकर उसकी राख, गाय के कान का मैल या खरगोश का अपशिष्ट मला जाता है। कई बार बिच्छू को घी में पकाकर उसका लेप डंक वाली जगह पर लगाया जाता। सांप के काटने या पागल कुत्ते के काटने पर भी ऐसे ही इलाज प्रचलित हैं। परंतु ये सब गांवों में प्रचलित इलाज के तरीके थे। कस्बों में जाने पर हकीम यूनानी दवाओं का इस्तेमाल करते नजर आते हैं।'
 
मीणा जनजाति की बात करें तो, 'आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत मीणा जनजाति के लोगों में दंडित होने की दर दोगुनी है। इस वक्तव्य से ऐसा लगता है कि जहां जाट, ब्राह्मण और अहीर आमतौर पर कानून का पालन करने वाले लोग हैं। वहीं गुजर, मेव और बनिया वर्ग का झुकाव अपराध की ओर होता है जबकि इस मामले में मीणा जनजाति औरों से बहुत आगे रखी जा सकती है। सन 1878 में जब मेवात जबरदस्त अभाव से जूझ रहा था, उस वक्त मेव समुदाय को कम आपराधिक जनजाति में शामिल किया गया। इससे यही अनुमान लगाया जा सकता है कि जाट और गूजर अब तुलनात्मक रूप से कम आपराधिक हैं जबकि अहीर और बनिया कहीं अधिक। इनमें से जिस जनजाति के लिए आपराधिक जनजाति अधिनियम के प्रावधानों का विस्तार करना पड़ा वह है मीणा। ये अक्सर शाहजहांपुर में पाए जाते हैं जो अलवर से घिरा हुआ है। उनमें से कई गुरौरा में भी रहते हैं। उनमें लूट की प्रवृत्ति है और सुधार की गुंजाइश नहीं है। वे कड़े से कड़े प्रावधानों को भी धता बता देते हैं, उनमें से कई अक्सर डकैती के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। ये प्राय: राजपूत बहुल राज्यों में रहते हैं। वे राजमार्गों पर लूट करने में दक्ष होते हैं और वे बहुत प्रसन्नतापूर्वक और साहस के साथ इनका क्रियान्वयन करते हैं। वे हिंसक प्रतिरोध के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। उनको जमीन आवंटित करके सुधारात्मक जीवन बिताने के लिए गांवों में बसाने के प्रस्ताव बनाए गए। उन्हें क्लास रेजिमेंट में भर्ती करने का विचार भी सामने रखा गया। अलवर में इस जनजाति के अन्य लोगों को सैन्य सेवाओं में नियुक्त किया गया और उन्हें खेतिहर बनाया गया। यह बात संतोषजनक है कि जिस वक्त मीणा समुदाय के बारे में ये तमाम बातें लिखी जा रही थीं उस वक्त तक उनके अपराध मामलों में दोषसिद्धि में कमी आ चुकी है और उनमें से कई समेत अन्य ईमानदार गतिविधियों में संलग्न हैं। कुछ अन्य पुलिस सेवा में चले गए हैं तथा कुछ अन्य गांवों में चौकीदार की भूमिका में देखे जा सकते हैं।'
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
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