बिजनेस स्टैंडर्ड - देश में ही रहे डाटा
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देश में ही रहे डाटा

संपादकीय /  October 16, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक ने जोर देकर कहा था कि भुगतान संबंधी गतिविधियों से जुड़ी सभी कंपनियां भारत से जुड़े डाटा और डाटा प्रसंस्करण गतिविधियों को 15 अक्टूबर तक भारत में स्थित सर्वर में स्थानांतरित करें। इस मांग को कई वजह से जायज ठहराया जा सकता है। आरबीआई चाहता है कि भुगतान संबंधी डाटा तक उसकी निगरानी पहुंच सुनिश्चित हो। इसे लेकर कोई आपत्ति भी नहीं की जा सकती। डाटा की संप्रभुता को आधार बनाकर डाटा के स्थानीयकरण को भी उचित ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए थोड़ा दूर की सोचें। अगर डाटा अमेरिकी सर्वर में हो और अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाए तो डाटा भी इसकी जद में आ जाएगा। बहरहाल, निगरानी पहुंच और डाटा संप्रभुता की ऐसी चिंताओं को 'मिररिंग' के जरिए आसानी से हल किया जा सकता है। यानी डाटा की प्रतियों को भारत में रखकर भी लेनदेन को बाहर अंजाम देते रहना। यह तरीका कंपनियों की प्राथमिकता में होता परंतु आरबीआई ने इस विकल्प को नकार दिया है। संक्षेप में कहें तो आरबीआई की इच्छा है कि डाटा का भंडारण और प्रसंस्करण दोनों भारत में हों।

 
इसे लेकर कंपनियों के नाखुश होने की कई वजह हैं। वैश्विक कारोबारी मसलन बैंक, ई-कॉमर्स कंपनियां, फिन-टेक सेवा प्रदाता और क्रेडिट कार्ड कंपनियां अपना सारा भंडारण और प्रसंस्करण एक या दो वैश्विक केंद्रों में करती हैं। इसे स्थानांतरित करने की प्रक्रिया की लागत बहुत अधिक आएगी और इससे काफी विसंगति पैदा होगी। इसके लिए नई टीम रखनी होगी और उसके प्रशिक्षण और सुरक्षा प्रक्रिया आदि की समीक्षा और उनमें संशोधन करना होगा। स्थानीय बुनियादी ढांचा भी कमियों से रहित नहीं है। हमारे देश में डाटा स्थानांतरण की गति वैश्विक मानकों से धीमी है। सर्वर क्षमता कम है और लागत अधिक है। आरबीआई का इस पर जोर देने से छोटी भुगतान कंपनियां भारत में सेवा देना बंद कर सकती हैं। इससे स्टार्ट अप की लागत भी बढ़ेगी क्योंकि भारतीय स्टार्ट अप्स को भी भुगतान विकल्प समेत बढ़ी लागत चुकानी होगी।
 
निश्चित तौर पर अन्य चिंताएं भी हैं। उदाहरण के लिए भारत में डाटा संरक्षण कानून नहीं है और मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए लगता नहीं कि 2019 के आम चुनाव के पहले ऐसा कोई कानून बनेगा। श्रीकृष्ण समिति ने डाटा संरक्षण पर जो अनुशंसाएं दी हैं, उन पर अभी जनता की राय ली जा रही है और  लगता नहीं कि डाटा स्थानीयकरण समेत विवादित मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट होने के पहले उसे मसौदा विधेयक के रूप में संसद के समक्ष पेश किया जाएगा। भारत में पर्याप्त सुरक्षा मानक भी नहीं हैं। कई बार भुगतान के रिकॉर्ड और क्रेडिट कार्ड डाटा समेत संवेदनशील जानकारी के लीक होने की घटनाएं घटित हो चुकी हैं। सरकारी एजेंसियों की निगरानी भी एक दिक्कतदेह क्षेत्र है। कानून और व्यवस्था के विभाग और सुरक्षा एजेंसियां फिलहाल ऐसी परिस्थिति में काम कर रही हैं जहां वे किसी भी तरह के डिजिटल डाटा की जांच कर सकती हैं। इस पर कोई रोकटोक नहीं है। यकीनन ऐसे प्रमाण हैं कि विदेशी खुफिया एजेंसियां भी भारत को ढेर सारा डाटा और मेटा डाटा जुटाती हैं। उदाहरण के लिए एडवर्ड स्नोडेन द्वारा की गई लीक जानकारी लीक में यह सूचना शामिल थी कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी भारत से हर माह 12.6 अरब डाटा और मेटा डाटा जुटाती हैं।
 
डाटा स्थानीयकरण पर जोर डाटा संप्रभुता की दृष्टि से उचित प्रतीत होता है। परंतु इसके साथ-साथ हमें मजबूत डाटा संरक्षण कानून भी लाना चाहिए जो निगरानी की सीमा को स्पष्ट परिभाषित करे। इसके अलावा ऐसी नीति भी आनी चाहिए जो उच्च सर्वर क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन दे और सस्ते तथा तेज डाटा स्थानांतरण की सुविधा दे। 
Keyword: RBI, bank, data, card, visa, master card,,
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