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बायबैक के ऐलान से मिलता है शेयरों से निकलने का अच्छा मौका

संजय कुमार सिंह /  October 14, 2018

बायबैक अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हैं, लेकिन अब इनका चलन भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है। साथ ही यह कंपनियों के लिए अपने शेयरधारकों को प्रतिफल देने का तरीका भी बन गया है। वर्ष 2018 के पहले 9 महीनों में कंपनियां 365.4 अरब रुपये के बायबैक पूरे कर चुकी हैं। इस मामले में भरपूर नकदी वाली आईटी कंपनियां सबसे आगे हैं। यह रुझान आगे भी जारी रहने के आसार हैं।  कंपनियों के पास अतिरिक्त नकदी शेयरधारकों को लौटाने के दो तरीके हैं। भारत में परंपरागत तरीका लाभांश देना रहा है। दूसरा तरीका बायबैक है, जिसमें कंपनी अपने आउटस्टैंडिंग शेयरों के एक हिस्से को वर्तमान बाजार कीमत से अधिक पर खरीदती है। आउटस्टैंडिंग शेयरों का मतलब कंपनी की तरफ से जारी और शेयरधारकों के पास रखे शेयरों से है। 

 
लाभांश पर बायबैक को तरजीह 
 
इन दिनों कंपनियां लाभांश के बजाय बायबैक विकल्प ज्यादा पसंद कर रही हैं क्योंकि लाभांश में स्थिति के हिसाब से बदलाव की गुंजाइश नहीं होती है। इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस में लेक्चरर (फाइनैंस) के वैद्यनाथन ने कहा, 'आम तौर पर कोई कंपनी एक साल में एक बार लाभांश देती है। वह लाभांश की दर एक साल से दूसरे साल में ज्यादा बदल नहीं सकती। ऐसा करने से शेयरधारकों में अगले वर्षों को लेकर उम्मीदें पैदा होती हैं। दूसरी तरफ कंपनी अपनी मर्जी से बायबैक ला सकती है।'  इसके अलावा बायबैक में लाभांश की तुलना में कर कम चुकाना होता है। सरकार उन कंपनियों पर बहुत से कर लगाती है, जो कॉरपोरेट टैक्स चुकाने के बाद अपने शेयरधारकों में लाभ का वितरण करना चाहती हैं। कंपनियों को 15 फीसदी लाभांश वितरण कर के अलावा 12 फीसदी अधिभार और 4 फीसदी उपकर का भुगतान करना होता है। इस तरह कुल कर भार 20.56 फीसदी आता है। 
 
फेयर्स सिक्योरिटीज के मुख्य कार्याधिकारी और सह-संस्थापक तेज खोडे ने कहा, 'सरकार ने  2016 में 10 लाख रुपये से अधिक लाभांश प्राप्त करने वाले शेयरधारकों पर 10 फीसदी कर भी लगा दिया है।' कंपनियां लाभांश पर अधिक करों के कारण बायबैक के विकल्प को ज्यादा तरजीह दे रही हैं।  इन दिनों कंपनियां लाभांश के बदले छोटे बायबैक करती हैं। ये आम तौर पर इक्विटी के तीन फीसदी से भी कम होते हैं। अगर कंपनियों को लगता है कि उनके शेयर की कीमत वाजिब स्तर से नीचे है और उनके पास अतिरिक्त नकदी है तो वे बड़े बायबैक की घोषणा करती हैं। 
 
सेबी में पंजीकृत स्वतंत्र इक्विटी रिसर्च कंपनी स्टॉल्वर्ट एडवाइजर्स के संस्थापक और सीईओ जतिन खेमानी ने कहा, 'ऐसे बायबैक से आउटस्टैंडिंग इक्विटी कम हो जाती है, जबकि प्रति शेयर आमदनी और अपने शेयरों को खरीदने वाले निवेशकों की हिस्सेदारी में अहम इजाफा होता है।' जब आउटस्टैंडिंग शेयरों की संख्या कम हो जाती है तो कंपनी की आमदनी कम शेयरों में बंटती है, जिससे प्रति शेयर आमदनी (ईपीएस) में इजाफा होता है। इक्विटी पर प्रतिफल जैसे अनुपात भी बेहतर नजर आने लगते हैं। इन सब चीजों से कंपनी के शेयर की कीमत को मजबूती मिलती है। 
 
कई बार कंपनियां मंदे बाजार में बायबैक का इस्तेमाल शेयर की कीमत को सहारा देने के लिए करती हैं। बायबैक कंपनी की संभावनाओं में प्रबंधन का भरोसा दिखाने का भी जरिया है। इसका एक अच्छा उदाहरण इन्फोसिस है, जिसने विशाल सिक्का के कंपनी से इस्तीफा देने के बाद बायबैक किया था।  नंदन नीलेकणी के चेयरमैन बनने के बाद कंपनी यह संदेश देना चाहती थी कि शेयर बाजार ने सिक्का के इस्तीफे को लेकर जरूरत से अधिक प्रतिक्रिया दिखाई थी और प्रबंधन इसकी संभावनाओं को लेकर उत्साहित है। इसलिए इन्फोसिस ने बायबैक किया, जिससे उसके शेयरों की कीमत को मजबूती देने में मदद मिली। 
 
बायबैक को नकारात्मक नजरिये से न देखें 
 
ज्यादातर बायबैक बड़ी और पुरानी कंपनियां लेकर आती हैं, जिन्हें अपनी वृद्धि के लिए छोटी और मझोली कंपनियों जितनी पूंजी की जरूरत नहीं होती है। हालांकि उन्हें हमेशा नकारात्मक नहीं माना जाना चाहिए। कुछ उद्यमों में ज्यादा संपत्तियों की जरूरत नहीं होती है, इसलिए उन्हें वृद्धि के लिए बड़ी मात्रा में पूंजी की जरूरत नहीं होती है। इसकी एक वजह बाहर से विनिर्माण कराना हो सकता है, जिसका एक उदाहरण सिंफनी लिमिटेड है। आईटी और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों जैसे सेवा क्षेत्र के कारोबारों में भी ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है। 
 
खेमानी ने कहा, 'ऐसे मामलों में आमदनी के एक बड़े हिस्से का भुगतान करना बेहतर होता है, बजाय इसे बैलेंस शीट में बनाए रखने के। अनुपयोगी नकदी पर मुश्किल से 6 से 7 फीसदी प्रतिफल मिलता है और इससे कंपनी का इक्विटी प्रतिफल कम होता है।'  ऐसे कम संपत्तियों वाले कारोबारों में शेयर खरीदने वालों को बायबैक से बचना चाहिए। कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग के प्रमुख (फंडामेंटल रिसर्च) विवेक रंजन मिश्रा ने कहा, 'अगर कोई कंपनी अतिरिक्त नकदी जमा करती जा रही है और इसे शेयरधारकों को नहीं लौटा रही तो यह कंपनी के परिचालन के लिहाज से सकारात्मक नहीं है। इसमें यह जोखिम होता है कि उस धन को ऐसी परियोजनाओं में निवेश किया जा सकता है, जिनमें कम प्रतिफल मिले।'
 
कई बार बायबैक कंपनी की संभावनाओं में प्रबंधन के भरोसे को दिखाने का तरीका होता है। वैद्यनाथन ने कहा, 'बायबैक लाकर कंपनियां यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि शेयर की कीमत वाजिब स्तर से कम है, इसलिए यह आकर्षक खरीद है। कई बार वे यह संदेश भी देने की कोशिश करते हैं कि कंपनी की कमाई की संभावनाएं आगे भी अच्छी बनी रहेंगी।'
 
लंबी अवधि की संभावनाएं 
 
अगर कोई कंपनी लाभांश के बदले छोटा बायबैक ला रही है और निवेशक को रकम की जरूरत है तो वह उसी अनुपात में शेयर बेच सकता है। बड़े बायबैक में फंडामेंटल आधारित और लंबी अवधि के निवेशकों का फैसला कंपनी और उस क्षेत्र की वृद्धि की संभावनाओं को लेकर उनके नजरिये पर निर्भर करता है। वैद्यनाथन ने कहा, 'अगर आप यह मानते हैं कि कंपनी जो संकेत देने की कोशिश कर रही है, वह विश्वनीय है और उसकी आगे की संभावनाएं अच्छी हैं तो शेयरों को बनाए रखें। लेकिन अगर आपको लगता है कि वृद्धि सुस्त पड़ रही है और उसके पास अपनी नकदी को निवेश करने की जगह नहीं है तो अपने शेयरों को वापस कर देना अच्छा हो सकता है।'
 
जो निवेशक बाजार में सक्रियता से कारोबार करते हैं, वे बायबैक में दी जा रही कीमत और स्टॉक की छिपी हुई कीमत की तुलना कर सकते हैं। अगर वे यह सोचते हैं कि शेयर की कीमत उसके अंदर छिपे मूल्य से अधिक है तो उन्हें इसे बेच देना चाहिए। शेयरों को वापस करने में इस चीज का भी ध्यान रखना चाहिए कि बायबैक में वर्तमान कीमत से कितनी अधिक कीमत दी जा रही है और स्वीकार्यता अनुपात (वापस किए जाने वाले शेयरों को किस अनुपात में स्वीकार किया जाएगा) का ध्यान रखना चाहिए।  इन दिनों ज्यादातर बायबैक शेयर बाजार के जरिये ही होते हैं, जहां लेनदेन पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) का भुगतान करना होता है। ऐसे मामलों में दीर्घावधि पूंजीगत लाभ पर 10 फीसदी और अल्पावधि के लाभ पर 15 फीसदी कर लगता है। 
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