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हर तीन-चार साल में बाजार लडख़ड़ाता है

पुनीत वाधवा /  October 14, 2018

सितंबर में बाजार में हाल के शीर्ष स्तर से 11 फीसदी तक की गिरावट हुई। आदित्य बिड़ला सन लाइफ एएमसी में मुख्य कार्याधिकारी ए बालासुब्रमण्यन ने पुनीत वाधवा को बताया कि 2018 में अब तक उनकी निवेश रणनीति शेयर आधारित निवेश पर केंद्रित रही है। पेश हैं बातचीत के संपादित अंश: 

 
अगले कुछ महीने के दौरान आप बाजार में किस तरह की गतिविधियों की उम्मीद करते हैं?
 
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, मुद्रा में अनिश्चितता और बढ़ती ब्याज दरों की वजह से वृहद माहौल में बदलाव को देखते हुए अब तक यह साल काफी मुश्किल रहा है। इन बदलावों की वजह से न केवल भारत के बाजार में अनिश्चितता आई है बल्कि सभी उभरते बाजारों में यही स्थिति है। भारत के हिसाब से देखें तो बुनियादी आर्थिक वृद्धि में सुधार की स्थिति है लेकिन बाहरी कारक काफी चुनौतीपूर्ण हो रहे हैं। हमारा यह मानना है कि देश में प्रत्येक तीन-चार सालों में ऐसा दौर आता है। 
 
चालू वित्त वर्ष 2018 में आपकी निवेश रणनीति कैसी रही है खासतौर पर हाल में बाजार में हुई बिकवाली को देखते हुए?
 
हमारी निवेश रणनीति शेयर आधारित निवेश मौके पर केंद्रित करने की रही है। साथ ही हम पोर्टफोलियो में कुछ सेक्टर केंद्रित निवेश पर भी फैसला करते हैं। हमारी सभी इक्विटी योजनाओं में 6 फीसदी से 9 फीसदी वाले पोर्टफोलियो में जिसमें ज्यादा निवेश था उसको भुनाने के अलावा हाल में बाजार में हुई बिकवाली के दौरान भी हमारी रणनीति समान ही रही है। सभी सेक्टर में हाल में दिखी गिरावट का इस्तेमाल भी हमने अपने पोर्टफोलियो आवंटन पर दोबारा विचार करने पर किया है।
 
क्या आप अपनी योजनाओं से निवश निकासी का कोई दबाव देख रहे हैं?
 
मुद्रा बाजार में जब भी प्रतिफल पक्का होता है तब भुुनाने की प्रक्रिया देखी जाती है और हम पिछले कुछ महीने से ऐसा देख रहे हैं। इसके अलावा कुछ ऋण संबंधी चीजें भी होती हैं और इसका नतीजा गैर-बैंकिंग वित्त बाजार पर पड़ता है। इससे डेट फंड को भी भुनाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। हालांकि इक्विटी योजनाओं को काफी पूंजी मिली है लेकिन यह पिछले कुछ सालों में कम ही है। हम इक्विटी में पूंजी प्रवाह कम ही देख रहे हैं। हालांकि इसी दौर में उद्योग में 60 अरब रुपये से लेकर 80 अरब रुपये तक की शुद्ध पूंजी भी मिलेगी जिसको सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) की बुकिंग आकार में हुई वृद्धि का समर्थन है। 
 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद डेट सेगमेंट में कैसे रुझान दिखने की उम्मीद है?
 
आरबीआई खाद्य से जुड़ी बुनियादी मुद्रास्फीति को लेकर सहज स्थिति में है क्योंकि पिछले कुछ सालों में खाद्य की स्थिति नियंत्रण में रही है। शीर्ष बैंक ने दरों में बदलाव नहीं किया और मुद्रा की गति और वैश्विक ब्याज दर में बढ़ोतरी के आधार पर नजरिये को तटस्थ से आक्रामक बनाया है। हालांकि बॉन्ड बाजार सॉवरिन और कॉरपोरेट बॉन्ड में विभाजित है। ऋण का दायरा बढऩा शुरू हो गया है और सॉवरिन बॉन्ड के प्रतिफल में नीतिगत कदम के बाद गिरावट देखी जा रही है। हमारा यह मानना है कि यह स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी और ऋण बाजार आगामी महीने में उपयुक्त तरीके से जोखिम पर भी ध्यान देंगे ऐसे में निश्चित तौर पर हम उच्च और निम्न दरों के बॉन्ड में अंतर कर रहे हैं।
 
कॉरपोरेट कमाई वृद्धि पर आपका क्या विचार है?
 
हमारा यह मानना है कि निर्यात और उपभोग आधारित कंपनियों की कमाई बेहतर रहेगी। हालांकि वित्तीय क्षेत्र की दर्जनों कंपनियां अपेक्षाकृत कम मार्जिन की बात कह सकती हैं और जिन कंपनियों को कच्चे माल पर निर्भर रहना पड़ता है और जिसका ताल्लुक कच्चे तेल की कीमतों से भी है वे मार्जिन में गिरावट दर्ज कर सकती है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार दिख सकता है, खासतौर पर खुदरा कर्ज में वृद्धि के जरिये उनकी कर्ज वृद्धि और मार्जिन में सुधार दिखेगा।
 
क्या सक्रिय फंडों को बेंचमार्क सूचकांक की तुलना में निवेश पर ज्यादा रिटर्न पाने में दिक्कत होगी?
 
लघु अवधि में सूचकांक में कुछ चुनिंदा शेयरों में उनके वजन में थोड़ा बदलाव को देखते हुए सक्रिय मुद्रा प्रबंधकोंं को बेंचमार्क के मुकाबले ज्यादा रिटर्न पाने में मुश्कि होगी। लेकिन देश में लार्ज कैप सूचकांक से बाहर शेयरों में मौके को देखते हुए तीन साल या इससे थोड़ा ज्यादा वक्त में मुद्रा प्रबंधकबेंचमार्क सूचकांक के मुकाबले निवेश पर ज्यादा रिटर्न पा सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से इसी तरह से चीजें होती हैं और ऐसे में लोगों को मुद्रा प्रबंधकों की दीर्घावधि में रिटर्न पाने की क्षमता पर यकीन करना चाहिए। कुल परिसंपत्ति आवंटन में इंडेक्स फंड को भी उनके पोर्टफोलियो की विविधता का हिस्सा मानना चाहिए। 
 
क्या बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में गिरावट किसी मौके का संदेश दे रही हैं?
 
एनबीएफसी क्षेत्र में शेयरों में काफी गिरावट देखी गई है लेकिन निवेशकों को पूरे सेक्टर को ना बोलने से पहले प्रत्येक कंपनियों की वृद्धि आकांक्षाओं पर भी विचार करना चाहिए। लोगों को यह बात दिमाग में रखनी चाहिए कि वित्तीय सेवा क्षेत्र भारतीय कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है और एक क्षेत्र को दीर्घावधि के निवेश के लिहाज से देखा जाना चाहिए। मुमकिन है कि बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव दिखे क्योंकि बैंक का जोर खुदरा वृद्धि को बढ़ाने पर है और इसमें गतिविधि देखी भी गई है। ऐसे में उनके प्रदर्शन में दीर्घावधिन नजरिये का सुधार है।
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