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अद्र्ध-मीडिया फर्म में हो रहीं तब्दील कलाकार प्रबंधन एजेंसियां

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  October 14, 2018

कुछ समय पहले शाहरुख खान, आमिर खान और महेश बाबू फिल्मी सितारों की ब्रांडिंग करने वाली कंपनी स्पाइस ने रिलायंस के साथ मिलकर डिजिटल मार्केटिंग फर्म एन्ट्रॉपी शुरू करने का समझौता किया है। रनबीर कपूर और दीपिका पडुकोणे जैसी 150 खेल एवं मनोरंजन हस्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली फर्म क्वान इंटरटेनमेंट ने सावन और फैंटम फिल्म्स (अब विघटन हो चुका है) के गठन में मदद की थी। वर्ष 2015 में इसने संगीतकार प्रीतम के साथ मिलकर संगीत सृजन फर्म स्टूडियो जैम8 की शुरुआत की थी। पिछले महीने इसने दक्षिण भारत के अपने उपक्रम क्वान साउथ के माध्यम से लिटरेचर टीम भी शुरू की है जो बेहतरीन सामग्री के निर्माण और इसके लिए दर्शक तलाशने में मदद करेगी। लेखकों एवं निर्देशकों की सबसे बड़ी भारतीय एजेंसी टुलसी नियमित तौर पर फाइनेंसरों और निर्माताओं को एक साथ जोड़ती है।

 
प्रतिभाओं का प्रबंधन करने वाली एजेंसियों के अद्र्ध-मीडिया कंपनियों में तब्दील होने से क्या स्टूडियो और प्रसारकों को चिंतित होना चाहिए? शायद ऐसा नहीं है। इसकी वजह जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। अभी तक क्वान, ब्लिंग और मैट्रिक्स जैसी प्रतिभा प्रबंधन फर्मों ने भारत के तेजी से बढ़ते एवं अराजक मनोरंजन उद्योग के बेहद अस्त-व्यस्त हिस्से- रचनात्मक प्रतिभा को व्यवस्थित करने का शानदार काम किया है। याद कीजिए, बीते दशक में फिल्म उद्योग 60 फीसदी से अधिक बढ़ा है और प्रसारण उद्योग का राजस्व तो 300 फीसदी बढ़ा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि रचनात्मक कार्यों में शामिल प्रतिभावान लोगों की मांग 200-300 गुनी तक बढ़ गई है। लेकिन निर्माण कार्यों में स्टूडियो और खुदरा कारोबार में मल्टीप्लेक्स की संगठित गतिविधियों के बावजूद प्रतिभावान रचनाधर्मियों की आपूर्ति निराशाजनक ढंग से असंगठित ही रही। हालांकि नई सहस्राब्दी के शुरुआती वर्षों में प्रतिभावान लोगों की आपूर्ति करने वाली एजेंसियों के आने से हालात बदले।
 
टुलसी, क्वान और मैट्रिक्स जैसी एजेंसियां मनोरंजन उद्योग में दाखिल होने की चाह रखने वाले लोगों में से काबिल लोगों को चुनती हैं, उनका संवद्र्धन करती हैं और माकूल कहानी, स्टूडियो या प्रोजेक्ट के हिसाब ने उन्हें भेजती हैं। इनमें कई ऐसे काम भी हैं जो पहले सितारों की मां, सचिव या सहायक किया करते थे। सही स्क्रिप्ट की तलाश में निर्माण स्टूडियो के चक्कर लगाना, लेखकों के कमरों, ब्रांड और प्रायोजन अनुबंधों के बीच तालमेल बिठाना और प्रतिभावान लोगों का मूल्य एवं लागत तय करने जैसे काम शामिल हैं। अधिकतर लेखक बताते हैं कि किसी एजेंसी के जरिये उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर मिलने वाली कीमत से 50-100 फीसदी अधिक राशि मिल जाती है। इसके अलावा इन एजेंसियों के पास वकील एवं दूसरे पेशेवर लोग भी हैं जिनसे अभिनेता, लेखक या निर्देशक आम तौर पर अनजान होते हैं। इसके पीछे सोच यही है कि रचनात्मक लोग उसी काम यानी सृजन पर फोकस करें जिसमें वे माहिर हैं।
 
अकेले क्वान ने ही वर्ष 2017 में 50 फिल्मों, 60 टीवी शो और 20 वेब सीरीज के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। इस एजेंसी ने 1,500 सजीव कार्यक्रमों के आयोजन में भी अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा खेल एवं मनोरंजन जगत से जुड़ी शख्सियतों और ब्रांड के बीच 2,500 करार कराने में भी क्वान का अहम योगदान रहा। इसके पास प्रतिभावान लोगों की उपलब्धता के अलावा प्रदर्शन के लिए माध्यम एवं प्लेटफॉर्म भी मौजूद है। क्वान के संस्थापक अनिर्बन दास ब्लॉ कहते हैं, 'मैं भारत के फिल्म, मनोरंजन, संगीत, कॉमेडी एवं खेल जगत के लिए एमेजॉन की तरह का बी2बी प्लेटफॉर्म बनना चाहता हूं।' ऐसा होने से क्या क्वान अपने ग्राहकों के साथ संघर्ष की स्थिति में आ जाएगा? इस सवाल पर ब्लॉ कहते हैं, 'हम लंबी अवधि वाले कंटेंट में दखल नहीं देंगे क्योंकि नेटफ्लिक्स जैसे स्टूडियो ही हमारे सबसे अहम खरीदार हैं लिहाजा इसमें हितों का टकराव निहित है। लेकिन उपभोक्ता खुदरा या जिंगल्स, ब्रांडेंड कंटेंट जैसे छोटे कामों में कोई टकराव नहीं है।'
 
अधिकांश टैलेंट एजेंसियों के प्रमुख अमेरिकी व्यवस्था का उदाहरण देते हैं जहां विलियम मॉरिस एंडीवर (डब्ल्यूएमई), आईएमजी या क्रिएटिव आर्टिस्ट एजेंसी (सीएए) का समूचे रचनात्मक पहलुओं पर दबदबा बना हुआ है। इन सभी एजेंसियों में डब्ल्यूएमई सबसे आगे है और उसका विभिन्न मीडिया फर्मों और डिजिटल विज्ञापन फर्मों में हिस्सेदारी भी है। वर्ष 2013 में उसने खेल प्रबंधन से जुड़ी फर्म आईएमजी का अधिग्रहण भी किया था। स्पाइस के संस्थापक प्रभात चौधरी कहते हैं, 'डब्ल्यूएमई या सीएए जैसी एजेंसियां विकसित अर्थव्यवस्था में सक्रिय हैं जहां पर सभी घटक स्थिर हैं। वहां स्टूडियो की ताकत और आंतरिक लोकतंत्र भी सशक्त हो चुका है। इसके उलट भारत में अभी हम विकास की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। हमारे यहां का स्टार सिस्टम भी सामंती है।' उनकी इस बात में दम है। भारत में स्टूडियो अब भी सीधे एजेंसियों के जरिये काम करने की सोच से सहज नहीं हो पाए हैं। अधिकतर लेखक, निर्देशक और अभिनेता यह कबूल करते हैं कि अगर मामले से कोई मैनेजर जुड़ा हुआ है तो उन्हें पहली बैठक में काफी असहज लगता है। 
 
जरा इसके बारे में गौर कीजिए। करीब 15 साल पहले किसी ने भी नहीं सोचा था कि कोई निर्माता किसी लेखक या निर्देशक की सेवाएं लेने के लिए टैलेंट एजेंसी को भुगतान करने को तैयार होगा। लेकिन अब ऐसा होता है। इन एजेंसियों का मनोरंजन कारोबार के अन्य क्षेत्रों में दखल बढऩा भारत के मनोरंजन जगत के विकास में एक अगला कदम भर ही है।
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