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सर्वाधिक शक्तिशाली सुरक्षा सलाहकार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 14, 2018

देश के सुव्यवस्थित प्रशासनिक ढांचे खासतौर पर अपेक्षाकृत रूढि़वादी सुरक्षा नौकरशाही की पृथ्वी से तुलना करना उचित ही है क्योंकि कई परतों वाली यह व्यवस्था इतनी धीमी गति से चलती है कि आपको उसकी गति का अंदाजा ही नहीं लगता। जब ये परतें अचानक तेजी से स्थान बदलने लगती हैं तो वही होता है जिसे हम भूकंप और ज्वालामुखी के नाम से जानते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महज एक अधिसूचना की मदद से रातोरात कुछ ऐसा ही किया है। इस अधिसूचना की मदद से देश में एकदम नया सुरक्षा ढांचा तैयार किया गया है। यह है नया सामरिक नीति समूह (एसपीजी)। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित कुमार डोभाल को इसका अध्यक्ष बनाया गया है। 

 
18 सदस्यों वाले इस समूह में तीनों सेनाओं के प्रमुख आईबी और रॉ के मुखिया शामिल हैं। इसके अलावा रक्षा, गृह, वित्त और अंतरिक्ष सचिव इसमें शामिल हैं। कुछ चौंकाने वाले सदस्य भी हैं। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, राजस्व सचिव और सबसे रोचक नाम कैबिनेट सचिव का है। कैबिनेट सचिव आमतौर पर देश के सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होते हैं। गौरतलब है कि कैबिनेट सचिव का पद संवैधानिक है जबकि एनएसए का नहीं। इस संक्षिप्त अधिसूचना में तीन और दिलचस्प बिंदु हैं। पहला, एनएसए किसी भी अन्य विभाग के सचिवों को एसपीजी की बैठक में तलब कर सकता है। दूसरा, कैबिनेट सचिव एसपीजी के निर्णयों को केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों तक क्रियान्वित करने में समन्वयक की भूमिका निभाएंगे और तीसरा, इस अधिसूचना पर प्रधानमंत्री कार्यालय या कैबिनेट सचिवालय के प्रासंगिक अधिकारी के हस्ताक्षर के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) के संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर हैं। जैसा कि अधिसूचना में संकेत है, एसपीजी की स्थापना अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार ने की थी। उस वक्त इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव के पास थी। एनएसए और योजना आयोग के उपाध्यक्ष को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया था और यह कैबिनेट सचिवालय के अधीन काम करता था। अब अधिसूचना के बाद यह काम राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) के हवाले कर दिया गया है। कैबिनेट सचिव अब इसके अध्यक्ष के बजाय उसके निर्णयों को लागू कराने वाले मात्र रह गए हैं। एनएसए अब इसके नए प्रमुख हैं।चाहे जितना सामान्यीकरण किया जाए लेकिन यह एक बहुत संवेदनशील बदलाव है। नौकरशाही के आदेश का पालन करने अथवा विभिन्न सेवाओं के पदानुक्रम की आज्ञा मानने से इतर यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों को उठाता है जिन पर तत्काल बहस की आवश्यकता है।
 
इस दृष्टि से देखा जाए तो राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने का अधिकार कैबिनेट सचिवालय से एनएससीसी के हवाले किया जाना सही मायनों में एक बहुत बड़ा बदलाव है। कैबिनेट सचिवालय ही वह जगह है जहां रॉ का कार्यालय है। उसका बजट भी वहीं से आता है। तकनीकी तौर पर देखें तो यथास्थिति बरकरार रहेगी क्योंकि एसपीजी के निर्णय का क्रियान्वयन कैबिनेट सचिव करेगा लेकिन अब अधिकार उसके या कैबिनेट के पास नहीं रहेगा। कम से कम आधिकारिक रूप से ऐसा नहीं होगा। यह कहना उचित होगा कि सुरक्षा संबंधी मसलों पर एनएसए प्रधानमंत्री का शीर्ष सलाहकार है, वह प्रधानमंत्री द्वारा प्रदत्त प्राधिकार के आधार पर निर्णय लेगा। मैं अभी इस चीज को लेकर सुनिश्चित नहीं हूं कि क्या रायसीना हिल्स का सत्ता संबंधी ढांचा इस अनौपचारिक बदलाव को आसानी से हजम कर लेगा। 
 
इस बदलाव से उपजे कुछ अन्य बहसतलब मुद्दे इस प्रकार हैं: 
 
पहला, क्या इससे गृह, रक्षा और वित्त मंत्रियों की ताकत और उनका प्राधिकार प्रभावित नहीं होगा? उनके अधिकारी और सेवाओं के प्रमुख आकर उन्हें निर्णय से अवगत कराते हैं जबकि कैबिनेट सचिव यह सुनिश्चित करते हैं कि उनका पालन हो। दूसरा, अब सुरक्षा मसलों की कैबिनेट कमेटी के पास क्या काम रह जाएगा? शासन की कैबिनेट व्यवस्था में सामूहिक दायित्व सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसके मुताबिक सीसीएस के सभी सदस्य अहम मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं और उसके बाद सामूहिक निर्णय लिया जाता है। इस सामूहिक निर्णय में प्रधानमंत्री की बात का वजन सबसे अधिक होता है। सीसीएस में मतांतर होने पर बहस होना सामान्य बात है। परंतु अब जबकि निर्णय और नीति का निर्धारण व्यापक एसपीजी से होगा तो क्या बहस संभव हो पाएगी। वह भी तब जबकि इसके सभी शीर्ष अधिकारी और सेवा प्रमुख प्रधानमंत्री के प्राधिकार में आते हों? इस तरह देखा जाए तो अगर आपको प्रधानमंत्री के सोच के बारे में पहले से जानकारी हो तो बहस किस बात पर होगी? क्या गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री और विदेश मंत्री केवल रबर स्टैंप बनकर रह जाएंगे? तीसरा, फिलहाल यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि निकट भविष्य में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। परंतु इससे किसी भी तरह की बहस की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। यह बहस तो अंतहीन है। एक मजबूत प्रधानमंत्री के अधीन अक्सर निर्णय शीर्ष से नीचे की ओर निर्देशित होते हैं। हम इंदिरा गांधी के नेतृत्व में ऐसा होते देख चुके हैं। परंतु प्रधानमंत्री के समक्ष इस सत्ता का औपचारिक केंद्रीकरण, पारंपरिक ढांचे को हाशिये पर रखना और जांच परख की व्यवस्था को खत्म करना उचित नहीं है।
 
एक पल के लिए सोचिए राफेल को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या प्रश्न किया है? क्या उचित प्रक्रिया का पालन किया गया या फिर सदिच्छापूर्वक ही सही यह निर्णय प्रधानमंत्री ने स्वयं ले लिया और उसके बाद उसे जरूरी औपचारिकताएं पूरी की गईं? यह औचित्य का मसला है। निश्चित तौर पर पुराना और पारंपरिक नौकरशाही ढांचा अब बदलाव की मांग करता है। परंतु उसका यह अर्थ नहीं कि एक बहुस्तरीय संवैधानिक व्यवस्था को शीर्ष खिलाफत में बदलना कतई उचित नहीं है। एक और बात यह कि नौकरशाही के जाति आधारित पदानुक्रम (यह मेरा फॉर्मूला नहीं है बल्कि भारतीय पुलिस सेवा महासंघ ने सरकार के समक्ष यह कहा है) को चुनौती देने और श्रेष्ठता के आधार पर तय करने की आवश्यकता है। मोदी सरकार की हकीकत यह है कि कोई भी शीर्ष आईपीएस अधिकारी सेवानिवृत्त नहीं होता। उनमें से अधिकांश को दोबारा नियुक्ति मिल जाती है जबकि अधिकांश आईएएस और अैर विदेश सेवा अधिकारी सेवानिवृत्त होकर घर चले जाते हैं या फिर कॉर्पोरेट जगत से जुड़ जाते हैं। 
 
रॉ के पूर्व प्रमुख राङ्क्षजदर खन्ना अब डिप्टी एनएसएस हैं। उनके पहले इस पद पर आलोक जोशी थे जिन्हें राजग के सत्ता में आने के बाद बाद में राष्ट्रीय तकनीकी शोध संस्थान (एनटीआरओ) का चेयरमैन बना दिया गया था। वहां से उनकी सेवानिवृत्ति के बाद इस पद पर सतीश झा आए जो आईबी के पूर्व विशेष निदेशक हैं। इससे पहले उन्हें एनटीआरओ में सलाहकार पद पर नियुक्त किया गया था अब उनकी पदोन्नति हो चुकी है। पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा अब जम्मू कश्मीर के वार्ताकार हैं। आईबी से सेवानिवृत्त आर एन रवि को नगा वार्ताकार बनाया गया था लेकिन अब वह डिप्टी एनएसए हैं। रॉ के पूर्व सलाहकार, अमिताभ (टोनी) माथुर को तिब्बती मामलों का सलाहकार बना दिया गया। रॉ में नंबर दो रह चुके ए बी माथुर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं। इसके अलावा कर्नल सिंह सेवानिवृत्ति के बाद प्रवर्तन निदेशालय में और राष्ट्रीय जांच प्राधिकरण के पूर्व प्रमुख शरद कुमार अब सतर्कता आयुक्तों में से एक हैं। ये सभी सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं। एनएससीएस का बजट वर्ष 2016-17 के 81 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-18 में 333 करोड़ रुपये हो चुका है। दिल्ली के बीचोबीच स्थित सरदार पटेल भवन में मौजूद कई कार्यालय खाली कराए जा रहे हैं। एक नया साम्राज्य तैयार किया जा रहा है। 
 
मैंने इस विषय पर एक ट्वीट क्या कर दिया सरकार का बचाव करने वाले और डोभाल के प्रशंसकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। मजेदार बात है कि सबसे अधिक नाराज आईपीएस बिरादरी के लोग थे। भारत जैसे देश में जहां पूर्व पुलिस कॉन्स्टेबल (सुशील कुमार शिंदे) और उपराष्ट्रपति (भैरों सिंह शेखावत) बन चुके हों, वहां अगर बड़े आईपीएस अधिकारी अगर ताकतवर सुरक्षा संबंधी पद पर जाते हैं मुझे कोई समस्या नहीं। परंतु यह सवाल तो बनता है कि क्या किसी एक व्यक्ति को 134 करोड़ लोगों की आबादी वाले बहुस्तरीय,परमाणु हथियार क्षमता संपन्न देश में इतना शक्तिशाली होना चाहिए?
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