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नमामि गंगे : थोड़ा सुधार मगर ज्यादा की है दरकार

मेघा मनचंदा / कानपुर 10 14, 2018

गंगा नदी संरक्षण

गंगा नदी के संरक्षण के लिए आमरण अनशन करने वाले जीडी अग्रवाल की पिछले हफ्ते ऋषिकेश में मौत हो गई। सरकार ने जून 2014 में गंगा को निर्मल बनाने के लिए नमामि गंगे परियोजना शुरू की थी। जमीनी स्तर पर परियोजना की स्थिति की पड़ताल करती रिपोर्ट...

बिजनेस स्टैंडर्ड नमामि गंगे : थोड़ा सुधार मगर ज्यादा की है दरकारकरीब चार दशक बाद कानपुर के बालू घाट पर पहली बार धार्मिक अनुष्ठान करने वाले राजू तिवारी ने कहा कि स्थिति में अब काफी बदलाव आया है। उनका कहने का मतलब यह था कि गंगा नदी के तट पर जहां हिंदू अंतिम संस्कार करते हैं वह अब पहले से कहीं ज्यादा साफ-सुथरी है। श्मशान स्थल पर लकड़ी, कोयला और अन्य अपशिष्ट को रखने के लिए घाट पर अलग-अलग कूड़ेदान लगाए गए हैं जबकि पहले इस तरह की व्यवस्था नहीं थी। तिवारी ने कहा, 'केंद्र सरकार की नमामि गंगा पहल के तहत पिछले दो साल में यह बदलाव आया है।' बालू घाट औद्योगिक शहर कानपुर के भीड़भाड़ वाले शुक्लागंज इलाके में है। जब आप घाट की ओर बढ़ेंगे तो कुछ चिताएं नजर आएंगी - कुछ राख में तब्दील हुईं, वहीं कुछ जलती हुई। जब आप गंगा घाट के सीमेंट से बने प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ेंगे तो बदलाव स्पष्ट नजर आएगा। गंगा का पानी हर ओर निर्मल और स्वच्छ दिखेगा।

जून 2014 में केंद्र सरकार ने स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमसीजी) के तहत नमामि गंगे परियोजना को मंजूरी दी थी। इसका मकसद गंगा में प्रदूषण रोकना और इसकी सहायक नदियों को पुनर्जीवित करना है। इस परियोजना पर करीब 200 अरब रुपये खर्च होने का अनुमान है। इनमें से करीब 65 फीसदी रकम सीवेज ट्रीटमेंट के बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च किया जाना है। 2016 की शुरुआत में गंगा के घाट के समीप लकडिय़ों से चिता जलाने से होने वाले प्रदूषण को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पर्यावरण मंत्रालय को शवदाह के लिए वैकल्पिक उपाय लाने का निर्देश दिया था।

दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एवं पीपल के संयोजक हिमांशु ठक्कर ने कहा, 'चिता जलने के बाद हड्डियां और राख रह जाती हैं। अधजले शवों, लकडिय़ां और पूजा सामग्री को अक्सर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इन सबसे प्रदूषण बढ़ता है।' हालांकि कानपुर के बालू घाट पर हर कोई नमामि गंगे के हुए बदलाव से ज्यादा प्र्रभावित नहीं दिखे। रमेश कुमार मिश्रा ने कहा, 'नदी पांच साल पहले की तुलना में साफ तो हुई है लेकिन अभी काफी कुछ करने की जरूरत है।' 

बालू घाट से करीब सात किलोमीटर दूर सीसामऊ है, जहां शहर का सबसे बड़ा खुला नाला है और इससे हर दिन 14 करोड़ लीटर गंदा पानी नदी में प्रवाहित होता है। यह नाला पूरे शहर में फैला है और इसका कुछ हिस्सा ढका है और कुछ पर अनधिकृत तरीके से झुग्गियां बस गईं हैं। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरुद्घार मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले महीने सीसामऊ में सीवेेज से होने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिए कुछ परियोजनाओं की घोषणा की। इसके लिए सरकार ने 50 करोड़ रुपये खर्च करेगी। उत्तर प्रदेश जल निगम के महाप्रबंधक राकेश कुमार अग्रवाल ने कहा, 'शुक्लागंज के लिए एक नया अपशिष्ट शोधन संयंत्र बनाने की योजना है। हम काम शुरू करने के लिए एनजीटी की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।'ं गंगा को साफ करने के तहत शहर की 400 टेनरियों से निकलने वाले गंदे पानी को भी शोधित करने की कवायद की जा रही है। इन टेनरियों से ही हर दिन करीब 1 करोड़ लीटर गंदा जल प्रवाहित होता है। एक टेनरी कारखाने के अधिकारी नदीम ने कहा कि उनके कारखाने से गंगा में एक बूंद भी प्रदूषिण जल नहीं जाता है।

उन्होंने कहा कि उनके कारखाने में एक संयंत्र है जहां गंदे पानी का शोधन किया जाता है और फिर इसे सिंचाई के लिए छोड़ दिया जाता है।  लेकिन उनका यह दावा खोखला लगता है क्योंकि कारखाने के प्रवेश द्वार पर ही एक खुली नाली है और उससे भयानक बदबू आ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आसपास के इलाकों में मौजूद पानी और वहां उगाए जाने वाली सब्जी प्रदूषित है।  चमड़ाशोधक कारखानों में प्रदूषण से निपटने की समस्या इस तथ्य से और गहरा जाती है जब अगर ये संयंत्र बंद होते हैं तो शहर में 300,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार खत्म हो जाएंगे। नमामि गंगे परियोजना की समीक्षा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद में अगले साल होने वाले प्रयाग कुंभ से पहले 15 दिसंबर, 2018 से 15 मार्च, 2019 तक सभी चमड़ाशोधक कारखानों को बंद करने का आदेश दिया है। 

काउंसिल ऑफ लेदर एक्सपोट्र्स के चेयरमैन मुख्तारुल अमीन कहते हैं, 'उद्योग के लिए ऐसा करना आत्मघाती होगा। इससे 700,000 लोगों पर असर होगा जो कानपुर की कुल आबादी का करीब 20 फीसदी है।' शुरुआती अनुमानों के मुताबिक अगर कानपुर में चमड़ा कारखानों को बंद कर दिया गया तो चमड़ा उत्पादन की लागत 30 फीसदी बढ़ जाएगी। चमड़ा उद्योग की दलील है कि उसकी इकाइयों से गंगा में जाने वाली गंदगी नदी में गिरने वाली कुल गंदगी का केवल एक तिहाई है। कानपुर में रोजाना 2.7 करोड़ लीटर घरेलू गंदा पानी गंगा में गिरता है। 

नमाम गंगे परियोजना के तहत पूरे देश में निजी भागीदारी से 97 शहरों में गंदे पानी को साफ करने के संयंत्र स्थापित करने की योजना है। ये संयंत्र 15 साल के हाइब्रिड एन्युटी अनुबंध के आधार पर बनाए जाएंगे जहां इनका निर्माण, परिचालन और मरम्मत एक ही संस्था द्वारा की जाएगी। निर्माण पूरा होने पर केंद्र सरकार 40 फीसदी लागत का भुगतान करेगी  जबकि बाकी राशि परियोजना की अवधि पूरी होने तक एन्युटी के तौर पर दी जाएगी। साथ-साथ परिचालन और मरम्मत का खर्च भी दिया जाएगा। 

नैशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा को सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1860 के तहत 12 अगस्त, 2011 को सोसाइटी के तौर पर पंजीकृत किया गया था। इसने राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की क्रियान्वयन शाखा के रूप में काम किया। इस प्राधिकरण का गठन पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के प्रावधानों के तहत किया गया था।
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