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आर्थिक नीति प्रबंधन की खातिर अर्थशास्त्रियों की करें तलाश

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 12, 2018

केंद्र सरकार ने आठ महीनों से खाली पड़े मुख्य सांख्यिकीविद के पद पर पिछले हफ्ते प्रवीण श्रीवास्तव को नियुक्त करने की घोषणा की। सरकार 31 जनवरी को मुख्य सांख्यिकीविद के पद से सेवानिवृत्त हुए टी सी ए अनंत के उत्तराधिकारी की तलाश पूरी करने के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है लेकिन सच तो यह है कि इस रिक्ति को भरने में इतना लंबा समय लगना चिंता की वजह है। निश्चित तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के छात्रों और विश्लेषकों के लिए यह राहत की बात है कि सरकार में मुख्य सांख्यिकीविद के पद पर आखिरकार कोई बैठा है जो आंकड़ों के संकलन और सर्वेक्षणों के संचालन से संबंधित प्रणाली की निगरानी कर पाएगा। लेकिन इस अहम पद को भरने में आठ महीने का वक्त लगना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे आर्थिक विशेषज्ञता वाले पदों पर नियुक्ति में मोदी सरकार के तौर-तरीकों को लेकर असहज करने वाले सवाल भी खड़े होते हैं।

 
मसलन, अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है कि सरकार को इस पद पर नियुक्ति में इतना लंबा वक्त क्यों लग गया? सरकार को बखूबी पता था कि अनंत जनवरी 2018 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मनमोहन सरकार ने जुलाई 2010 में अनंत को प्रणव सेन की जगह पर मुख्य सांख्यिकीविद नियुक्त किया था। सवाल उठता है कि अनंत के उत्तराधिकारी की तलाश के लिए मोदी सरकार ने पहले से ही खोज समिति क्यों नहीं बनाई थी? अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि प्रवीण श्रीवास्तव का मुख्य सांख्यिकीविद के तौर पर कार्यकाल अगस्त 2020 में खत्म होगा। अगर सरकार को वाजिब उम्मीदवार की तलाश के लिए आठ महीनों तक मशक्कत करनी पड़ी है तो फिर श्रीवास्तव को तीन साल या पांच साल का लंबा कार्यकाल देने के बारे में क्यों नहीं सोचा गया?
 
अनंत के उत्तराधिकारी की तलाश को लेकर सरकार का रवैया भी परेशानी में डालने वाला है। भारत सरकार का मुख्य सांख्यिकी अधिकारी सचिव स्तर का पद होता है। फिर भी अगर सरकार को इस पद पर नियुक्ति के लिए सांख्यिकी विशेषज्ञों और पेशेवरों से तर्कसंगत प्रतिक्रिया नहीं मिली तो फिर सरकार के लिए आत्म-निरीक्षण का वक्त आ गया है। आखिर सांख्यिकी की दुनिया के इस प्रतिष्ठित पद के लिए आवेदन करने से भी क्यों परहेज किया गया? इस सवाल का मतलब श्रीवास्तव की काबिलियत या विशेषज्ञता पर संदेह करना नहीं है। लेकिन अगर सरकार ने मुख्य सांख्यिकीविद के पद पर नियुक्ति के लिए श्रीवास्तव को योग्य पाया था तो फिर इस निर्णय तक पहुंचने में आठ महीने का लंबा वक्त कैसे लग गया? आखिरकार, श्रीवास्तव एक भीतरी उम्मीदवार थे और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर तैनाती के दौरान समूचे कामकाज से परिचित थे। मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर अरविंद सुब्रमण्यन के उत्तराधिकारी की तलाश को लेकर जारी कवायद के संदर्भ में यह सवाल और भी मौजूं हो जाता है। 
 
सुब्रमण्यन ने जून 2018 के तीसरे हफ्ते में ही इस पद से हटने की घोषणा कर दी थी। सरकार ने तेजी दिखाते हुए जुलाई की शुरुआत में ही इच्छुक लोगों से आवेदन मंगा लिए थे और उन्हें 20 जुलाई तक आवेदन करने को कहा गया था। इससे यही उम्मीद बंधी थी कि जल्द ही सुब्रमण्यन के उत्तराधिकारी की नियुक्ति कर ली जाएगी और 27 जुलाई को उनकी विदाई के पहले ही नया नाम सामने आ जाएगा। लेकिन उसके बाद भी दो महीने से अधिक वक्त बीत चुका है और अभी तक सरकार ने नए मुख्य आर्थिक सलाहकार पर नियुक्ति नहीं की है। इस देरी से उन अटकलों को भी बल मिला है कि सरकार क्या इस अहम नियुक्ति को लोकसभा चुनावों के बाद तक के लिए टालना चाहती है? मनमोहन सरकार ने सितंबर 2013 में रघुराम राजन को मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से हटाकर रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया था। राजन के जाने के बाद एक साल तक मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद खाली रहा था और अक्टूबर 2014 में सुब्रमण्यन को नियुक्त किया गया था। 
 
एक बार फिर सरकार 2013 वाली रणनीति दोहरा सकती है। यह संभावना भी है कि जिस तरह सांख्यिकी मंत्रालय के भीतर से ही नया मुखिया चुना गया उसी तरह वित्त मंत्रालय का कोई अंदरूनी शख्स ही मुख्य आर्थिक सलाहकार बना दिया जाए। सरकार का अंतिम फैसला जो भी हो, पिछले दो दशकों में प्रमुख पदों पर अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति के संदर्भ में दो तरह की प्रवृत्ति देखने को मिली है। पहला, सरकार के पास अर्थशास्त्रियों या तकनीकी विशेषज्ञों का संख्याबल लगभग शून्य है। आईएएस अधिकारियों को छोड़कर सरकार में अधिक अर्थशास्त्री या पेशेवर विशेषज्ञ नहीं हैं जिन्हें विभिन्न विभागों में नियुक्त किया जा सके। यह 1980 या 1990 के दौर के विपरीत है जब सरकारी प्रणाली में पेशेवर अर्थशास्त्रियों और तकनीकी जानकारों की भरमार हुआ करती थी। उस समय सी रंगराजन, विजय केलकर, राकेश मोहन और अरविंद विरमानी जैसे नाम शामिल थे।
 
दूसरा, उन दिनों पेशेवर अर्थशास्त्रियों और तकनीकी विशेषज्ञों को अपेक्षाकृत लंबा कार्यकाल दिया जाता था जिससे उन्हें नीतिगत मामलों में टिकाऊ बदलाव के लिए लंबा वक्त मिलता था। इसी सोच का नतीजा था कि मोंटेक सिंह आहलूवालिया 1992 से लेकर 1998 तक लगातार वित्त सचिव के पद पर बने रहे। इसी तरह शंकर एन आचार्य भी 1993 से लेकर 2001 तक लगातार मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे। पिछले 18 वर्षों में बड़ा फर्क यह आया है कि पहले जहां सरकार में शामिल अर्थशास्त्री लंबे समय तक व्यवस्था का हिस्सा बने रहते थे, वहीं अब सरकारी अर्थशास्त्रियों का कार्यकाल दो-तीन साल का ही होता है और फिर उसके बाद वे अपने मौलिक स्थानों पर लौट जाते हैं। सरकार को अर्थशास्त्रियों का पूल तैयार करने का तरीका सोचने की जरूरत है ताकि वे जटिल एवं जोखिम से भरी अर्थव्यवस्था में आर्थिक नीतियों के प्रबंधन में मददगार बन सकें।
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