बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत-पाकिस्तान रिश्ते और सेना से जुड़ी पहेली
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भारत-पाकिस्तान रिश्ते और सेना से जुड़ी पहेली

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  October 11, 2018

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) से इतर होने वाली प्रस्तावित बैठक के रद्द होने से शायद दोनों देशों के नीति निर्माताओं को यह अहसास होगा कि दोनों के बीच बातचीत के ढांचे में मौजूद मूलभूत विरोधाभास के चलते शांति संबंधी हर पहल का नाकाम होना पहले से तय है। एक तरफ भारत के लिए संवाद के पहले एकदम बेहतर परिस्थितियों की मांग करना हास्यास्पद है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान बातचीत को संतुलित रखने के लिए जम्मू कश्मीर का इस्तेमाल करता है।

 
बातचीत के ठंडे बस्ते पर जाने के बाद कश्मीर में निराशा का माहौल है। सोमवार को हुए स्थानीय निकाय चुनाव में बहुत कम मतदान हुआ। नियंत्रण रेखा और दूरदराज इलाकों में सेना का मुकाबला नए किस्म के उपद्रव से हो रहा है। युद्धविराम का उल्लंघन छह गुना बढ़ गया है। संप्रग सरकार के अंतिम वर्ष में ऐसी 200 घटनाएं हुई थीं जबकि इस वर्ष अब तक 1,128 घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2013 में 30 जवानों की मौत हुई थी। बीते दो साल में हर बार इससे दोगुने जवान मारे गए। वर्ष 2010 के बाद धीमे पड़े आतंकवाद को नई गति मिली है। सन 2014 में जब राजग सरकार बनी तब कश्मीर में केवल 150 सशस्त्र आतंकी थे लेकिन 2016 के बाद से देश भर में मुस्लिम विरोधी माहौल बनने और आतंकी कमांडर और सोशल मीडिया के चहेते बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में आतंकवाद बढ़ गया। दो वर्ष में 500 से अधिक सशस्त्र आतंकियों के मारे जाने के बाद भी कश्मीरी युवा लड़ाई में शामिल हो रहे हैं। जब वे मारे जाते हैं तो उनका अंतिम संस्कार अत्यंत भावनात्मक ढंग से मनाया जाता है। पाकिस्तान को ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद अब कश्मीरी आतंकवाद बन चुका है।
 
इस बीच जवानों के शव क्षतविक्षत हो रहे हैं और नियंत्रण रेखा पर तनाव बरकरार है। देश के सेना प्रमुख पाकिस्तान को एकाधिक बार चेतावनी दे चुके हैं कि उसे इस बर्बरता की कीमत चुकानी होगी। दोनों देशों की परमाणु क्षमता को देखते हुए भारत की ओर से हो रहा सीमित प्रतिरोध समझदारी भरा है। इसमें बहुत बदलाव नहीं लाया जा सकता। यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या स्थिर परमाणु प्रतिरोध और पाकिस्तानी सेना की शत्रुता की निरंतरता के कारण दोनों देशों के बीच निचले दर्जे का संघर्ष यूं ही चलता रहेगा? पाकिस्तान को जानने वाले पर्यवेक्षकों में से एक और पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे शरत सभरवाल ने कहा है कि पाकिस्तान में कई धाराएं हैं जो अपनी-अपनी शर्तों पर काम कर रही हैं। पाकिस्तानी सेना के भारत के साथ तनाव में अपने हित हैं इससे उसे पाकिस्तान के रक्षक की भूमिका में बने रहने का मौका मिलता है। इसके अलावा भारत केंद्रित समूह भी हैं, मसलन लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन। इन सभी को सेना का समर्थन हासिल है। भारत विरोधी टीवी मीडिया तो है ही। परंतु भारत समर्थक समूह भी हैं, मसलन कुछ राजनेता, कारोबारी और वाणिज्यिक समूह जिनको बेहतर कारोबारी रिश्तों में भलाई नजर आती है। पाकिस्तानी अवाम भारत के बहुत खिलाफ नहीं है लेकिन भारत की ओर से खतरा महसूस होने पर वह सेना की अनुगामी हो जाती है।
 
हमारे निष्कर्ष इस बात पर आधारित होते हैं कि भारत को पाकिस्तान के उन धड़ों पर ध्यान देना चाहिए जो भारत से बेहतर रिश्ते के हिमायती हैं। इसमें मुख्यधारा के नेता, कारोबारी वर्ग और आम लोग शामिल हैं। इससे सेना पर दबाव पैदा होगा कि वह भारत के प्रति अपनी शत्रुता त्यागे।  इसके उलट पाकिस्तान के अधिकांश नागरिक अपनी सेना के साथ जुड़ाव रखते हैं। इसकी वजह कुछ भी हो सकती है, वर्दी के प्रति पंजाबियों का लगाव, अन्य सक्रिय सराहनीय संस्थानों की कमी या फिर शायद पाकिस्तानी सेना ने अपने साथ लोगों का वह लगाव कायम किया है जो कभी क्रिकेट, हॉकी या स्क्वैश खिलाडिय़ों को हासिल था। एक उम्रदराज क्रिकेटर का सेना की मदद से देश का प्रधानमंत्री बनना काफी कुछ कहता है।
 
इसके बजाय एक ठोस शांति प्रक्रिया का आकलन करना होगा और पाकिस्तानी सेना की मूल चिंताओं को हल करना होगा। कई लोग कहेंगे कि यह कदम बेमतलब होगा क्योंकि पाकिस्तानी सेना तो भारत को खत्म करना चाहती है। अगर उनका कहना सही हो तो भी सेना एक लोकप्रिय और भरोसेमंद संस्थान है जो सत्ता पर नियंत्रण रखता है। जनरल कमर जावेद बाजवा अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक व्यावहारिक ढंग से बात करते हैं। भारत चाहे तो चीन के साथ जुड़ी सामरिक चिंताओं से उदाहरण ले सकता है। हम जानते हैं एक मजबूत अर्थव्यवस्था, रक्षा बजट और कई गुना बड़ी सैन्य शक्ति वाले पड़ोसी के होने से कैसा महसूस होता है। वह भी ऐसा पड़ोसी जो हमें बड़ी पराजय का स्वाद चखा चुका हो। वह निरंतर आगे बढ़ रहा है और हम दबे छिपे उसकी सराहना भी करते हैं। परंतु हम वहां आतंकवाद या आतंरिक अशांति को बढ़ावा नहीं देते, न ही उसके साथ सीमा पर हमने कोई बड़ी सेना तैनात की है। इसी तरह वह भी हमें नियमित धमकियां नहीं देता। एक विवादित सीमा को संभालने का भारत-चीन मॉडल पाकिस्तान के साथ भी आजमाया जा सकता है।
 
भारत के लिए सुरक्षा तैयार करने से जुड़ी कोई भी चर्चा पाकिस्तान के लिए साझा सुरक्षा तैयार करने से जुड़ी होनी चाहिए। यह एक बड़ा विचार है क्योंकि दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे को असुरक्षित करने में काफी ऊर्जा व्यय करती हैं। अगर हम ऐसा कोई बड़ा बदलाव ला पाए तो पाकिस्तानी सैन्य कमांडरों का ध्यान अवश्य आकृष्ट कर पाएंगे। हालांकि सच्चाई तो यह भी है कि भारत और पाकिस्तान में से किसकी सुरक्षा पहले आती है, इस सवाल का जवाब देना नामुमकिन है। 
Keyword: india, pakistan, UNGA, sushma swaraj,,
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