बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन की मुद्रा रेनमिनबी का अंतरराष्ट्रीयकरण
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चीन की मुद्रा रेनमिनबी का अंतरराष्ट्रीयकरण

श्याम सरन /  October 11, 2018

चीन ईरान के तेल का बड़ा आयातक है। अगर वह भुगतान के लिए पेट्रो-डॉलर के स्थान पर पेट्रो-युआन का इस्तेमाल करता है तो इससे भारत को भी सहायता मिल सकती है। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन 

 
चीन की मुद्रा रेनमिनबी का अंतरराष्ट्रीयकरण चीन के आर्थिक सुधारों के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल रहा है। अगस्त 2015 तक यह प्रगति स्थिर थी। उस समय विनिमय दर सुधार की एक कड़ी के रूप में  3 प्रतिशत का समेकित अवमूल्यन हुआ। इससे बाजार लडख़ड़ा गए और पूंजी देश से बाहर जाने लगी। इससे चालू खाते की परिवर्तनीयता की स्थिति में बदलाव आया और पूंजीगत प्रवाह पर कुछ हद तक नियंत्रण लगाया गया। इसमें चीनी कंपनियों द्वारा मुनाफे को स्वदेश भेजने और उनके द्वारा किए जाने वाले विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (ओडीआई) पर प्रतिबंध शामिल थे। इन कदमों का असर रेनमिनबी के विदेश व्यापार पर भी पड़ा। इसमें विदेशों में रखे गए रेनमिनबी वाले बैंक जमा और हॉन्गकॉन्ग तथा सिंगापुर जैसे विदेशी बाजारों में रेनमिनबी आधारित बॉन्ड दोनों शामिल थे। 
 
उदाहरण के लिए चीनी मुद्रा की विदेशी होल्डिंग और जमा में गिरावट आई और वह वर्ष 2014 के 50,000 करोड़ डॉलर से घटकर 2016 में 30,000 करोड़ डॉलर रह गई। चीन के विदेश व्यापार के निपटान में रेनमिनबी का इस्तेमाल भी 2014 के 25 फीसदी के स्तर से घटकर 2016 में 12.5 फीसदी रह गया। अप्रैल 2018 तक इसमें मामूली सुधार हुआ और यह 14.6 फीसदी तक पहुंचा। विनिमय दर सुधार में भी ठहराव आया। अगस्त 2015 के सुधार ने विनिमय दर को दो चरों से जोड़ दिया। पहला, 13 प्रमुख मुद्राओं के मूल्य का आकलन भारिता के आधार पर होता रहा है जहां अमेरिकी डॉलर 26 फीसदी के साथ सबसे बड़ा भागीदार है। यूरो 21 फीसदी और जापानी येन 15 फीसदी के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। दूसरा कारक है पिछले कार्य दिवस के बंद होते वक्त की दर। हर कारक की भारिता 50 फीसदी होती है। यह सीमित विनिमय दर परिवर्तनीयता मई 2017 में प्रतिचक्रीय समायोजन कारक के आगमन से सीमित हो गई। यानी अब केंद्रीय बैंक बाजार अस्थिरता में जब जरूरी समझे दखल दे सकता है। रेनमिनबी की बाजार निर्धारित विनिमय दर कोई मुद्दा ही नहीं रहा। अमेरिका के साथ मौजूदा कारोबारी जंग का भी गहरा असर हो सकता है।
 
बहरहाल, वित्तीय सुधार के अन्य तत्त्व भी चरणबद्ध तरीके से लागू किए जा रहे हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उनका असर भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगा। चीन एक बड़ा बॉन्ड बाजार खोल रहा है। फिलहाल संस्थागत विदेशी निवेशकों के लिए उसका आकार 9.4 लाख करोड़ डॉलर का है। नवंबर 2017 में राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कहा था कि देश के वित्तीय क्षेत्र को उदार बनाया जाएगा। विदेशी कंपनियां अब घरेलू प्रतिभूतियों, बीमा और फंड प्रबंधन कंपनियों में 51 फीसदी तक हिस्सेदारी रख सकती हैं। तीन वर्ष की अवधि में यह सीमा भी समाप्त हो जाएगी। पहली बार निजी विदेशी निवेशकों को उतने फंड का प्रबंधन करने का अवसर होगा जितने का प्रबंधन करने की इजाजत उनको होगी। अभी हाल में चीन के परिसंपत्ति प्रबंधन महासंघ ने फिडेलटी इंटरनैशनल को चीन में चीनी संस्थागत निवेशकें के लिए फंड लॉन्च करने की इजाजत दी लेकिन चीनी बैंकों के साथ मिलकर। स्विट्जरलैंड का केंद्रीय बैंक एक अन्य लाइसेंसी है। माना जा रहा है कि चीन अपने बैंकिंग क्षेत्र को विदेशी निवेशकों के लिए खोलेगा। फिलहाल 37 लाख करोड़ डॉलर की बैंकिंग परिसंपत्तियों में 1.3 फीसदी हिस्से पर विदेशी बैंक हिस्सेदार हैं। यानी संभावनाएं बहुत अधिक हैं।
 
यह ध्यान दिया जा सकता है कि वर्ष 2016 से चीन के ऑनशोर स्टॉक, बॉन्ड और विदेशी विनिमय बाजार को विेदशी वित्तीय संस्थानों के लिए खोला गया है। इसमें केंद्रीय बैंक और सॉवरिन वेल्थ फंड शामिल हैं। कहा जा सकता है कि पूंजी खाते की परिवर्तनीयता आधिकारिक संस्थानों के लिए उपलब्ध है। अक्टूबर 2015 में चीन का अंतरराष्ट्रीय भुगतान तंत्र पेश किया गया जो चीनी मुद्रा में सीमापार लेनदेन की सुविधा देता है। पहले चरण में 19 घरेलू और विदेशी बैंकों को प्रत्यक्ष भागीदार के रूप में चुना गया जबकि 147 देशों में 176 अप्रत्यक्ष भागीदार थे। 
 
बैंकरों की अंतरराष्ट्रीय मेसेजिंग सेवा स्विफ्ट के साथ एक समझौता किया गया ताकि भुगतान के ऑर्डर को तेज और किफायती अंदाज में अंजाम दिया जाएगा। सीआईपीएस का दूसरा चरण इस वर्ष मई में क्रियान्वित किया गया ताकि तमाम टाइम जोन में सेवाओं की क्लियरिंग की व्यवस्था की गई। इसमें अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एशिया आदि शामिल हैं। अब 31 प्रत्यक्ष घरेलू और विदेशी प्रतिभागी और 148 देशों में 695 अप्रत्यक्ष भागीदार हैं। सीआईपीएस की स्थापना को रेनमिनबी के अंतरराष्ट्रीयकरण की राह प्रशस्त करने वाला माध्यम है।
 
चीन ने हॉन्गकॉन्ग-शांघाई स्टॉक कनेक्ट और बाद में हॉन्गकॉन्ग शेनझेन स्टॉक कनेक्ट के माध्यम से अपने प्रतिभूति बाजार को विदेशी निवेशकों के लिए धीरे-धीरे खोला। इससे चीन के निवेशकों को इन शेयर बाजारों में अैर विदेशी निवेशकों को इनके जरिये चीन के शेयरों में निवेश करने का अवसर मिला। इस बीच लंदन-शांघाई स्टॉक कनेक्ट भी वर्ष समाप्त होने के पहले शुरू हो जाएगा। परंतु शुरुआत में यह केवल दोनों वित्तीय केंद्रों के नामित संस्थानों द्वारा जारी जमा प्राप्तियों के क्षेत्र में कारोबार करेगा। फिर भी यह एक अहम घटना होगी क्योंकि चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल के लिए काफी धन लंदन बाजार के माध्यम से जुटाया जा रहा है। चीन के घरेलू वित्तीय संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे बेल्ट रोड पहल के लिए अपने विदेशी वित्तीय कारोबार को रेनमिनबी में करें।
 
चीनी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण का एक नया क्षेत्र शांघाई एनर्जी एक्सचेंज की स्थापना के साथ खुला है। यह एक्सचेंज रेनमिनबी में तेल वायदा कारोबार का केंद्र है। इसका लक्ष्य है सबसे बड़े तेल आयातक की चीन की स्थिति का लाभ पेट्रो-युआन बाजार में लेने का है ताकि स्थापित पेट्रो-डॉलर बाजार का मुकाबला किया जा सके। एक ऐसा एशियाई मानक उभर सकता है जो मौजूदा ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई  मानकों को चुनौती दे। ये मानक दुनिया भर में तेल कीमतें तय करते हैं। इस एक्सचेंज के आगमन के कुछ ही महीनों में यह 700 करोड़ डॉलर रोजाना का प्रभावी कारोबार कर रहा है। कच्चे तेल के वायदा कारोबार में चीन की गतिविधि भी डॉलर से युआन में स्थानांतरित हो गई है। ईरान के तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध के बाद इसमें और इजाफा हो सकता है। चीन ईरानी तेल का बड़ा आयातक है। संभव है वह डॉलर में भुगतान के बजाय पेट्रो युआन का इस्तेमाल करे। रूस भी इसके इस्तेमाल को आसान पा सकता है। ऐसे में रेनमिनबी का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा। भारत तेल का बड़ा आयातक है और अगर वह ईरान से आयात जारी रखता है तो उसे प्रतिबंध का सामना करना होगा। ऐसे में यह रास्ता उसके लिए भी संभावित हल ला सकता है।
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में सीपीआर के सीनियर फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
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