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'राफेल सौदे का ब्योरा दे सरकार'

एम जे एंटनी /  October 10, 2018

उच्चतम न्यायालय ने राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए फ्रांस के साथ हुए समझौते का ब्योरा देने का निर्देश सरकार को दिया है। उसने राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताकर अदालत की दखल पर जताई गई सरकार की  आपत्ति भी खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पीठ ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का आरोप लगाने वाली रिट याचिकाओं की सुनवाई के बाद बुधवार को सरकार को निर्देश दिया कि वह इस सौदे से जुड़ा ब्योरा उपलब्ध कराए। शीर्ष अदालत ने सरकार को 29 अक्टूबर तक एक मुहरबंद लिफाफे में यह ब्योरा देने का कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई ब्योरा मिलने के बाद ही होगी। हालांकि न्यायालय ने अपने संक्षिप्त आदेश में कहा कि वह राफेल विमानों की उपयुक्तता और कीमत के मसले पर गौर नहीं करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने वर्ष 2016 में राफेल खरीद समझौते का ऐलान किया था।

 
मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसफ भी इस पीठ के सदस्य हैं। पीठ ने कहा कि वह याचियों के 'निहायत ही नाकाफी' आरोपों को संज्ञान में नहीं ले रहा है। न्यायाधीशों ने अपने आदेश में कहा कि राफेल सौदे से जुड़े ब्योरों का परीक्षण कर वे इस खरीद समझौते के फैसले तक पहुंचने से जुड़े कदमों को लेकर खुद को संतुष्ट करना चाहते हैं। न्यायालय ने यह टिप्पणी अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की उस आपत्ति पर की जिसमें उन्होंने इस संवेदनशील मसले की न्यायिक समीक्षा पर एतराज जताया था। वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत के विचारार्थ दाखिल याचिकाएं जनहित याचिकाएं न होकर राजनीति से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा था कि चुनाव करीब आ रहे हैं और विपक्ष इसे मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में अगर अदालत सरकार को नोटिस जारी करती है तो राजनीतिक लाभ के लिए प्रधानमंत्री का नाम भी इस मामले में घसीटा जा सकता है। अटॉर्नी जनरल ने अदालत से दरखास्त की थी कि राफेल सौदे के एक अंतरराष्ट्रीय समझौता होने के नाते उसे इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए।
 
इस पर पीठ ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि क्या राफेल सौदे से संबंधित जानकारियां सीलबंद लिफाफे में मांगी जा सकती हैं तो उन्होंने इसका भी विरोध करते हुए कहा कि खुद वह भी यह ब्योरा नहीं हासिल कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि इस सौदे से संबंधित जो भी जानकारियां सार्वजनिक की जा सकती थीं वे संसद में दी जा चुकी हैं। प्रोटोकॉल इस बारे में अधिक जानकारी देने से रोकता है। अदालत ने इस मसले पर याचियों के वकील एम एल शर्मा और विनीत ढांढा का भी 15 मिनट तक पक्ष सुना। तीसरी याचिका वापस ले ली गई थी। 
 
न्यायालय ने इस मामले में सरकार को नोटिस तो नहीं जारी किया है लेकिन ब्योरा देने का आदेश भी सरकार के सिर पर तलवार लटकने की ही तरह है। अदालत इस मामले में आगे की प्रक्रिया पर कोई भी फैसला संबंधित दस्तावेज जमा किए जाने के बाद ही करेगी। पहले भी सर्वोच्च अदालत सरकार से संवेदनशील सूचनाएं सीलबंद लिफाफे में देने को कह चुकी है। 1990 के दशक में अदालत ने की नेताओं और अधिकारियों की कथित संलिप्तता वाले हवाला घोटाले का ब्योरा मांगा था। उस समय न्यायमूर्ति जे एस वर्मा ने घोटाले की जांच कर रही सीबीआई के अधिकारियों से बंद दरवाजों के भीतर कई दिनों तक पूछताछ की थी। पिछले कुछ वर्षों में शीर्ष अदालत ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले और कोयला घोटाले में भी सीलबंद लिफाफे में जानकारियां मांगी थीं।
 
राफेल खरीद प्रक्रिया में हुई छेड़छाड़ : कांग्रेस
 
उच्चतम न्यायालय द्वारा राफेल सौदे में निर्णय लेने की प्रक्रिया का ब्योरा सरकार से मांगे जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा और दावा किया कि प्रधानमंत्री के फैसले को सही ठहराने के लिए सरकार के स्तर पर प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। उन्होंने दावा किया, 'प्रधानमंत्री के निर्णय को सही ठहराने की प्रक्रिया का अभी पता लगाया जा रहा है लेकिन काम शुरू हो चुका है। इसी संदर्भ में रक्षा मंत्री (निर्मला सीतारमण) बुधवार की रात फ्रांस रवाना हो रही हैं।'
 
कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राफेल विमान की खरीद की प्रक्रिया में छेड़छाड़ की और इस सौदे पर सवाल खड़े करने वाले अधिकारी को दंडित किया। पार्टी ने एक बार फिर कहा कि इस मामले की संयुक्त संसदीय समिति  से जांच कराई जानी चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता एस जयपाल रेड्डी ने दावा किया कि राफेल सौदे की प्रक्रिया पर आपत्ति करने वाले अधिकारी के फैसले को दरकिनार करने वाली महिला अधिकारी को बाद में पुरस्कृत किया गया। कांग्रेस का बयान उस वक्त आया है जब उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से कहा कि वह राफेल सौदे पर फैसले की प्रक्रिया का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में उसे सौंपे।
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