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बोर्डरूम के फर्नीचर से भी स्थायी हैं स्वतंत्र निदेशक

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  October 10, 2018

जोखिम प्रबंधन समितियों से यह अपेक्षा रहती है कि वे किसी भी संगठन की जोखिम उठाने की क्षमता का आकलन करें और कारोबार में जोखिम और प्रतिफल के बीच समुचित संतुलन साधने के लिए समुचित कदम भी सुनिश्चित करें। हालांकि इसकी बैठक की आवृत्ति को लेकर कोई नियामकीय आदेश नहीं है, फिर भी आईएलऐंडएफएस की जोखिम प्रबंधन समिति की पिछले दो साल में एक भी बैठक नहीं होना बेहद असामान्य है। ऐसा तब हुआ जब ढांचागत परियोजनाओं के लिए वित्त मुहैया कराने वाली इस कंपनी की सेहत गिरने को लेकर लगातार चेतावनी भरे संकेत आ रहे थे।

 
आईएलऐंडएफएस का समेकित कर्ज वर्ष 2017-18 में 910 अरब रुपये हो चुका था। वैधानिक लेखा परीक्षक ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में बोर्ड का ध्यान 'कंपनी की क्षमता पर भौतिक अनिश्चितता का दौर रहने से चिंता कायम रहने' और 'फंड जुटाने के लिए प्रबंधन योजना' का उल्लेख किया था। फिर भी भारतीय जीवन बीमा निगम के प्रबंध निदेशक हेमंत भार्गव की अगुआई वाली जोखिम प्रबंधन समिति को किसी भी तरह का जोखिम नहीं नजर आया। इस समिति में संयुक्त प्रबंध निदेशक एवं सीईओ अरुण के साहा, मारुति सुजूकी के चेयरमैन आर सी भार्गव और पूर्व जहाजरानी सचिव माइकल पिंटो भी शामिल थे। 
 
यह महज एक उदाहरण है जो दिखाता है कि आईएलऐंडएफएस का बोर्ड अपने दायित्वों के निर्वहन में किस कदर नाकाम रहा। इसका नतीजा यह रहा कि विविध शेयरधारिता और एक पेशेवर सीईओ की मौजूदगी को प्रवर्तक द्वारा संचालित कंपनी की तुलना में अधिक कारगर मानने की परंपरागत धारणा को तगड़ा झटका लगा है। यह संकटग्रस्त कंपनी और 30 वर्षों तक उसके सीईओ रहे शख्स ने इस धारणा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया है। संभवत: लंबे समय तक किसी कंपनी की कमान संभालने वाले सीईओ यह भूल जाते हैं कि वह कंपनी उनकी निजी जागीर नहीं है। अब तक यह साफ हो चुका है कि रवि पार्थसारथि ने बोर्ड के समर्थन से हद से ज्यादा बड़ी भूमिका तैयार कर ली थी। बोर्ड भी हमेशा उनकी पसंद पर ही दांव लगाता रहा। कथित स्वतंत्र निदेशकों और नामांकित निदेशकों ने भी इस दौरान मूकदर्शक की भूमिका निभाई जबकि उनसे शेयरधारकों के हितों का ध्यान रखने की अपेक्षा रहती है। 
 
कंपनी मामलों के मंत्रालय ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) में आईएलऐंडएफएस के 10 पूर्व बोर्ड सदस्यों के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं वे काफी आश्चर्यजनक हैं। हालांकि यह नहीं मालूम है कि इस आरोपपत्र में नामित निदेशकों को क्यों बख्श दिया गया है? वैसे आरोप लगाने भर से दोष साबित नहीं हो जाता है लेकिन इनसे आईएलऐंडएफएस के संचालन का जिम्मा उठाने वाले कुछ बेहद सम्मानित नामों के बारे में दुखद अहसास होता है। आईएलऐंडएफएस मामले में दायर अर्जी में इन सभी लोगों को घोर लापरवाही बरतने और अपने भ्रामक इरादे पर पर्दा डालने के लिए जिम्मेदार बताया गया है। याचिका के मुताबिक बोर्ड के सदस्यों ने कंपनी के नकदी प्रवाह और भुगतान दायित्वों के बीच गहरा असंतुलन होने की बात छिपाने की कोशिश की। मंत्रालय ने कंपनी प्रबंधन पर कर्ज चुकाने की क्षमता से जुड़ी भौतिक सूचनाएं जानबूझकर छिपाने का भी आरोप लगाया है। एनसीएलटी में दायर अर्जी के मुताबिक 'ऊंचे पारिश्रमिक और भत्तों की अधिक निकासी के जरिये कंपनी से फंड भी व्यवस्थित तरीके से निकाला जाता रहा है।' इनमें से कुछ आरोप कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 447 के तहत धोखाधड़ी की परिभाषा में भी रखे जा सकते हैं।
 
कुप्रबंधन के आरोपों को नकार पाना मुश्किल है। जरा इस तथ्य पर गौर कीजिए: आईएलऐंडएफएस समूह ने वित्त वर्ष 2017-18 की  समेकित बैलेंस शीट में 26.7 अरब रुपये का घाटा दिखाया है। कंपनी के पास 69.5 अरब रुपये की इक्विटी पूंजी और आरक्षित निधि का आधार था लेकिन इसका 13 गुना लीवरेज लेते हुए 910 अरब रुपये की उधारी ली गई थी। व्यवस्थागत रूप से अहम गैर-जमा के लिए जोखिम-भरी परिसंपत्ति का पूंजी अनुपात (सीआरएआर) 15 फीसदी होने पर इस कंपनी का लीवरेज अनुपात छह-सात गुना होता। वहीं विशुद्ध निवेश कंपनी का सीआरएआर 30 फीसदी होता तो लीवरेज तीन से चार गुना तक होता। वर्ष 2017-18 के अंत में आईएलऐंडएफएस की कुल ऋणग्रस्तता करीब 164.6 अरब रुपये रही।
 
मुद्दा यह है कि इस अवधि में कंपनी बोर्ड के स्वतंत्र निदेशक क्या कर रहे थे? सेबी के पूर्व चेयरमैन एम दामोदरन कहा करते थे कि कंपनियों के बोर्ड में कुछ लोग आते हैं और फिर स्थायी बनकर रह जाते हैं। कभी-कभी तो ये सदस्य बोर्डरूम में रखे फर्नीचर से भी अधिक स्थायी हो जाते हैं। असल में, भारतीय कॉर्पोरेट प्रशासन में एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें पुराने दोस्तों या प्रबंधन के सहयोगियों या पुराने सीईओ को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर नियुक्त करने की अनुमति मिली हुई है। भारतीय कंपनियों में बहुतेरे स्वतंत्र निदेशक ऐसे हैं जिन्हें चेयरमैन या सीईओ ने नामांकित किया है। वे लोग पीजी वोडहाउस की कहानी 'द नॉडर' के चरित्रों की तर्ज पर बोर्ड की बैठकों में सिर हिलाने की ही भूमिका निभाते हैं। जब भी चेयरमैन कुछ कहते हैं तो ये लोग सहमति में सिर हिलाने लगते हैं। इसके जरिये नियुक्त हुए निदेशक नियंत्रक शेयरधारकों की नजर में खुद को लचीला और सहयोगी के तौर पर पेश करना चाहते हैं। आईएलऐंडएफएस के बोर्ड में शामिल बड़े-बड़े नाम भी इसका अपवाद नहीं थे।
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