बिजनेस स्टैंडर्ड - विनिमय दर और पूंजी की आवक
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विनिमय दर और पूंजी की आवक

अजय शाह /  October 10, 2018

डेट की आवक को उदार बनाकर पूंजी की बड़ी आवक का लक्ष्य विनिमय दर में मामूली बदलाव के साथ भी हासिल किया जा सकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
विदेशी पूंजी की आवक की मदद से ही निवेश और बचत के बीच के अंतर को पूरा किया जाता है। विनिमय दर वह कीमत है जिसके समायोजन के जरिये यह सुनिश्चित किया जाता है कि पूंजी की आवक उतनी ही है जितनी कि आवश्यकता है। देश में पूंजी की आवक का एक बड़ा हिस्सा डेट के रूप में आता है। जब उधारी लेने वाली संस्थाओं के ऋण का जोखिम खराब स्थिति में आता है तो डेट निवेशक असहज हो जाते हैं। ऐसे में पूंजी की कमी हो जाती है। रुपये का अवमूल्यन भारतीय परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बनाता है और घरेलू ऋण की गुणवत्ता में आई गिरावट की कमी पूरी होती है। 
 
वृहद आर्थिक स्थिति की बड़ी अंतर्दृष्टियों में एक विचार यह भी है कि चालू खाते का घाटा (जिसके बारे में हम अक्सर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में ही विचार करते हैं) निवेश और बचत के अंतर के ठीक बराबर होता है। यह केवल सैद्घांतिक बात नहीं है। अल्पावधि में जब कच्चे तेल के दाम ऊपर जाते हैं तो मांग की नम्यता कम रहती है। ऐसे में आम परिवार अपनी बचत में कटौती करके ईंधन पर खर्च करते हैं और इस तरह निवेश और बचत का अंतर बढ़ता है।  जब घरेलू बचत, घरेलू निवेश की भरपाई कर पाने में नाकाम रहती है तो हम पूंजी का आयात करते हैं। इसी पूंजी से निवेश और बचत के अंतर की भरपाई की जाती है। 
 
मुद्रा बाजार में हर मिनट आपूर्ति और मांग बराबर रहते हैं क्योंकि पूंजी की आवक इस कमी की हर क्षण भरपाई करती रहती है। इसमें लगने वाला समय भी महत्त्वपूर्ण है। आयात और निर्यात कई वर्षों के परिदृश्य में समायोजन करते हैं। निवेश और बचत का समायोजन धीमी गति से होता है।  पूंजीगत आवक मिनट दर मिनट समायोजित होती है। कच्चे तेल की कीमत बढऩे से जब चालू खाते का घाटा बढ़ता है तो हम अचानक पूंजी की आवक कैसे बढ़ाएंगे? इसका उत्तर है: विनिमय दर का अवमूल्यन करके। 
 
एक विदेशी निवेशक के नजरिये से देखें तो जब रुपये के मूल्य में कमी आती है तो भारतीय परिसंपत्ति को लेकर जोखिम और लाभ की स्थिति में बदलाव आता है। भविष्य के अवमूल्यन का जोखिम कम होता है और भविष्य में रुपये के मूल्य में अधिमूल्यन देखने को मिल सकता है। विनिमय दर में आने वाली गिरावट देश की प्रतिभूतियों को कहीं अधिक आकर्षक बनाती हैं। यह बात एक हद तक इक्विटी परिसंपत्तियों पर भी लागू होती है लेकिन डेट प्रतिभूतियों पर तो खासतौर पर।  डेट प्रतिभूतियों के साथ गणित एकदम सीधा है। विदेशों में वित्त पोषण की लागत मुद्रा में करीब 4 फीसदी बैठती है। देश में डेट प्रतिभूति पर एक सप्ताह का प्रतिफल है जो 8 फीसदी बैठता है। 4 फीसदी के इस अंतर की तुलना एक सप्ताह के मौद्रिक अवमूल्यन से की जानी चाहिए। एक बार रुपये का अवमूल्यन होने के बाद आगे इसकी आशंका और बढ़ जाती है। ऐसे अधिमूल्यन से मुनाफा भी हो सकता है। 
 
अगर सरकारी कदमों से रुपये का अवमूल्यन होता है तो भारतीय परिसंपत्तियां विदेशी निवेशकों की नजर में अनाकर्षक बनी रहेंगी। दिक्कत यह है कि अगर अधिकारी विनिमय दर से छेड़छाड़ करते हैं तो फंडिंग का अंतर समाप्त नहीं होता है। अगर विनिमय दर नीचे की ओर समायोजित नहीं होती तो भारतीय प्रतिभूतियों को आकर्षक बनाने के लिए भारतीय प्रतिभूतियों के मूल्य को कम करना होगा। यह आमतौर पर एक कष्टप्रद समायोजन है। यह तर्क डेट की आवक को उदार बनाने के महत्त्व पर जोर देता है। अल्पावधि में क्षण-क्षण में जहां मुद्रा बाजार में समानता हासिल की जाती है वह हैं डेट प्रतिभूतियां। इक्विटी परिसंपत्तियां विनिमय दर को लेकर बहुत कम संवेदनशील होती हैं। उनके अपनी तरह के जोखिम और रिटर्न की समस्याएं होती हैं जो विनिमय दर के दायरे से परे होते हैं।
 
चूंकि भारत भारतीय डेट प्रतिभूतियों में विदेशियों को कम पहुंच प्रदान करता है इसलिए पूंजी प्रवाह में उचित बदलाव हासिल करने के लिए विनिमय दर में बड़ा बदलाव आवश्यक होता है। डेट पूंजी को उदार बनाने से रुपये को अधिक स्थिरता मिलती है। विदेशी निवेशक जिन ऋण प्रतिभूतियों को खरीद सकते हैं उनमें सरकारी बॉन्ड भी हैं और कॉर्पोरेट बॉन्ड। दोनों भारतीय पूंजी खाते के अहम तत्त्व हैं। कॉर्पोरेट परिसंपत्ति के साथ समय-समय पर ऋण की गुणवत्ता भी बदलती है। उदाहरण के लिए भारत में हाल में घटी घटनाओं ने एनबीएफसी के ऋण के साथ जुड़ा जोखिम पैदा किया है। उधर कॉर्पोरेट क्षेत्र में धीरे-धीरे ऋण का जोखिम उत्पन्न हो रहा है। एक विदेशी निवेशक के लिए भारतीय कॉर्पोरेट डेट में अब पहले की तुलना में अधिक जोखिम है। इसका देश में वित्त की स्थिति पर बुरा असर पड़ता है जो कॉर्पोरेट ऋण में विदेशी निवेश के रूप में आता रहा है।
 
इन बातों को समग्रता में कैसे देखा जाए? एक बार फिर विनिमय दर प्रमुख है। भारतीय कॉर्पोरेट पेपर उच्च ऋण जोखिम के चलते कम आकर्षक रह गया है। विनिमय दर अवमूल्यन इस समस्या से मुकाबला करता है। विनिमय दर में गिरावट उन्हीं परिसंपत्तियों को अधिक आकर्षक बनाता है क्योंकि भविष्य के अवमूल्यन का जोखिम कम हो जाता है। अर्थशास्त्र का मूल सिद्धांत कहता है कि कीमतों में बदलाव इसलिए होता है ताकि मांग और आपूर्ति में समानता बनी रहे। जब सरकार कीमतों के साथ छेड़छाड़ करती है तो इससे समस्या पैदा होती है क्योंकि मांग और आपूर्ति का समायोजन जो मूल्य बदलाव से संचालित होना चाहिए वह दबा दिया जाता है। यह बात सभी नियंत्रित कीमतों पर लागू होती है। मिसाल के तौर पर स्टील, सीमेंट, उर्वरक, गेहूं या पेट्रोल। सन 1991 के सुधारों के बाद से देश में एक सिद्धांत यह भी रहा है कि सरकार कीमतों में हस्तक्षेप न करे।
 
यह बात मुद्रा बाजार पर भी लागू होती है। विनिमय दर में बदलाव की वजह होती है। जब घटनाएं सामने आती हैं तो अल्पावधि में आयात-निर्यात या निवेश अथवा बचत में बदलाव नहीं होता। अल्पावधि में केवल पूंजी की आवक का ही समायोजन होता है। विदेशियों के लिए अपनी परिसंपत्ति को अधिक आकर्षक कैसे बनाया जा सकता है? या तो रुपये के अवमूल्यन से या फिर भारतीय परिसंपत्ति कीमतों में गिरावट से। आरबीआई के पास अब 4 फीसदी मुद्रास्फीति का लक्ष्य है। भारत जैसे देश के लिए यह एकदम उचित है। हमें अब आरबीआई से विनिमय दर लक्ष्य पर काम करने को नहीं कहना चाहिए। हमें डेट की आवक उदार बनानी चाहिए ताकि पूंजी की आवक का बड़ा लक्ष्य विनिमय दर में कम बदलाव के साथ हासिल हो सके। 
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