बिजनेस स्टैंडर्ड - वैश्विक नकारात्मकता और चीन की स्थिति
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वैश्विक नकारात्मकता और चीन की स्थिति

नितिन पई /  October 09, 2018

अगर सन 1979 के बाद से चीन की सफलता का श्रेय चीनी मॉडल को दिया जाता है, तो जाहिर है नाकामी का बोझ भी उसे खुद ही उठाना होगा। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन पई 

 
चंद अजीबोगरीब वजहों से दुनिया भर के कई लोग यह मानते हैं कि चीन के नेता चतुर चालाक एवं गूढ़ रणनीतिकार होते हैं। उनमें दूरगामी सोच अपनाने और दूरगामी कदम उठाने की अस्वाभाविक क्षमता होती है। प्रश्न उठता है कि मैंने अजीबोगरीब क्यों कहा? यह जानने के लिए हमें कुछ बातों पर नजर डालनी होगी। पहली बात, वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी पहले चीन ने जानबूझकर अपने हर बड़े पड़ोसी से दुश्मनी मोल लेना और छोटे पड़ोसियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। इसके चलते उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र और भारतीय उपमहाद्वीप के देश करीब आए। अब इनके पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना, आर्थिक और तकनीकी शक्तियां हैं।
 
दूसरी बात, यह जानते हुए भी कि चीन की चार दशक पुरानी समृद्धि के पीछे तंग श्याओ फिंग के सुधारवादी विचार वजह रहे हैं, चीन के नेतृत्व ने अपना रुख बदला है और वह माओ की बताई राह पर बढ़ रहा है। देश के नेतृत्व ने कारोबार और समाज से उदारवाद को समाप्त किया है। कुछ हद तक राजनीति में भी ऐसा देखने को मिला है। इससे यही संकेत निकलता है कि सुधारों का दौर समाप्त हो चुका है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शीर्ष नेतृत्व का सामान्यीकरण, उत्तराधिकार और आंतरिक जवाबदेही जैसी बातों को त्याग दिया गया है और व्यक्ति पूजा आरंभ हो गई है। राजनेताओं, कारोबारियों और यहां तक कि सेलेब्रिटी सिने सितारों तक का गायब हो जाना इतना आम हो गया है कि अब लोग इस पर उतना ध्यान भी नहीं दे रहे। यह वही फॉर्मूला है जो 20वीं सदी में चीन को गर्त में ले गया था। ऐतिहासिक स्मृतियों से समृद्ध चीनी सभ्यता को इस बात का अहसास तक नहीं है। बीते कुछ महीनों में एक बाहरी बौद्धिक व्यक्ति ने शी चिनफिंग की नीतियों की एक भेदक आलोचना लिखी। यह बात भी सामने आई कि कुछ वरिष्ठ पार्टी अधिकारियों के बारे में जानकारी सामने आई कि उन्होंने गर्मियों में बएदएहे में आयोजित वार्षिक नेतृत्व आयोजन में अपनी नाखुशी जाहिर की।
 
तीसरा, चाहे जिसने भी शुरुआत की हो, लेकिन इस समय चीन, अमेरिका के साथ कारोबारी जंग में उलझ चुका है। आप कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी जंग दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचाती है लेकिन मुद्दा यह है कि चीन के नेताओं ने अपने देश को ऐसी स्थिति में फंसा दिया है जहां अमेरिका चीन के समर्थक से उसका विरोधी बन चुका है। जैसा कि चीन के नेताओं ने कहा भी, व्यापारिक युद्ध सैन्य तनाव को भी बढ़ाते हैं। गत सप्ताह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का नौसैनिक पोत दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक पोत से टकराव के करीब आ गया था। जिन लोगों को लगता है कि बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच तेजी से एक दूसरे के प्रति हमलावर होना रणनीतिक चतुराई है, वे गलत हैं।
 
चौथा, बीते दशक में तिब्बत को निर्दयतापूर्वक कुचलने के बाद चीन का नेतृत्व शिनच्यांग में उइगुर समुदाय के साथ भी यही करने का प्रयास कर रहे हैं। चीन की निगरानी प्रणाली, गहन पुलिस व्यवस्था और सामाजिक नियंत्रण की तरकीब तिब्बतियों के खिलाफ काम कर गई। तिब्बतियों के विरोध का सबसे हिंसात्मक तरीका भी खुद को आग के हवाले करने का था। देखना होगा कि यह तरीका उइगर समुदाय के साथ कारगर होगा या नहीं। उइगर समुदाय तिब्बतियों की तरह अहिंसा पर यकीन नहीं करता और पड़ोसी मुल्कों से उसके जातीय, भौगोलिक और धार्मिक रिश्ते भी हैं। इतना ही नहीं दलाई लामा के साथ व्यापक समझौते को ठुकराना, एक बड़ी गलती साबित हो सकता है।
 
चीन ने वन बेल्ट वन रोड के माध्यम से देश के तमाम विदेशी संबंधों को एक ही पलड़े में रख दिया है, ऐसे में चीन को अपनी परियोजनाओं को लेकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बीते कुछ महीनों के दौरान पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, मलेशिया, मालदीव, नेपाल, जांबिया और ग्रीनलैंड ने चीन के डेट फंड से पोषित परियोजनाओं से हाथ खींच लिए। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने चीनी निवेश और तकनीक को लेकर अपनी निगरानी का स्तर बढ़ा दिया है। हो भी क्यों न? जब से चीन की सरकार ने श्रीलंका, जांबिया और ताजिकिस्तान में बंदरगाह, हवाई अड्डों और 1,000 वर्ग किलोमीटर विवादित जमीन का अधिग्रहण किया है (क्योंकि ये देश अपना कर्ज नहीं चुका सके), तब से अन्य देशों का सतर्क होना लाजिमी है।
 
चीन की मौजूदा हालत के लिए शी चिनफिंग को उत्तरदायी ठहराना आसान है लेकिन वह शायद पार्टी के बुर्जुआ वर्ग की पहले से चली आ रहे सोच को ही आगे बढ़ाता है। अगर सन 1979 के बाद की सफलता के लिए नेतृत्व के चीनी मॉडल को श्रेय दिया गया तो मौजूदा नाकामी का ठीकरा भी उसके ही सर पर फूटना चाहिए। चीन के नेताओं को रहस्यमयी और रणनीति बनाने में उस्ताद मानने के बजाय हमें चीन के नेताओं और उसके मॉडल को सामान्य मानकर देखना चाहिए। चीन और उसके सबसे बड़े नेता को इस वर्ष केवल अपने ही कदमों के चलते पीछे हटना पड़ा। यकीनी तौर पर उनको अमेरिका से आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसके खिलाफ सैन्य परिदृश्य बन रहा है, क्षेत्र के छोटे-छोटे देश भी झुकने को तैयार नहीं हैं और शिनच्यांग से आंतरिक जोखिम बढ़ रहा है। शी चिनफिंग के पास काफी ताकत है लेकिन उनको भी शायद यह महसूस हो गया है कि पार्टी नेतृत्व से असहमति उनके लिए जोखिम पैदा कर सकती है। अब सवाल यही है कि उनकी सरकार किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है?
 
अगर समझदारी से काम लिया गया तो चीन के नेता कुछ मूलभूत विषयों पर अडिग रहेंगे और वैकल्पिक विषयों का लाभ लेंगे। दक्षिण चीन सागर और हिमालय क्षेत्र में संप्रभुता के मुद्दे से जुड़े तनाव के बाद रुख पर अड़े रहने का मतलब होगा अमेरिका, वियतनाम और भारत के साथ और अधिक शत्रुता। एक ओर अगर चीन इन मसलों पर लचीला रुख अपनाता है तो इससे शी की छवि कमजोर होगी और अगर नहीं अपनाता है तो सत्ता पर उनकी पकड़ कमजोर होगी। विकल्पों की बात करें तो मिसाल के तौर पर बेल्ट ऐंड रोड के कर्ज को लेकर नए सिरे से बातचीत पहल को बेपटरी कर सकती है और चीन पर सैकड़ों करोड़ डॉलर का फंसा हुआ कर्ज हो सकता है। इससे भी शी की छवि को धक्का पहुंचेगा। हमारे सामने एक नए तरह की ग्रीक त्रासदी घटित हो रही है जिसमें चीन की निजी विशेषताएं शामिल हैं। हम इससे बाहर नहीं रह सकते लेकिन हमें कोशिश करनी होगी कि हमें इससे कम से कम नुकसान हो।
Keyword: china, model, economy,,
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