बिजनेस स्टैंडर्ड - गांधी के विचारों में विकास का वैकल्पिक मॉडल
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गांधी के विचारों में विकास का वैकल्पिक मॉडल

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  October 08, 2018

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर साल भर चलने वाले समारोह की इस महीने शुरुआत हो गई है। ऐसे में यह आत्मचिंतन का वक्त है। इस अवसर पर मैं आपका 'गांधी टेस्ट' भी करूंगी। गांधी के सबसे उल्लेखनीय आदर्श अहिंसा के संदर्भ में निश्चित तौर पर दुनिया का पतन हुआ है। आज हमें जिंदगी के हरेक क्षेत्र में आक्रामकता नजर आती है। हमारे शब्दों से लेकर हमारे सामाजिक व्यवहार और प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते तक में यह आक्रामकता हावी है। हमारी असहिष्णुता एकदम निचले धरातल पर जा चुकी है। इस पैमाने पर हम शून्य से भी कम अंक हासिल करते हैं।

 
फिर विकास का मुद्दा आता है। गांधी केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर ही नहीं करना चाहते थे, वह आने वाले दौर को भी लेकर सोचते थे। उन्होंने इसके बारे में सोचा, लिखा और आगे चलकर अंजाम दिए जाने वाले कार्यों को लेकर अलग राय भी बनाई। गांधी के विचार कार्ल माक्र्स और एडम स्मिथ की विचारधाराओं का विकल्प पेश करते हैं। इस मामले में भी शून्य के करीब ही पहुंच पाए हैं। आज के समय में गांधी का वजूद प्राथमिक तौर पर उनके विचारों की ही वजह से है, इसलिए नहीं कि हमने उन विचारों को व्यवहार में अपनाया है। यह एक तथ्य है कि गांधी की मौत इसीलिए हुई थी कि उनके अनुयायियों ने अपनी हरकतों से उनकी हत्या कर दी। गांधी के अनुयायी आश्रमों में रहने को तरजीह दी जिससे उनके विचार सीमित जगह में ही कैद होकर रह गए। इन अनुयायियों का बाकी दुनिया से अलगाव हो गया। उन्होंने गांधी को रेट्रो बना दिया जबकि खुद गांधी आश्रम में रहने और तमाम प्रतीकात्मकता के बावजूद दुनिया से बखूबी जुड़े रहते थे। ये तो हम लोग हैं जिन्होंने गांधी को एक संकीर्ण सैद्धांतिक प्रतीक बनाकर रख दिया है। वह अपने दौर की राजनीति के लिए जिंदा रहे और उन्होंने खुद को अडिग रखते हुए करोड़ों लोगों को चलायमान बनाया था।
 
आज गांधी के बारे में सर्वाधिक चर्चित चीज खादी है जो एक बार फिर से फैशन में है। लेकिन हम यह नहीं जानते और न ही हमें यह बताया गया है कि गांधी ने खादी को इतनी अहमियत क्यों दी थी? उन्होंने खादी का इस्तेमाल स्वतंत्रता के एक साधन के तौर पर किया- केवल ब्रिटिश दासता से नहीं बल्कि औद्योगीकरण से भी आजादी। उस समय भी औद्योगीकरण ही चलन में था और आज भी यही है। उनके लिए खादी रोजगार का भी जरिया था लेकिन यह जनसमूह के लिए नहीं बल्कि जनसमूह के द्वारा रोजगार था। गांधी के लिए खादी कपास के खास बीज से जुड़ा मामला था जिसकी बुनाई के काम से बड़ी संख्या में लोग जुड़ सकते थे। अंग्रेज भारत में कपास की जो किस्म लेकर आए थे उसकी बुनाई लेकर लंकाशर की मिलों में ही हो सकती थी। इस लिहाज से खादी का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन से भी जुड़ा हुआ था क्योंकि इससे बड़ी संख्या में लोग जुड़ सकते थे। यह भूमंडलीकरण नहीं बल्कि स्थानीयकरण से संबंधित था।
 
गांधी ने कपास की जिस किस्म को खादी के लिए चुना था वह स्वदेशी बीज था। इसकी खेती के लिए कम पानी की जरूरत थी और उसमें कीड़े भी कम लगते थे। यह देश के पर्यावरण के लिए बेहद मुफीद रहा होता। किसानों को कपास की खेती की बढ़ती लागत और फसल खराब होने का जोखिम बढऩे से आत्महत्या भी नहीं करनी पड़ती। लेकिन ऐसा तभी हो पाता जब हम गांधी के इस मॉडल के हिसाब से चले होते।  गांधी की प्रासंगिकता की यही वजह है। पूंजीवाद और सांप्रदायिकता दोनों ही बेरोजगारी और पर्यावरण संबंधी खतरों का जवाब तलाशने में नाकाम रहे हैं। एडम स्मिथ के विचारों से प्रेरित दुनिया अधिक ऑटोमेशन की तरफ बढ़ रही है। पूंजीवादी मान्यता है कि उत्पादकता बढऩे से अवसर और कौशल में भी बढ़ोतरी होगी। वहीं माक्र्स की दुनिया औपचारिक उद्योग और श्रमिक संगठनों से आगे बढ़ पाने में दिक्कत महसूस कर रही है। वे इस बात को नहीं समझ सकते हैं कि रोजगार की दुनिया व्यक्तिगत उद्यमियों के हाथों में ही सिमटी हुई है। माक्र्सवादी विकास मॉडल अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों के मॉडल से अधिक अलग नहीं है।
 
जब मामला पर्यावरण से जुड़ा हो तो मैं इस बारे में पुख्ता तौर पर कह सकती हूं। मेरा मानना है कि दोनों ही विकास मॉडल जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया को त्रासद प्रलय की तरफ ले जाएंगे। गांधी अब भी अप्रचलित नहीं हुए हैं, बस हमें ही नहीं पता कि उनके विचारों का अनुसरण कैसे करना है? हमारे पास ऐसे नेता नहीं हैं जो उनके विचारों को आत्मसात करते हुए मौजूदा वक्त के हिसाब से ढाल सके। मेरे हिसाब से गांधी के बारे में सबसे अहम चीज यह थी कि वह अपने विचारों को मुकाम तक पहुंचाने के लिए प्रयास करने की सामथ्र्य रखते थे। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में गांधी अहिंसा, न्याय और समानता के अपने सिद्धांतों पर हमेशा अडिग रहते थे।
 
आखिर में, गांधी टेस्ट में हम केवल लोकतंत्र के मोर्चे पर ही शून्य से कुछ ऊपर अंक हासिल करने में सफल होने का दावा कर सकते हैं। लेकिन हम लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने के लिए उनके विचारों को ग्राम्य गणतंत्र के मुकाम तक नहीं ले जा सके हैं। हम इस मामले में नाकाम रहे हैं। इसके बजाय हमने प्रतिनिधिक लोकतंत्र को सशक्त करने का फैसला किया है जबकि गांधी सहभागी लोकतंत्र में यकीन करते थे। लेकिन हमारी निजता पर नए दौर के अतिक्रमण और पुरानी सोच वाले लोगों से मिल रही धमकियों के बावजूद लोकतंत्र जिंदा बना हुआ है। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। महात्मा गांधी की जयंती का अगले साल 150 वर्ष पूरा होने जा रहा है। यह वक्त गांधी के बारे में सोचने का है।
Keyword: mahatma gandhi, khadi, cotton, textiles,,
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