बिजनेस स्टैंडर्ड - जनहित का मुद्दा और नीतिगत तालमेल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, October 22, 2018 02:55 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जनहित का मुद्दा और नीतिगत तालमेल

श्याम पोनप्पा /  October 08, 2018

जनहित की मांग तो यही है कि समतापूर्ण विकास लाने के लिए वास्तविक सुधारों को अंजाम दिया जाए। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
यह बात हर व्यक्ति समझता है कि देशव्यापी बदलाव के लिए उच्चगति वाले ब्रॉडबैंड लिंक की आवश्यकता है। इसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और कई अन्य क्षेत्रों में नये अवसर तैयार करने जैसे काम किए जा सकते हैं। नई डिजिटल संचार नीति 2018 (एनडीसीपी) में देश के हर नागरिक को 50 एमबीपीएस की गति, 5जी की सुविधा आदि देने की आकांक्षा प्रकट की गई है जबकि हकीकत में हर गांव में दो वाईफाई हॉटस्पॉट स्थापित करने का ही लक्ष्य है। निश्चित तौर पर अनुचित देरी के बाद केवल ऐसे आकांक्षा भरे वक्तव्यों से सबको उच्चगति वाला ब्रॉडबैंड मिलना सुनिश्चित नहीं हो सकता। न ही नीतिगत भटकाव में उलझा बाजार संचार और नेटवर्क को किफायती बनाने के लिए जरूरी पूंजी जुटा पाएगा। एनडीसीपी के अति महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों के सामने हमारे पास केवल कमजोर सेवाएं हैं। अहम सुधार अब तक लंबित हैं और यह बात भविष्य को लेकर भी आशान्वित नहीं करती। अतिरिक्त करों को 32 फीसदी के उच्च स्तर से कम करना, अधिक किफायती स्पेक्ट्रम का प्रयोग सुनिश्चित करना आदि कुछ जरूरी सुधार हैं। हमारी आवश्यकताएं बढ़ती जा रही हैं लेकिन हकीकत में जरूरी नीतिगत कदमों के स्थान पर केवल बातें ही सुनने को मिल रही हैं।
 
इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा से जुड़े निर्माण के क्षेत्र में भी हमें ऐसा ही रुख देखने को मिला है। देश की मोबाइल क्रांति पूरी तरह उपकरणों, सॉफ्टवेयर, और हैंडसेट के आयात पर निर्भर है। इसी तरह सौर ऊर्जा के लिए भी हमारा देश आयात पर निर्भर है। हाल के दिनों में सौर उपकरणों के स्थानीय निर्माण को लेकर जो प्रयास किए गए उनको उचित प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसकी वजह भी नीतियों और प्रोत्साहन के मोर्चे पर कमजोरी ही रही। इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम बात यह है कि जनहित, जिसे लक्ष्य बनाने का दावा हमारे राजनेता, प्रशासक और विश्लेषक करते हैं, वह दरअसल में है क्या? गरीब समर्थक होने का भी एक पहलू है। प्रश्न यही है कि आखिर जनहित और गरीब समर्थक होने से क्या आशय है और गरीबी उन्मूलन के अलावा इसका क्या अर्थ है? कई लोग कहते हैं कि आम आदमी होना जनहित का पर्याय है। वहीं कुछ और लोग इसमें आम जनता, गरीबों और किसानों आदि को शामिल करते हैं। 
 
इतना ही नहीं अपवाद को भी विभाजित किया गया है, मसलन जिनके पास वाहन है उन्हें बाहर रखा गया है। ऐसे अपवाद विनिर्माण पर भी लागू होते हैं, मसलन कार या दोपहिया वाहन, क्योंकि ये प्रदूषण बढ़ाते हैं और सड़कों पर भीड़ भी। इसी प्रकार वातानुकूलक, रेफ्रिजरेटर आदि भी। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बाजार के सिद्धांतों को विलासिता की वस्तुओं जैसी अपमानजनक बात के सामाजिक विचार से मिला दिया गया है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि स्वचालन क्षेत्र नीतिगत समन्वय का आदर्श प्रस्तुत करता है।
 
ईंधन मूल्य निर्धारण भी एक पहेली है क्योंकि एक ओर जहां यह बहुसंख्यकों को प्रभावित करती है, वहीं व्यवहार ऐसा होता है जैसे कि यह केवल प्रभावशाली वर्ग पर असर डालती हो। 2016 में प्रभावशाली उपभोक्ता कुल आबादी के 27 फीसदी के बराबर थे और 2025 तक ये बढ़कर 40 फीसदी हो सकते हैं। इनमें से कई निहायत उत्पादक हैं और उत्पादकता को कम करना निर्यात को सीमित करने के अलावा किसी प्रकार लाभप्रद नहीं है। खासतौर पर ऐसे वक्त में जबकि उत्पादकता में गिरावट पहले ही नजर आ रही है।
 
आइए देखते हैं कि आखिर जनहित की परिभाषा क्या है? उसका एक स्वरूप इस प्रकार है: 
 
जनहित से तात्पर्य है आम जनता का हित या कल्याण। इसके तहत संपूर्ण समाज को सरकार तथा उसकी एजेंसियों द्वारा बढ़ावा मिलना चाहिए, उनका संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। जनहित का मुद्दा संपूर्ण समाज का मुद्दा है और यह विशेष हितों से परे हैं। यह किसी व्यक्ति, समूह या कंपनी के हित का मामला नहीं है। जनहित में सबके कल्याण की बात निहित है। परंतु इस दौरान भी चयनित नियमन आवश्यक है। मसलन वंचितों के लिए या ऊर्जा, निर्यात या स्वचालित उत्पादों के लिए क्षेत्रवार योजना। इसके बावजूद मूल मानक तो जन कल्याण ही होना चाहिए। हमें अक्सर जिन प्रश्नों का सामना करना पड़ता है वे विशेष हित वाले समूहों से जुड़े होते हैं। संपूर्ण समाज की बात शायद ही कभी आती हो।
 
जनहित को लेकर समग्र दृष्टिकोण नीति निर्माण, प्रशासन, विश्लेषण और हिमायत करने वालों को किस प्रकार प्रभावित करता है? वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद ब्राजील के उदाहरण पर गौर करना उचित होगा। ब्राजील घटते निर्यात, कम निवेश और ऋण की समस्या से जूझ रहा था। इससे आय और कर संग्रह दोनों में कमी आ रही थी तथा बेरोजगारी बढ़ रही थी। वर्ष 2008-09 में सरकार की प्रतिक्रिया करों में चरणबद्ध कमी और नकदी बढ़ाने की थी। सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में ब्याज दर घटाना भी योजना का हिस्सा था।
 
इन नीतिगत बदलावों से कर में कमी आई। वाहन क्षेत्र से हुई शुरुआत धीरे-धीरे टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और निर्माण सामग्री तक पहुंच गई। एक वर्ष से 15 महीनों तक यही हालात रहे। कुछ उत्पादों मसलन, स्टोव और छोटी वॉशिंग मशीन पर कर घटाकर शून्य कर दिया गया। इस बीच सिगरेट पर कर बढ़ाया गया। परिणामस्वरूप शुरुआती गिरावट के बाद कर राजस्व में उच्च उत्पादन और खपत से बढ़ोतरी हुई।  प्रोत्साहन वैकल्पिक परिदृश्य आजमाने का अच्छा तरीका है। परिदृश्य की योजना बनाने की एक और अहम वजह यह है कि समन्वित नीतियां उच्च वृद्धि प्रदान कर सकती हैं। जबकि बिना नीतिगत मदद के विदेशी ऋण भी यह वृद्धि नहीं दे सकता। कम ब्याज दरों के साथ नीतिगत ढांचा और बढिय़ा बुनियादी ढांचा वृद्धि को गति दे सकता है। इस तरह चालू खाते के असंतुलन के बावजूद पूंजी जुटाई जा सकती है। विदेशी पूंजी के लिए जूझने के बजाय ऐसे विकल्पों का आकलन अवश्य किया जाना चाहिए। कम दरें एनपीए से निपटने में भी मददगार हो सकती हैं क्योंकि बैंकों को बढ़ते बॉन्ड मूल्य से फायदा पहुंच सकता है।
 
वैकल्पिक तरीकों को आजमाना जनहित का काम है। इसमें कच्चे माल और करों को भी शामिल किया जाना चाहिए। कोयला आवंटन एवं प्रबंधन, वाहन ईंधन मूल्य निर्धारण और वाहन निर्माण, स्पेक्ट्रम आवंटन और प्रबंधन आदि क्षेत्रों में ऐसे विश्लेषण की आवश्यकता है। वित्तीय क्षेत्र में उपलब्ध विकल्पों की बात करें तो मुद्रास्फीति को लक्षित करने, राजकोषीय घाटा कम करने के लिए कर लगाने, उच्च ब्याज दरों की मदद से विदेशी पूंजी जुटाने और आयात को नियंत्रित करने, और वाहन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा उपकरण आदि के निर्माण के क्षेत्र में समन्वित नीतियों को विकल्प के रूप में आजमाया जा सकता है।
Keyword: telecom, trai, spectrum, NDCP, health, education, court,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या हवाई यात्रियों को मुआवजा मामले में सख्ती दिखाए सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.