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भारतीय कंपनियां वृद्धि के बजाय कर्ज घटाने पर दे रहीं जोर

कृष्ण कांत /  October 07, 2018

पिछले वित्त वर्ष में लगातार तीसरे साल भारतीय कंपनियों का जोर अपनी बैलेंस शीट को ऋणमुक्त बनाने पर रहा। वे हाल में राजस्व वृद्धि में सुधार के बावजूद वृद्धि पर जोर नहीं दे रही हैं। वित्त वर्ष 2018 में लगातार तीसरे साल भारतीय कंपनियों का शुद्ध कर्ज-इक्विटी अनुपात सुधरा है, जबकि नई परियोजनाओं में निवेश 10 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया है।

वित्त वर्ष 2018 में संयुक्त रूप से कंपनियों की स्थायी संपत्तियों या संयंत्रों एवं उपकरणों में निवेश 3 फीसदी बढ़ा, जो पिछले कम से कम 10 वर्षों में सबसे धीमी वृद्धि है। इन संयंत्रों में कंपनियों की इस समय तैयार हो रही परियोजनाएं भी शामिल हैं, लेकिन तेल एवं गैस क्षेत्र कंपनियां शामिल नहीं हैं। 

इसके चलते भारतीय कंपनी जगत की उधारी लगभग रुक गई है। पिछले साल कंपनियों का संयुक्त रूप से कुल ऋण सालाना आधार पर 3.3 फीसदी अधिक था, जो पिछले एक दशक में सबसे सुस्त रफ्तार से बढ़ा है। इसकी तुलना में पिछले साल इन कंपनियों का संयुक्त राजस्व सालाना आधार पर 10.5 फीसदी अधिक था, जबकि उनका शुद्ध लाभ 3.4 फीसदी बढ़ा।

बहुत सी कंपनियों के ऊंचे लाभ और ताजा पूंजी जुटाने के कारण पिछले वित्त वर्ष में नेट वर्थ या शेयरधारकों की इक्विटी 9.7 फीसदी अधिक थी। विनिर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में नए निवेश घटने की रफ्तार और अधिक है। पिछले वित्त वर्ष में तेल एवं गैस, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं  और फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफएमसीजी) कंपनियों को छोड़कर अन्य कंपनियों की संयुक्त रूप से स्थायी संपत्तियां 2.8  फीसदी बढ़ीं, जो पिछले एक दशक में सबसे सुस्त वृद्धि है। इसका नतीजा यह निकला है कि कंपनियों की  बैलेेंस शीट में कर्ज का बोझ घटा है। यह बैंकरों और कर्ज में दबी बहुत सी कंपनियों के शेयर बाजार मूल्यांकन के लिए सकारात्मक है।  

वित्त वर्ष 2018 में कंपनियों (ऊर्जा को छोड़कर) का शुद्ध कर्ज उनके नेट वर्थ या शेयरधारक इक्विटी के अनुपात में सुधरकर औसतन 60 फीसदी पर आ गया। यह वित्त वर्ष 2016 में 68  फीसदी पर एक दशक के सर्वोच्च स्तर पर था। इस अवधि में तेल एवं गैस, आईटी सेवाएं और एफएमसीजी को छोड़कर अन्य कंपनियों का कर्ज अनुपात सुधरकर 80 फीसदी पर आ गया, जो वित्त वर्ष 2016 में 10 साल के सर्वोच्च स्तर 87 फीसदी पर था।

तेल एवं गैस क्षेत्र का मुनाफा बहुत से विदेशी कारकों और सरकारी नियमों से तय होता है। वहीं आईटी और एफएमसीजी कंपनियां पहले से ही कर्ज मुक्त रही हैं और उनके पास बड़ी मात्रा में नकदी है। इससे शेष भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट का अनुपात बदल जाता है। 

हालांकि विश्लेषकों आगाह करते हैं कि मुख्य अनुपातों को बेहतरी का संकेत मानना ठीक नहीं है। इक्विनोमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक और एमडी जी चोक्कालिंगम ने कहा, 'इक्विटी के अनुपात में कर्ज में गिरावट उपभोक्ता क्षेत्रों में ज्यादा मुनाफे या ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत कंपनी ऋण के पुनर्गठन की वजह से आई है। इस कानून के चलते बैंकों को इन कंपनियों को अपने ऋण में बड़ा हिस्सा छोडऩे के लिए बाध्य होना पड़ा है।'

आईबीसी के तहत कंपनियों का कर्ज बैंकों का घाटा बन जाता है और इससे कंपनियों के कर्ज में कमी दिखती है। इस साल मार्च के अंत में भारतीय कंपनियों का कुल कर्ज 26.9 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले के स्तर 25.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इसके मुकाबले मार्च के अंत में कंपनियों के पास नकदी एवं इसके समान संपत्ति 8.66 लाख करोड़ रुपये थी, जो एक साल पहले के स्तर 8.73 लाख करोड़ रुपये से कम है।

इस साल मार्च के अंत में तेल एवं गैस कंपनियों को छोड़कर अन्य कंपनियों का कुल ऋण बढ़कर 22 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 21.3 लाख करोड़ रुपये था। इस दौरान कंपनियों का नकदी भंडार बढ़कर 7.48 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 7.42 लाख करोड़ रुपये था। 

यह विश्लेषण उन 911 कंपनियों की सालाना ऑडिटेड बैलेंस शीट पर आधारित है, जो बीएसई 500, बीएसई मिड-कैप और बीएसई स्मॉल कैप इंडेक्स का हिस्सा हैं। इस नमूने में बैंक एवं गैर-बैंक ऋणदाता शामिल नहीं हैं। औसत आंकड़ों को सूचीबद्ध होल्डिंग कंपनियों की सूचीबद्ध सहायक कंपनियों के साथ समायोजित किया गया है ताकि दोहरी गणना से बचा जा सके। 

कंपनियों की बैलेंस शीट में कर्ज का भार धीरे-धीरे कम हो रहा है मगर यह आसानी से नहीं हो रहा है। ज्यादातर क्षेत्रों की कंपनियों ने पिछले वित्त वर्ष में अपने ऋण अनुपात में सुधार दर्ज किया है, लेकिन इस दौरान धातु एवं खनन, ऊर्जा एवं दूरसंचार क्षेत्रों में इक्विटी अनुपात में शुद्ध कर्ज की स्थिति बिगड़ी है।

यह चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि इन तीन क्षेत्रों का वित्त वर्ष 2018 में भारतीय कंपनी जगत के कुल बकाया ऋण में औसतन 43 फीसदी हिस्सा रहा। ऋणदाताओं की एक अन्य चिंता यह है कि कुछ क्षेत्र की कंपनियों को ही अच्छा मुनाफा हो रहा है। लाभ दर्ज करने वालीं और कर्ज में दबी कंपनियां अलग-अलग हैं। जिन कंपनियों और क्षेत्र पर सबसे ज्यादा कर्ज है, वे सबसे ज्यादा लाभ वाली कंपनियां नहीं हैं।

इससे बैंकों के लिए अपना कर्ज वसूल पाना मुश्किल हो गया है। उदाहरण के लिए बिजली कंपनियों का कुल कंपनी ऋणों में करीब 20 फीसदी हिस्सा है। लेकिन इस क्षेत्र का कुल कंपनी लाभ में महज 5.9 फीसदी हिस्सेदारी है। सबसे ज्यादा कर्ज वाले चार क्षेत्र बिजली, धातु एवं खनन, निर्माण एवं बुनियादी ढांचा और दूरसंचार हैं। इनका कुल उधारी में करीब 53 फीसदी हिस्सा है, लेकिन वित्त वर्ष 2018 में कुल कंपनी लाभ में महज 12 फीसदी  हिस्सेदारी रही। बड़े कर्जदारों में तेल एवं गैस क्षेत्र, वाहन और दवा ही केवल ऐसे क्षेत्र हैं, जहां कर्ज और लाभ लगभग बराबर हैं। 

विश्लेषक कंपनी कर्ज के भविष्य के रुझान को लेकर आगाह करते हुए कहते हैं कि लाभ में संभावित गिरावट से कर्ज घटाने की प्रक्रिया पर भी जोखिम है। हाल में ब्याज दरें बढऩे के अलावा कच्चे तेल और धातुओं की कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों के मुनाफे में कमी आने की आशंका है। 

उनका कहना है कि इसके लिए कुछ हद तक सरकार जिम्मेदार है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पर्याप्त पूंजी डालने में नाकाम रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही कंपनियों को ऋण देने वाले मुख्य ऋणदाता हैं। इससे सरकारी बैंकों के नए ऋणों में लगभग ठहराव आ गया है।

धनंजय ने कहा, 'बैंकिंग प्रणाली एक गुणक प्रभाव के जरिये काम करती है। कंपनी को उधारी बंद होने से उद्यमों के लिए नकदी और भुगतान की दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं, जिससे बैंकों के फंसे ऋणों में और इजाफा होता है।' पिछले दो दशकों में पहली बार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 20117 और 2018 में शुद्ध  आधार पर कोई नए ऋण नहीं दिए। दूसरे शब्दों में कहें तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उससे कम ऋण दे रहे हैं, जितने ऋण उनके पास लौट रहे हैं, जिससे कंपनियों को ऋण कम मिल पा रहा है। 

Keyword: balance Sheet, Company, Financial year, assets, FMCG,
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