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हमारा बोर्ड या उनका बोर्ड हर जगह वही कहानी

कनिका दत्ता /  October 07, 2018

पिछले महीनों में घटित कई अशोभनीय घटनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि भारत में कंपनियों के संस्थापक-मालिक और ताकतवर मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) को कंपनी प्रशासन के मामले में असंगत छूट मिली होती है। इस छूट के लिए काफी हद तक हमारी कॉर्पोरेट संस्कृति का अपेक्षाकृत युवा होना और भारतीय नियामकीय संस्थानों का उभरता स्वरूप जिम्मेदार है।

लेकिन हमारे नियामकों की अगर सोच सही है तो वे अपनी हिम्मत बनाए रख सकते हैं। आईसीआईसीआई बैंक, येस बैंक, फोर्टिस हेल्थकेयर और आईएलऐंडएफएस विशेषाधिकार-प्राप्त कंपनियां नजर आती हैं। उधर अमेरिका में हाल की घटनाएं बताती हैं कि किसी भी स्तर का संस्थागत पर्यवेक्षण हो या पुरानी कंपनी हो, कॉर्पोरेट संस्कृति के संदर्भ में निदेशक मंडल कमजोर ही रहता है। 

येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के जेफ सॉनेनफेल्ड ने एक साक्षात्कार में टेस्ला कंपनी के बोर्ड का जिक्र करते हुए कहा, 'वे सभी अधिक जोखिम को लेकर एक जैसे विचार ही रखते हैं।' सॉनेनफेल्ड ने यह राय टेस्ला के सह-संस्थापक एलन मस्क और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) के बीच हुई विवाद के संदर्भ में दी थी।

मस्क को चेयरमैन पद छोडऩे के साथ ही करोड़ डॉलर का जुर्माना भरने को कहा गया है। एसईसी ने यह कार्रवाई मस्क के उस ट्वीट के बाद की है जिसमें टेस्ला के कर्ताधर्ता ने एक काल्पनिक योजना का जिक्र किया था जिसके बाद कंपनी के शेयर धराशायी हो गए थे। इसके अलावा मस्क को तीन वर्षों तक चेयरमैन पद के अयोग्य घोषित कर दिया गया। हालांकि मस्क इस दौरान टेस्ला के सीईओ बने रहेंगे।

लेकिन भारत में ऊंचे रसूख वाले कंपनी संस्थापक या मालिक के खिलाफ बाजार नियामक सेबी का ऐसी सख्ती बरतना सोच से भी परे है। वैसे टेस्ला मामले में एसईसी ने जो कदम उठाया है उसकी आलोचना भी हो रही है।

सॉनेनफेल्ड ने कहा 'एसईसी शुरू में तो मस्क को बोर्ड में किसी भी तरह का प्रतिनिधित्व बनाए रखने के खिलाफ था, फिर धोखाधड़ी के लिए सजा कहां दी गई?' कई विश्लेषकों का मानना है कि टेस्ला की मुश्किलों को देखते हुए मस्क को कुछ महीने पहले ही बोर्ड से हट जाना चाहिए था। 

गत 18 महीनों में सेल्फ ड्राइविंग कार समेत कई गड़बडिय़ां देखने को मिलीं और कंपनी पर कर्ज का बोझ भी बढ़कर 10.5 अरब डॉलर हो गया लेकिन मस्क चीन और एरिजोना में नए संयंत्र लगाने की बात करते रहे। मस्क का अजीबोगरीब बरताव भी चर्चा का विषय बना।

एक बार लाइव वेबकास्ट के दौरान वह नशे का सेवन करते हुए भी दिखे। उन्होंने 'टेक प्राइवेट' योजना को लेकर जो ट्वीट किया उसके बाद टेस्ला के शेयर लुढ़क गए और सीईसी हरकत में आई। लेकिन कंपनी का बोर्ड इस दौरान चुप्पी साधे रहा।

कंपनियों के बोर्ड का मिलनसार रवैया 126 साल पुरानी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) को भी अपनी गिरफ्त में लेता हुआ नजर आ रहा है। हाल ही में जीई के बोर्ड ने जॉन फ्लैनरी की जगह एक 'बाहरी' को कमान सौंपने का फैसला किया है। फ्लैनरी पर आरोप लगा था कि वह जीई के कायापलट की योजना पर काफी धीमी रफ्तार से चल रहे हैं। लेकिन लगता है कि फ्लैनरी अपने पूर्ववर्ती जेफ इमेल्ट से विरासत में मिली परेशानियों से भी जूझ रहे थे।

इमेल्ट ने अपने पूर्ववर्ती जैक वेल्च की तरह अपनी अलग छवि नहीं बनाई थी लेकिन वह काफी हद तक ताकतवर सीईओ थे और कंपनी की स्वास्थ्य बीमा और बिजली इकाइयों में नजर आ रही मुश्किलों का अंदाजा उन्हें था। सवाल है कि जब विश्लेषक की रिपोर्ट में इन समस्याओं को लेकर लाल झंडी दिखाई गई तभी बोर्ड ने इस मसले को क्यों नहीं उठाया था?

उस समय किसी ने नहीं पूछा और उसका अनुमान यह लगाया गया कि फ्लैनरी लाल झंडा दिखाने के लिए कुछ ज्यादा ही भीतरी आदमी थे। सीएनबीसी के एक विश्लेषक ने इसे 'चुप्पी का माफिया कोड' बताते हुए कहा कि इस तरह निवेशकों को इन संकटों की जानकारी से दूर रखा गया। 

फेसबुक प्रकरण पर भी गौर सकते हैं। ऐसा लगता है कि इस दिग्गज ऑनलाइन कंपनी में हरेक महीने बड़ा संकट पैदा हो रहा है। कभी सुरक्षा में सेंधमारी तो कभी हैकिंग के मामले सामने आ रहे हैं।

इन घटनाओं के बीच फेसबुक की सहयोगी कंपनी व्हाट्सऐप के संस्थापकों का बाहर होना और अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने के आरोपों का भी मामला उभरा है। वैसे फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग इन अड़चनों से बेअसर नजर आ रहे हैं। फेसबुक के बोर्ड में शामिल किसी भी सदस्य जुकरबर्ग के बढ़ते वर्चस्व को चुनौती देता नहीं दिख रहा है।

कंपनी बोर्ड में शामिल व्यक्ति की निजी साख कितनी भी शानदार हो, उस बोर्ड की ताकत शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के करिश्मा के प्रतिकूल अनुपात में ही होती है। टेस्ला मामले में सॉनेनफेल्ड ने सुझाव दिया है कि मस्क को बोर्ड में सलाहकार के तौर पर जगह दी जानी चाहिए ताकि कंपनी उनकी प्रतिभा का फायदा उठा सके। इस दौरान कंपनी के प्रबंधन में भी कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

यह सुझाव भले ही सुनने में अच्छा लगे लेकिन इस दिशा में किए गए कुछ प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं। ऐपल से अलग होने के बाद उसमें दोबारा वापसी करने वाले स्टीव जॉब्स, ट्विटर के जैक डोरसी और इन्फोसिस के एन आर नारायणमूर्ति जैसे कुछ नाम गिनाए जा सकते हैं।

एनरॉन, लीमन ब्रदर्स से लेकर ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और सत्यम तक हरेक मामले में सबक एक ही है। वह सबक है कि कंपनियों का बोर्ड जब तक शख्सियतों से मोहासक्त होना कम नहीं करेगा और अपने दायित्वों के प्रति सजग नहीं होगा, कंपनी जगत में ऐसे संकट नियमित अंतराल पर नजर आते रहेंगे।

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