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बोफोर्स जैसा प्रभावी नहीं है राफेल मुद्दा

शेखर गुप्ता /  October 07, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कठोरतम आलोचक भी यह नहीं मानेगा कि राफेल मामला उनके लिए बोफोर्स साबित हो रहा है। वे यह जरूर मानते हैं कि राफेल में यह क्षमता है कि वह कुछ महीने पहले तक अपराजेय लग रही मोदी सरकार की हार की वजह बन सके। हालांकि इसमें भी उन्हें कुछ तत्त्वों की कमी लगती है। 

पहली बात, देश के दूरदराज हिस्सों में ज्यादातर लोग राफेल के बारे में नहीं जानते। इंडिया टुडे एक्सिस-माई इंडिया का सर्वेक्षण बताता है कि उत्तर प्रदेश में केवल 21 फीसदी लोग राफेल के बारे में जानते हैं। जाहिर है इसका दोष हम पत्रकारों पर ही आएगा।

दूसरा, ऐसा कोई नेता नहीं है जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा नैतिक साहस हो और जो मामले को मतदाताओं तक पुरयकीन अंदाज में पहुंचा सके। कांग्रेस और राहुल गांधी तो इसलिए भी नहीं क्योंकि उन पर बोफोर्स समेत कई घोटालों की छाया है।

विपक्ष, खासतौर पर राहुल गांधी ने राफेल को 2019 के आम चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने की ठानी। उन्होंने व्यापक भ्रष्टाचार और कारोबारियों से निकटता को मुद्दा बनाना शुरू किया। कहा गया कि अगर मोदी संकटग्रस्त कंपनियों के मालिक और एक विवादित कारोबारी के साथ करीबी रिश्ते रख सकते हैं, तो क्या उनसे यह अपेक्षा करना उचित है कि वे सफल और अमीर लोगों से दूरी दूरी रखेंगे? मोदी सरकार को 'सूटबूट की सरकार' करार देने के पुराने फॉर्मूले पर काम करने के लिए उन्हें राफेल को केंद्र में रखना होगा।

विपक्ष को मीडिया की कमी खल रही है। उसके मुताबिक उसके पास रामनाथ गोयनका के दिनों के द इंडियन एक्सप्रेस जैसा कोई समाचार माध्यम नहीं है जिसने बोफोर्स के दिनों में जनता की राय बनाने में मदद की थी। विपक्ष के पास दो ऐसे लोग हैं जिनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर कोई दाग नहीं हैं। ये हैं अरुण शौरी और प्रशांत भूषण।

यह लड़ाई राहुल के नेतृत्व में नहीं लड़ी जा सकती है और न ही मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा में कोई कद्दावर बागी नजर आया है। याद करें तो इंदिरा गांधी के खिलाफ जगजीवन राम जैसे शीर्ष नेता की बगावत और राजीव गांधी के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह की बगावत ने क्रमश: सन 1977 और सन 1988-89 में राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे।

यह सोचना भी मुश्किल है कि भाजपा के भीतर से वीपी सिंह जैसा कोई नेता निकलेगा। वीपी सिंह के पास ईमानदार और बलिदानी होने का दोहरा तमगा था क्योंकि उन्होंने कैबिनेट का बड़ा पद छोड़ा था। दूसरा, वह भले ही मोदी या अटल बिहारी वाजपेयी जैसे वक्ता नहीं थे लेकिन उनमें इतनी चतुराई थी कि उन्होंने एक जटिल रक्षा सौदे को एक ऐसे रूपक में बदल दिया था जो 30 साल पहले हिंदी प्रदेश के मतदाताओं की समझ में आ गया था।

उन्होंने सन 1987 में कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया था। उस वक्त राजीव गांधी का पराभव शुरू ही हुआ था। वीपी सिंह ने संसद की अपनी सीट त्याग दी और इलाहाबाद से उपचुनाव लडऩा तय किया। अमिताभ बच्चन ने बोफोर्स घोटाले में रिश्वत की छाया के बीच यह सीट खाली की थी।

माहौल पूरी तरह अनुकूल था लेकिन उनके दोस्त और दुश्मन दोनों यह मान रहे थे कि सिंह बोफोर्स को मुद्दा नहीं बना पाएंगे। सवाल यह था कि गरीब ग्रामीण जनता इसे कैसे समझेगी? सिंह ने इसे बहुत कलात्मक अंदाज में अंजाम दिया। उन्होंने भारी गर्मियों में मोटर साइकिल के पीछे बैठकर प्रचार किया।

वह अपने गले में एक गमछा डाले रहते थे। ठीक वैसे ही जैसे इन दिनों कार्यकर्ता से राजनेता बने योगेंद्र यादव करते हैं। सिंह रास्ते में पडऩे वाले गांवों में लोगों से एक ही बात कहते थे कि क्या वे जानते हैं कि राजीव गांधी ने उनके घरों में चोरी की है?

इसके बाद वह अपने कुर्ते की जेब से माचिस की एक डिब्बी निकालते और कहते, 'इस माचिस को देखिए। जब आप अपनी बीड़ी या हुक्का या फिर चूल्हा जलाने के लिए चार आने (25 पैसे) की माचिस खरीदते हैं तो इसका एक चौथाई सरकार को कर के रूप में जाता है।

इसी पैसे से सरकार आपके स्कूल, अस्पताल, सड़क, नहर आदि बनाती है और सेना के लिए हथियार खरीदती है। यह आपका पैसा है। अगर कोई इसमें से कुछ पैसे चुरा लेता है, वह भी हथियार खरीदते वक्त तो क्या यह आपके घर में सेंधमारी नहीं है?'

बोफोर्स मामले में तथ्य कम थे और सिंह की किस्सागोई अधिक। सिंह कहते कि राजीव गांधी कहते हैं उनके पास बोफोर्स का एक प्रमाणपत्र है कि रिश्वत का लेनदेन नहीं हुआ है। वह कहते कि यह वैसा ही है जैसे कोई पागल, पागलखाने का प्रमाणपत्र दिखाकर कहे कि वह अच्छी मानसिक स्थिति में है और चूंकि बाकियों के पास वह प्रमाणपत्र नहीं है इसलिए वे मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं।

बोफोर्स को लेकर वह एक किस्सा सुनाते थे कि एक सर्कस में एक शेर, एक घोड़ा, एक बैल और एक बिल्ली पास-पास रहते थे। एक रात किसी ने पिंजरों का दरवाजा खोल दिया। अगली सुबह मालिक ने देखा कि घोड़े और बैल के अवशेष पड़े हैं। शायद ही किसी को शक होगा कि शेर और बिल्ली में से इन्हें किसने खाया होगा?

जाहिर है शेर जैसे आकार वाले चोर राजीव ने। राजीव की मुस्कराती तस्वीर वाले होर्डिंग को देखकर वह कहते-पात नहीं वह किस पर हंस रहे हैं, अपनी चाल पर, हमारे हाल पर या स्विट्जरलैंड के माल पर। सिंह कहा करते कि वे नहर या ट्यूबवेल बनवाने का वादा नहीं करते लेकिन उस छेद को जरूर बंद करेंगे जहां से जनता का पैसा बाहर जा रहा है।

सिंह की बुद्धिमता पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन वह इसलिए भी कारगर रहे क्योंकि उन्होंने मामले को मजबूती से सामने रखा। कांग्रेस के सामने भी बोफोर्स एक ऐसा मुद्दा बन गया था जिसे न उगलना संभव था, न निगलना। आज विपक्ष के पास वीपी सिंह जैसा नेता नहीं है। क्या राफेल मामला बोफोर्स जैसा मजबूत है? 

बोफोर्स और राफेल मामले में एक बड़ा अंतर है। बोफोर्स के उलट राफेल मामले में सभी इस बात पर सहमत हैं कि यह सबसे बेहतर और खरीदने योग्य लड़ाकू विमान है। इस विमान का चयन कांग्रेस ने ही किया था। आरोप यह है कि मोदी सरकार 126 के स्थान पर केवल 36 विमान क्यों खरीद रही है। वीपी सिंह कह देते थे कि जब जवानों ने पहली बोफोर्स तोप चलाई तो यह पीछे की ओर दग गई और हमारे कई जवान घायल हो गए। यह बात राफेल के बारे में नहीं कही जा सकती।

दूसरा अंतर, जैसा कि टी एन नाइनन ने भी अपने स्तंभ में लिखा था कि बोफोर्स जैसा मामला अभी तक नहीं है। ओलांद का बयान स्वीडन के राष्ट्रीय अंकेक्षण ब्यूरो के निष्कर्ष जैसा भरोसेमंद नहीं है जिसने कहा था कि स्विट्जरलैंड में तीन संदिग्ध खातों को भुगतान किया गया जो भारत से संबंधित थे।

राफेल सौदे में इकलौता ठोस यह है कि ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट एक ऐसी निजी कंपनी को क्यों दिया गया जिसका रक्षा क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं? लेकिन क्या यह वजह मोदी के मतदाताओं को उनके खिलाफ करने में सक्षम है? राफेल अभियान की यही सीमा है।

वीपी सिंह के पास एक जबरदस्त नारा था: वीपी सिंह का एक सवाल, पैसा खाया कौन दलाल? यह नारा सफल रहा क्योंकि लोगों को लगा कि पैसा खाया गया है। राफेल मामले में ऐसा नहीं है। आखिरी शिकायत मीडिया से है। राजीव गांधी पहले ताकतवर प्रधानमंत्री थे जिसके पतन में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी। इन दिनों यह कहना आसान है कि पत्रकार समझौते कर रहे हैं या मोदी से भयभीत हैं। तो क्या उम्मीद की जाए?

परंतु हमें यह भी मानना होगा कि आज के मीडिया के पास बोफोर्स जैसी कहानी नहीं है। दूसरी बात मोदी का ग्राफ भले ही गिर रहा हो लेकिन वह उतने अलोकप्रिय नहीं हैं जितने राजीव गांधी सन 1988 में हो गए थे। तीसरी बात, भाजपा में कोई बागी नहीं है। यशवंत सिन्हा, कीर्ति आजाद या शत्रुघ्न सिन्हा, वीपी सिंह नहीं हैं। आखिरी बात, पत्रकार भी बोफोर्स के बाद से थोड़े अनुशासित हैं क्योंकि तीन दशक बाद भी उस मामले में कोई दोषी नहीं नजर आया। अब रक्षा सौदों पर शंका करने के मानक ऊंचे हो चुके हैं।

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