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अटकी परियोजनाओं के चलते निजी निवेश में तेज गिरावट

मेघा मनचंदा / नई दिल्ली October 05, 2018

भारी संख्या में बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं के अटकने से निवेशकों की रुचि और इस क्षेत्र में उनके जोखिम लेने की क्षमता में कमी आई है। नतीजतन एक दशक के दौरान निजी निवेश में तेज गिरावट दर्ज की गई है। ये बातें रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट से सामने आई हैं। क्रिसिल इन्फ्रास्ट्रक्चर ईयरबुक 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2008 से 2017 के बीच बुनियादी क्षेत्र में निजी निवेश अनुमानित तौर 20 लाख करोड़ रुपये था या इस दौरान बुनियादी क्षेत्र में कुल खर्च का यह तकरीबन एक तिहाई हुआ करता था। इसका विभिन्न क्षेत्र पर एक परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा था। 2012 तक भारत के सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) कार्यक्रम ने भी एक उल्लेखनीय प्रगति हासिल की।    
 
क्रिसिल के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी आशु सुयाश ने कहा, 'मध्यम से लबी अवधि में निजी निवेश की शुरुआत और बड़े पैमाने पर आधारभूत स्तर पर इसका उपयोग बुनियादी ढांचे में निवेश की हिस्सेदारी को जीडीपी के 6 फीसदी पर बनाए रखने के लिए जरूरी हो चुका है। इसके लिए नए पीपीपी फ्रेमवर्क बनाने, फंसी परिसंपत्तियों के त्वरित समाधान और वित्तीय स्रोतों को मजबूत करने के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत है।' हालांकि, तब से कई प्रकार के जोखिम सामने आए हैं जिसने पीपीपी मॉडल की कमियों को उजागर किया है और अटकी परियोजनाओं तथा संकटग्रस्त परिसंपत्तियों की संख्या में इजाफा हुआ है जिसने निजी क्षेत्र में जोखिम उठाने की क्षमता को कम किया। 
 
रिपोर्ट में कहा गया है, 'रेलवे और शहरी बुनियादी ढांचा जैसे संकटग्रस्त क्षेत्र अपने आकार और क्षमता के मुताबिक तेजी से निजी नेवश आकर्षित करने में नाकाम रहे जबकि क्षेत्र की मूल्य शृंखला के लिए बिजली वितरण की व्यावहारिकता नाजुक बनी हुई है।'    बुनियादी क्षेत्र में खर्च 2008-2012 के दौरान रहे जीडीपी के 7 फीसदी से फिसलकर 2013-17 के दौरान 5.8 फीसदी के करीब रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि निजी निवेश को तेजी से नहीं बढ़ाया गया तो इसमें और कमी आ सकती है। 
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