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उत्तर प्रदेश पुलिस को छूट का मतलब हत्या की छूट नहीं

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 05, 2018

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शानदार प्रदर्शन के बाद जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली तो राज्य में ढांचागत विकास या निवेशकों को आकर्षित करने के लिए समुचित इंतजाम करने के बजाय उनकी पहली घोषणा किसानों का कर्ज माफ करने की थी। इसी के साथ उन्होंने कानून-व्यवस्था की बहाली को भी अपना लक्ष्य बताया था। उन्होंने अपना पहला मकसद संभवत: हासिल कर लिया है। लेकिन उनके अपने ही मंत्रियों का कहना है कि कानून व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन शर्मनाक है। हाल ही में लखनऊ में हुई ऐपल प्रबंधक विवेक तिवारी की हत्या इसकी तस्दीक करती है। विवेक को पुलिस के दो कॉन्स्टेबलों ने ही कथित तौर पर गोली मारी है। यह वाकया किसी को भी बेचैन करने के लिए काफी है। कॉन्स्टेबलों ने विवेक से कार रोकने के लिए कहा था लेकिन जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन पर गोली चला दी। (यह तड़के तीन बजे का वाकया है और हमें अब तक नहीं पता है कि असल में क्या हुआ था?) यह घटना राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर की है, दूरदराज के किसी पिछड़े इलाके की नहीं। जो भी हो, कॉन्स्टेबल कब से पिस्तौल लेकर चलने लगे हैं?  

 
पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर भले ही भाजपा के गठबंधन सहयोगी हैं लेकिन उनके इस बयान को अहमियत देने की जरूरत है कि सरकार ऐसी पुलिस को बचा रही है जो लोगों से नियमित रूप से पैसे वसूलती है और उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की हालत हास्यास्पद हो चुकी है। राजभर ने कहा है, 'योगी जी न तो राज्य में अपराध कम करने में कामयाब हुए हैं और न ही वह लोगों को सुरक्षा का अहसास ही करा पाए हैं।' मुख्यमंत्री ने आरोपी कॉन्स्टेबलों को बर्खास्त करने का आदेश तो दिया है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसकी वजह यह बताई गई है कि 'यह कोई एनकाउंटर (मुठभेड़) नहीं था'। इस बयान से लगता है कि राह चलते और काम पर निकले लोगों की एनकाउंटर में हत्या करना सही है।
 
यह इस तरह की पहली घटना नहीं है। पुलिस एनकाउंटर में अभी तक 18 लोग मारे जा चुके हैं। सितंबर में हुए एक एनकाउंटर का चश्मदीद बनने के लिए पुलिस ने मीडियाकर्मियों को भी न्योता दिया था। अलीगढ़ के हरदुआगंज में हुए इस 'लाइव' एनकाउंटर में पुलिस ने मुश्तकीम और नौशाद नाम के दो युवकों को मार गिराया था। भाजपा यह शेखी बघारती है कि एनकाउंटर में मारे जाने के खौफ से अपराधी खुद ही पुलिस थाने आकर अपना जुर्म कबूल कर रहे हैं। ऐसे में विधि का शासन, साक्ष्यों की प्रस्तुति, अभियोजन, अपील और उन दूसरे व्यवस्थागत साधनों का क्या हुआ जिनके बूते भारत को सही अर्थों में एक लोकतांत्रिक और कानून से संचालित देश माना जाता है?
 
विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ ने भी उत्तर प्रदेश को अनुशासन में रखने के लिए अपने पूर्ववर्तियों के ही तौर-तरीके अपनाए हैं। उत्तर प्रदेश में अपराधियों और शासन का गठजोड़ सभी भारतीय राज्यों में संभवत: सबसे बुरी हालत में है। इस समस्या की जड़ें इतिहास में हैं। लिहाजा जब भी किसी मुख्यमंत्री ने पुलिस के हाथ मजबूत कर यह गठजोड़ तोडऩे की कोशिश की है तो पुलिस ने उसका मतलब निशाना साधने, गोली चलाने और जान लेने के असीमित विवेकाधिकार के तौर पर ही निकाला। 
 
वर्ष 1982 में वी पी सिंह डकैतों पर नकेल कसने के लिए अभियान छेड़े हुए थे लेकिन इस दौरान उनके ही भाई की हत्या हो गई तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। नागरिक समाज उस समय भी शर्मसार हो गया था जब उत्तर प्रदेश की सशस्त्र पुलिस शाखा पीएसी ने हाशिमपुरा, मेरठ और मलियाना के मुस्लिम-बहुल इलाकों में घुसकर मुस्लिम युवकों को हिरासत में लिया और गंग नहर के पास बेहद करीब से गोली मारकर उनके शवों को नहर में फेंक दिया था। पीएसी ने इन मुस्लिम युवकों को महज इस आधार पर हिरासत में लिया था कि उनके पास चाकू  एवं कैंची पाई गई थीं। (कैंची एवं चाकू मुस्लिमों के परंपरागत पेशों का हिस्सा रहे हैं।)
 
अतीत में भी उत्तर प्रदेश पुलिस विरोधियों के कहने पर अपराधी गिरोहों के सरगनाओं को मारने का काम करती रही है। इसी तरह पुलिस कुछ खास गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई से भी परहेज करती है। खास बात यह है कि दोनों स्थितियों में पुलिस संभवत: नेताओं की शह पर ही ऐसा करती है।  मुद्दा यह है कि इस सिलसिले पर रोक किस तरह लगाई जा सकती है? उत्तर प्रदेश को एक सिरे से दूसरे सिरे पर छलांग लगानी ही होगी। पुलिस को एक हत्यारी मशीन बनाने के बजाय कानून का पालन कराने वाले बल के रूप में तब्दील करने के लिए अपनी नींद  से जगना होगा।
 
यहां पर एक बात गौर करने लायक है। समूचे घटनाक्रम को देख रहे आम लोग उस समय प्रतिक्रिया देंगे जब उन्हें यह अहसास होगा कि राजनीतिक नेतृत्व कुछ लोगों के लाभ के लिए ही दखल देता है, दूसरों के लिए नहीं। जून में भाजपा को कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के लिए हुए चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। इसकी वजह विपक्षी दलों के एक साथ आने के अलावा यह भी थी कि उन्होंने योगीराज में पुलिस को मिली खुली छूट की समीक्षा करने का भी वादा किया था। भाजपा इससे पहले गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्रों में भी उपचुनाव हार चुकी है। योगी आदित्यनाथ को अपने मंत्रियों की सलाह पर ध्यान देना चाहिए। फैसला लेने वाला मुख्यमंत्री होना एक बात है लेकिन उसका संतुलित एवं समझदार होना भी महत्त्वपूर्ण है।
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