बिजनेस स्टैंडर्ड - विदेशी पूंजी जुटाना बने प्राथमिकता
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विदेशी पूंजी जुटाना बने प्राथमिकता

नीलकंठ मिश्रा /  October 05, 2018

जीडीपी की हिस्सेदारी के रूप में देखें तो विदेशी पूंजी की आवक वर्ष 2002 के स्तर पर है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि विदेशी पूंजी की आवक बढ़ाने को प्राथमिकता दें। विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
जिस प्रकार किसी कंपनी को तेज गति से विकास करने के लिए अपनी बचत के अलावा बाहरी पूंजी की आवश्यकता होती है, भारत के लिए वही अहमियत विदेशी पूंजी की आवक की है। बहरहाल, इस वर्ष भारत आने वाली विदेशी पूंजी की मात्रा एक दशक पहले की तुलना में बमुश्किल आधी रहने की उम्मीद है। जीडीपी के शेयर के रूप में पूंजी की आवक 2002 के स्तर पर है। इस गिरावट पर उतनी तवज्जो नहीं दी जाती है जितनी अहमियत व्यापार और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी को दी जाती है। आय की तुलना में खपत में कितना इजाफा हो सकता यह बात इससे निर्धारित होती है कि बाहरी पूंजी की उपलब्धता कितनी ज्यादा है। इस लिहाज से देखें तो हमारा देश चालू खाते के घाटे को उसी हद तक बरदाश्त कर सकता है जिस हद तक वह विदेशी पूंजी को आकर्षित कर सकता है। 
 
ऐसे में यकीनन बाहरी पूंजी की उपलब्धता हमारी निरंतर आवश्यकता है। सन 1991 के बाद से अब तक देश में 9 लाख करोड़ डॉलर की विदेशी पूंजी आई है, यानी करीब 3,000 करोड़ डॉलर वार्षिक। विदेशी शेयर धारकों को रॉयल्टी और लाभांश तथा विदेशी ऋणदाताओं को ब्याज चुकाना होता है। परंतु जब तक पूंजी का इस्तेमाल उत्पादक काम में हो रहा है, यानी यह देश की वृद्घि दर बढ़ाने में योगदान कर रहा है तब तक यह प्रबंधनीय है। जीडीपी के हिस्से के रूप में यह अब कई वर्षों से एक से 1.2 फीसदी के बीच स्थिर है। बाहरी पूंजी की कमी का अर्थ होगा धीमी आर्थिक वृद्घि।
 
पूंजी की आवक में यह धीमापन कैसे आया? नयेपन के पूर्वग्रह से ग्रस्त अधिकांश पर्यवेक्षक पूरा दोष विकसित बाजारों में क्वांटिटेटिव ईजिंग (क्यूई) और शून्य ब्याज दर नीति (जेडआईआरपी) पर देते हैं, खासतौर पर अमेरिका में। अतीत के वर्षों में आई तेजी और धीमेपन में इसकी भूमिका हो सकती है लेकिन हमने ध्यान दिया कि क्यूई और जेडआईआरपी की शुरुआत के पहले देश में पूंजीगत आवक बहुत अधिक थी। यह प्रवृत्ति केवल भारत में नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसी अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में पूंजीगत आवक में मंदी आई जो उस पर निर्भर हैं। इससे संकेत मिलता है कि यहां चक्रीय कारक लागू हो सकता है। 
 
सच तो यह है कि बेहतर से बेहतर दिनों में भी देश के जीडीपी में पूंजीगत आवक की हिस्सेदारी शेष विश्व से कम थी। यह बात भी ढांचागत समस्या की ओर इशारा करती है। विदेशी पूंजी की आवक कई तरह से होती है लेकिन आसान विश्लेषण के लिए इसे पांच श्रेणियों में बांटा जा सकता है: शेयर में पोर्टफोलियो आवक (एफपीआई-इक्विटी), डेट में पोर्टफोलियो आवक (एफपीआई-डेट), प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), विदेशी ऋण और पांचवीं श्रेणी अन्य, जिसमें शेष सभी श्रेणियां शामिल हैं। विदेशी पोर्टफोलियो आवक को लेकर मीडिया का ध्यान देखकर लग सकता है कि पूंजीगत आवक में ज्यादातर कमी वहीं आई है। परंतु सचाई यह है कि बीते एक दशक में जिस विदेशी पूंजी में सबसे अधिक गिरावट आई है वह है विदेशी ऋण। वर्ष 2007 में विदेशी ऋण की शुद्घ आवक 4,000 करोड़ डॉलर थी लेकिन तब से अब तक यह घटकर 1,000 करोड़ डॉलर रह गई। इस गिरावट की वजह ज्यादातर बेहतर ही रही है: वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान वे मौद्रिक अस्थिरता में अपने हाथ जला चुके थे। ऐसे में बिना बचाव वाले मौद्रिक जोखिम से उन्होंने दूरी बरती, रिजर्व बैंक ने भी हेजिंग पर जोर दिया। इसी प्रकार वर्ष 2013 में कारोबार के लिए अल्पावधि के ऋण को भी मुद्रा की भारी अस्थिरता ने प्रभावित किया था। हमें अत्यधिक विदेशी ऋण की समस्या से निपटने के लिए तुर्की की समस्या को ध्यान में रखना होगा। 
 
विदेशी पोर्टफोलियो आवक में भी कमी आई है। इसका कुछ हिस्सा चक्रीय है लेकिन मौजूदा बहिर्गमन काफी हद तक सोचा समझा लगता है।  भारत का किसी बॉन्ड बाजार सूचकांक में न होना देश में बॉन्ड निवेश को जोखिम भरा बनाता है। वहीं मुद्रा को लेकर चिंता और बीते नौ महीने के दौरान बॉन्ड प्रतिफल में अस्थिरता ने पूंजी के बहिर्गमन को गति दी है।  एफपीआई इक्विटी में हालिया बिक्री के बावजूद भारत की स्थिति अधिकांश एशियाई और विकासशील देशों की तुलना में बेहतर बनी हुई है। बीते तीन वर्ष की अवधि में शुद्घ आवक बाजार पूंजीकरण के एक प्रतिशत से कम रही है लेकिन वह अन्य देशों के मुकाबले बेहतर है। 
 
एफडीआई अतीत से ज्यादा है और इस समय देश की पूंजीगत आवक में सबसे बड़ा हिस्सा इसी का है। इस वर्ष देश में आई विदेशी पूंजी का आधा से अधिक हिस्सा इसी का है। अब इसमें भी ठहराव आ रहा है और यह करीब 3,500 करोड़ डॉलर वार्षिक की दर पर स्थिर है। परंतु जीडीपी प्रतिशत के मामले में यह अन्य समतुल्य राष्ट्रों से पीछे है। अन्य श्रेणी में अनिवासी भारतीयों के जमा, बैंकिंग पूंजी और विभिन्न प्रकार के ऋण शामिल हैं। यह आमतौर पर स्थिर रहा है। पूंजीगत आवक का विश्लेषण करने के साथ ही यह भी विचार करना उचित होगा कि यह पूंजी किन देशों से आती है। जिन देशों में चालू खाते का घाटा अधिशेष की स्थिति में है, उनके पास विदेशों में लगाने के लिए पूंजी भी अधिक है। परंतु समानता यहां समाप्त हो जाती है।
 
हर देश का अपनी पूंजी के निवेश करने का तरीका अलग होता है और समय के साथ यह बदलता रहता है। उदाहरण के लिए एक दशक पहले तेल से जुड़े अप्रत्याशित लाभ के बाद पश्चिम एशिया के तेल निर्यातक देशों ने सॉवरिन वेल्थ फंड्स की स्थापना की। ये फंड प्राय: अन्य बाजारों में पोर्टफोलियो निवेश का मार्ग अपनाते हैं। वर्ष 2012-13 में जब देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही थी और ढांचागत चिंताएं जताई जा रही थीं, तब एफपीआई-इक्विटी आवक करीब 2,000 करोड़ डॉलर वार्षिक थी। अधिशेष वाले यूरोपीय देश अपनी पूंजी का निर्यात बैंकों के जरिए करते हैं। जापान और चीन जैसे देश नीतिगत रास्ते अपनाते हैं।
 
आशंका के मुताबिक भुगतान संतुलन घाटे को पाटने के लिए खपत और वृद्घि में कमी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अगर चक्रीय कारक बदलते हैं तो पूंजी की मौजूदा कमी दूर हो सकती है। बहरहाल, ढांचागत समस्याएं बरकरार रहेगी और नीति निर्माताओं को सक्रियतापूर्वक इनकी पहचान करनी होगी। व्यापारिक युद्घ के कारण नई चिंताएं सर उठा चुकी हैं। इसका असर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर पडऩा तय है। ऐसे में हमारा मानना है कि विदेशी पूंजी को आकर्षित करना प्राथमिकता में होना चाहिए। 
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के इंडिया स्ट्रेटेजिस्ट हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: GDP, fiscal deficit, dollar, bond, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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