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नतीजा तय करेंगे मोदी और भाजपा को मिले सबक

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 04, 2018

सरकार के लिए पिछले कुछ दिन अच्छे नहीं रहे हैं। उसे राफेल विमान सौदे और आधार को लेकर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। इन दोनों मामलों ने मोदी सरकार को उसी तरह की क्षति पहुंचाई है जैसा सड़कों पर जारी अनवरत हिंसा ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को नुकसान पहुंचाया है। इस तरह तमाम वाहवाही के बावजूद सरकार और पार्टी दोनों ही रक्षात्मक मुद्रा में आ चुके हैं। सरकार की छवि और नीति पर लगे दोनों आघात को 2019 में होने वाले आम चुनावों के संदर्भ में देखना चाहिए। अचानक ही कई चीजें गलत होने लगी हैं। इसकी वजह यह है कि ईमानदारी को लेकर सरकार की विश्वसनीयता रूपी बेहद कीमती चीज पर ही तगड़ी चोट पहुंची है।

 
विपक्ष यह उम्मीद कर रहा है कि राफेल सौदे पर उठा विवाद भाजपा के लिए उसी तरह नुकसानदायक होगा जैसा बोफोर्स मामले ने 1989 में कांग्रेस को झटका दिया था। इसकी एक वजह यह है कि भाजपा के कट्टïर समर्थक भी यह मानते हैं कि अगले चुनाव में 2014 के नतीजों को दोहरा पाना संभव नहीं है।  ऐसे में चर्चा इस बात को लेकर होने लगी है कि भाजपा को 2019 में बहुमत के लिए जरूरी 272 से कितनी कम सीटें मिलेंगी। सबसे बुरी स्थिति में भाजपा को करीब 130 सीटों के नुकसान होने का आकलन है। वहीं सबसे अच्छी हालत में भी भाजपा के बहुमत से 50-60 सीटें कम रहने का ही अनुमान जताया जा रहा है। वैसे मंदिर निर्माण का मसला इसे पूरे परिदृश्य को बदलकर रख देगा। अब अगर कांग्रेस 140-150 से अधिक सीटें नहीं जीत पाती है तो फिर भाजपा अपने बदतर प्रदर्शन की हालत में भी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। ऐसा होने पर राष्ट्रपति की तरफ से सरकार बनाने का न्योता भाजपा को ही मिलेगा।
 
ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि भाजपा और संघ परिवार ने शासन चलाने के बारे में क्या सबक सीखे हैं? क्या बड़े गठबंधन से जुड़ी मजबूरियां उसे असाधारण गलतियां करने से रोक पाएंगी? बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा 272 के जादुई आंकड़े से कितनी दूर रहती है? इस आंकड़े से उसकी दूरी जितनी अधिक होगी, उसे उतने ही अधिक सबक सीखने पड़ेगे। इस संदर्भ में परिवार के तीन घटक महत्त्वपूर्ण हैं: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), भाजपा और प्रधानमंत्री। अगर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हाल में दिए गए भाषणों से कुछ संकेत मिलते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि संघ ने भारत का शासन चलाने से जुड़े कुछ अहम सबक संभवत: सीख लिए हैं। भागवत ने कहा है कि आरएसएस कुछ वैसा ही करना चाहता है जैसा ब्रिटेन में टोनी ब्लेयर ने लेबर पार्टी के संदर्भ में किया था। इसका मतलब है कि संघ अपनी विचारधारा की कुछ बुनियादी अवधारणाओं पर नए सिरे से गौर करने को तैयार है। ब्लेयर ने 1995 में लेबर पार्टी के चार्टर में उल्लिखित 'समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता' को तिलांजलि दे दी थी और उसके बाद मतदाताओं ने उसे आसानी से स्वीकार कर लिया। लेकिन भाजपा और प्रधानमंत्री के बारे में क्या हम यही बात कह सकते हैं? आज तो इस पर भी सवाल उठने लगे हैं कि प्रधानमंत्री के पद पर क्या मोदी ही बने रहेंगे? हालांकि यही मानना चाहिए कि मोदी प्रधानमंत्री बने रहेंगे क्योंकि उनके बगैर तो भाजपा लोकसभा चुनाव में और भी अधिक सीटें गंवा सकती है। ऐसे में हम प्रधानमंत्री मोदी को मिले सबक के बारे में क्या अनुमान लगा सकते हैं? 
 
दो अहम बातें मोदी की शैली की पहचान रही हैं: सेवाओं के निष्पादन पर जोर और अपने कार्यालय पीएमओ से शासन चलाने की लालसा। दरअसल मोदी का मानना है कि सरकारी सेवाओं के बेहतर निष्पादन से ही वोट जुटाए जा सकते हैं। जहां तक पीएमओ से शासन चलाने का सवाल है तो इस तरह आप पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित कर सकते हैं। इस तरह मोदी एक प्रधानमंत्री से अधिक मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) रहे हैं जिसका पहला कर्तव्य जनता को आश्वस्त करना होता है कि सरकार उनकी प्रबल विरोधी नहीं है। यहां पर वह अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना में इंदिरा गांधी की तरह अधिक लगे हैं। लिहाजा हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि वह इंदिरा की छवि से मुक्त होकर वाजपेयी को आत्मसात करेंगे।
 
जहां तक भाजपा का सवाल है तो इसने एक ऐसी पार्टी की छवि बना ली है जो राजनीतिक एवं प्रशासनिक ताकत हासिल करने और उसके इस्तेमाल में तमाम नैतिक आग्रहों से मुक्त है। दोनों ही मामलों  में भाजपा के तौर-तरीके एवं उसकी निष्ठुरता ने आम जनमानस को आक्रांत कर दिया है।  ऐसी हालत में भाजपा को सबसे बड़ा सबक यह सीखने की जरूरत है कि डराना-धमकाना बुरी राजनीति की निशानी है। आपको लग सकता है कि पार्टी के भीतर अधिक अनुशासन की अपेक्षा करना धौंसबाजी नहीं है। लेकिन दूसरे भी तो यही उम्मीद करते हैं।
 
इन सबसे इतर, संसद और मंत्रालयों के द्वारा गठित दूसरे एवं तीसरे स्तर के संस्थान भले ही डांवाडोल हैं लेकिन संवैधानिक संस्थान पहले की ही तरह सुदृढ़ हैं। इन संस्थानों ने दादागीरी पर अंकुश लगाया हुआ है। धौंसबाजी भाजपा में एक नए घटनाक्रम के तौर पर सामने आई है। पहले पार्टी नेतृत्व का झुकाव निरंकुशता की तरफ नहीं रहता था। एक सशक्त उदारवादी सुर बना रहता था लेकिन अब उसकी जगह कठोरता एवं अविश्वास के 'इंदिरा वायरस' ने ले ली है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भाजपा को अब लोगों से कुछ वैसे ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है जैसा 1977 में इंदिरा को करना पड़ा था। भाजपा के लिए यह बुरी खबर है क्योंकि 2014 में अपने दम पर बहुमत मिलने की हालत में भी उसे महज 31 फीसदी वोट ही मिले थे। ऐसे में विपक्ष को बस यह करने की जरूरत है कि हिंदी-भाषी राज्यों में आधी सीटों पर वह भाजपा के खिलाफ केवल एक उम्मीदवार ही उतारे।
Keyword: Rafale, defense, BJP, nirmala sitaraman, congress,,
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