बिजनेस स्टैंडर्ड - मेक इन इंडिया के लिए सरकारी खरीद
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मेक इन इंडिया के लिए सरकारी खरीद

अजय शंकर /  October 04, 2018

सरकारी खरीद की मदद से घरेलू उद्योगों की सहायता में एक छोटा प्रयास गत वर्ष किया गया था जब सरकार ने खरीद में घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता देने का निर्णय किया था। बता रहे हैं अजय शंकर

 
बाजार के कई क्षेत्रों में सरकार और सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली खरीद अहम हिस्सेदारी रखती है। सरकारी खरीद की स्थापित व्यवस्था ऐसी है कि उचित और प्रतिस्पर्धी बोली लग सके। पारदर्शिता बढ़ाने के लिए इनकी समय-समय पर समीक्षा की जाती है। इन बातों के बीच एक चीज जो सार्वजनिक चर्चा से गायब है वह यह कि मेक इन इंडिया को सफल बनाने के लिए सरकारी खरीद का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए। यह एक शक्तिशाली उपाय है जिसका इस्तेमाल प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि हमारे देश में सरकारी खरीद को किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता की निगरानी से परे रखा गया है।
 
सरकारी खरीद की मदद से घरेलू उद्योग जगत को सहायता पहुंचाने की प्रक्रिया की एक शुरुआत गत वर्ष उस समय हुई जब सरकार ने घरेलू आपूर्तिकर्ताओं के लिए सरकारी खरीद को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि काफी समय से उद्योग जगत में मंदी का माहौल था और वहां से ऐसी मांग उठ रही थी। इस रुख को आगे और बढ़ावा दिया जा सकता है और इसका इस्तेमाल उन प्रमुख क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता के विस्तार में किया जा सकता है, जहां सरकारी एजेंसियों का बाजार बड़ा है। मूल्यवर्धन की अनिवार्यता या केवल स्थानीय वस्तुओं के इस्तेमाल का व्यवहार तो दुनिया भर में चला आ रहा है।
 
इसकी शुरुआत सौर पैनलों से की जा सकती है। इस दशक में देश भर में 20,000 मेगावॉट से अधिक की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित की गई है। 2010 में यह बमुश्किल 200 मेगावॉट थी। व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह सारा कुछ आयातित है। अब सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य 100,000 मेगावॉट करने का लक्ष्य तय किया गया है। अगर सबकुछ पहले की तरह चला तो इन सारी चीजों को आयात करना होगा। सरकार की ओर से संरक्षण शुल्क लगाने की बात भी जब तब सुनाई देती है। सौर ऊर्जा उत्पादकों की ओर से भी काफी विरोध हो रहा है क्योंकि उन्होंने शुल्क मुक्त आयात के चलते बहुत कम दरों पर बोली लगाई है। अगर अब शुल्क लगा दिया गया वे अपने दायित्व नहीं निभा पाएंगे। 
 
जब राष्ट्रीय सौर मिशन की शुरुआत की गई थी तब सौर ऊर्जा खरीद प्रक्रिया में कुछ घरेलू वस्तुओं को जरूरी किया गया था। अमेरिका ने इसे डब्ल्यूटीओ में चुनौती दी और सफल रहा। उसका कहना था कि सौर ऊर्जा का उत्पादन आम उपभोक्ताओं के इस्तेमाल के लिए होता है और यह सरकारी खरीद नहीं थी क्योंकि उस मामले में सरकार स्वयं खरीद करती है। परंतु सरकार और उसकी एजेंसियां अभी भी सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए बोली लगाने के लिए स्वतंत्र हैं बशर्ते कि वे पूरी तरह भारत में बने हों। इससे डब्ल्यूटीओ की किसी प्रतिबद्धता का उल्लंघन नहीं होगा। हालांकि देश में निर्मित सौर पैनलों की आपूर्ति के लिए सामान्य बोली प्रक्रिया में कोई बोली नहीं लगेगी क्योंकि देश में इनके निर्माण के संयंत्र नहीं हैं। परंतु अगर बोली व्यापक क्षमता की हुई और आपूर्ति के कई वर्ष तक जारी रहने की संभावना हुई तो देश में विनिर्माण के क्षेत्र में निवेश किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में बोलीकर्ता भी सामने आएंगे। अगर एक वैश्विक स्तर के प्रतिस्पर्धी सौर पैनल निर्माण संयंत्र में न्यूनतम 1,000 मेगावॉट की वार्षिक क्षमता चाहिए और लगातार तीन वर्ष तक इतनी क्षमता के लिए बोली आमंत्रित की जाती है तो भारतीय और विदेशी निवेशक दोनों देश में संयंत्र लगाना और आपूर्ति के लिए बोली लगाना चाहेंगे।
 
अगर सफल बोलीकर्ताओं को संयंत्र स्थापित करने के लिए चिह्नित भूमि और जरूरी बुनियादी ढांचा उचित दर पर देने का वादा किया जाए तो बोली और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगी। अगर पूंजीगत वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात की सुविधा दी जाए तो कीमत और प्रतिस्पर्धी हो जाएगी। चूंकि ऊर्जा की लागत में बड़ा हिस्सा कच्चे माल के रूप में प्रयोग होने वाले इंगट (पिंड)की विनिर्माण लागत का होता है इसलिए अगर एनटीपीसी से सीधे औसत लागत पर बिजली उपलब्धता की बात तय हो सके तो कीमतें और भी कम हो सकती हैं। एक विकल्प यह भी है कि विनिर्माण पार्क को गैस पाइपलाइन के पास स्थापित किया जाए और संयंत्र में बिजली बनाने के लिए तयशुदा उचित दर पर गैस दी जाए। इसका लक्ष्य यह होना चाहिए कि सौर पैनलों के लिए ऐसा मूल्य हासिल हो सके जो आयातित मूल्य के समतुल्य हो। परंतु आयात से ऊंची कीमत चुकाने के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
 
आयातित और घरेलू स्तर पर निर्मित पैनलों की कीमत में समता लाने के लिए कुछ वर्ष तक आयात शुल्क लगाना पड़ सकता है। एक प्रतिस्पर्धी उद्योग ढांचा बनाने के लिए न्यूनतम से ऊपर वाले बोलीकर्ताओं को यह विकल्प दिया जा सकता है कि वे न्यूनतम बोली लगाने वाले की बराबरी कर सकें और तीन वर्ष की आपूर्ति का ऑर्डर पा सकें। न्यूनतम बोली लगाने वाले को दूसरों पर थोड़ी बढ़त देने के लिए उसके ऑर्डर का आकार बढ़ाया जा सकता है। अगर अन्य बोलीकर्ताओं को 1,000 मेगावॉट वार्षिक का ऑर्डर जारी किया गया है तो उसके लिए यह 1,500 मेगावॉट किया जा सकता है। अगर प्रतिस्पर्धी घरेलू औद्योगिक ढांचे की ओर से बार-बार पर्याप्त आकार की बोली लगती है तो लागत और मूल्य में तेजी से कमी आएगी। ईईएसएल (एनर्जी) ने कुछ ही वर्षों में एलईडी की कीमतों को कम करने की दिशा में जादुई काम किया है। ऐसा भारी खरीद के कारण ही संभव हो सका है। केंद्र सरकार इलेक्ट्रिक कारों की कीमत भी इतनी कम कर पाने में सफल रही है कि वह उन्हें उन्हीं शर्तों के अधीन इस्तेमाल कर पा रही है जिनके अधीन सामान्य कारें। यह काम बिना किसी सब्सिडी के हो रहा है। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है कि देश में अब इलेक्ट्रिक कारें टैक्सी के रूप में भी चल सकती हैं।
 
अब 100,000 मेगावॉट सौर ऊर्जा के लक्ष्य के साथ यह उचित होगा कि सौर ऊर्जा उपकरण निर्माण की घरेलू क्षमता विकसित की जाए। अगर उपरोक्त तरीके से खरीद की जाए तो हम देश में एक वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाला सौर ऊर्जा उपकरण निर्माण उद्योग स्थापित कर सकते हैं। चीन ने अपने घरेलू बाजार का इस्तेमाल करके विनिर्माण में अप्रत्याशित सफलता हासिल की है और अब उसे दुनिया की फैक्टरी के नाम से जाना जाता है। भारत भी ऐसा कर सकता है। 
 
(लेखक भारत सरकार के औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग के पूर्व सचिव हैं।)
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