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देर से ही सही...

संपादकीय /  October 04, 2018

आईसीआईसीआई बैंक के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) पद से चंदा कोछड़ की समयपूर्व सेवानिवृत्ति की खबर आते ही बैंक के शेयरों में 4 फीसदी की तेजी आना यह बताता है कि शेयरधारक इस बारे में क्या सोचते हैं। बैंक के बोर्ड ने इसे सहज स्वीकार किया और चंदा के उत्तराधिकारी के रूप में संदीप बख्शी का नाम घोषित कर दिया। इसके साथ ही देश के सबसे बड़े निजी बैंक में छह महीने से चले आ रहे विवाद पर भी विराम लग गया। चंदा को बहुत पहले पद छोड़ देना चाहिए था।  उन्होंने या बैंक बोर्ड ने एक वर्ष से भी अधिक पहले एक व्हिसल ब्लोअर द्वारा उठाए गए हितों के टकराव के सवाल का समुचित या पारदर्शी जवाब नहीं दिया था। आरोप यह था कि आईसीआईसीआई की सहभागिता वाले बैंकों के एक समूह ने वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज को ऋण दिया जबकि इस समूह का कारोबारी रिश्ता चंदा के पति के साथ था। व्हिसल ब्लोअर का आरोप था कि चंदा को खुद को उक्त ऋण समिति से अलग कर लेना चाहिए था। चंदा ने इस बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया, न ही उन्होंने हितों के टकराव वाली बात किसी से साझा की।

 
आरंभ में बोर्ड ने एक अस्पष्ट सा वक्तव्य जारी किया कि वह उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट है। तत्कालीन चेयरमैन ने मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया था। इस अस्पष्ट रुख से अनिश्चितता बढ़ी और नए आरोप सामने आए। आखिरकार बोर्ड ने न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण के नेतृत्व में स्वतंत्र जांच शुरू की। जून में चंदा छुट्टी पर चली गईं और माह के अंत में आने वाली जांच रिपोर्ट लंबित रही। इससे आशंकाओं को और बल मिला। चंदा की विदाई को सम्मानजनक निकासी के रूप में प्रस्तुत किया गया। चूंकि उनसे पद छोडऩे की मांग उठने के कई माह बाद यह कदम उठाया गया है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि इसमें देरी तो हुई है। चंदा की संलिप्तता या उनके निर्दोष होने के बारे में कोई भी टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी। बोर्ड ने संकेत दिया है कि उनके सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभ न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति के निष्कर्ष पर निर्भर करेंगे।
 
परंतु येस बैंक और इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस कॉर्पोरेशन (आईएलऐंडएफएस) के संचालन से जुड़े विवादों के साथ मिलाकर देखा जाए तो आईसीआईसीआई बैंक की हालिया दिक्कतें बैंकों के बोर्ड के अंशधारकों के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने में विफल रहने की एक लंबी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होती हैं। चंदा की विदाई पर शेयर बाजार की प्रतिक्रिया, सीईओ के रूप में नौ साल के उनके कार्यकाल पर भी एक टिप्पणी है। के वी कामत से यह उत्तरदायित्व लेने के बाद ऐक्सिस बैंक की अपनी पूर्व सहयोगी शिखा शर्मा की तरह चंदा भी भारतीय बैंकिंग जगत में यह मुकाम पाने पर आकर्षण का केंद्र रहीं। उनकी विरासत पर नजर डालें तो पता चलता है कि वर्ष 2015-16 से बैंक का प्रदर्शन जैसा तैसा ही रहा। शुद्ध ब्याज आय और बाजार पूंजीकरण उनके कार्यकाल में तीन गुना हुआ लेकिन मुनाफे में 2015-16 के बाद से लगातार कमी आई। फंसे हुए कर्ज (इसमें वीडियोकॉन भी शामिल था) ने उसकी बैलेंस शीट को दबाव में रखा। हालांकि पूरे बैंकिंग क्षेत्र में ही हालात बेहतर नहीं रहे। ऐक्सिस बैंक से शर्मा की विदाई और येस बैंक से राणा कपूर का बाहर होना आरबीआई की नाराजगी का ही परिणाम था। हालांकि आईसीआईसीआई बैंक का 53,500 करोड़ रुपये का ऋण पोर्टफोलियो 10 लाख करोड़ रुपये के फंसे हुए कर्ज का महज 5 फीसदी है लेकिन नए सीईओ इससे कैसे निकलते हैं यह उनके पांच साल के कार्यकाल का एक अहम पड़ाव होगा। 
Keyword: ICICI, bank, CBI, Chanda Kochhar, आईसीआईसीआई बैंक,
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