बिजनेस स्टैंडर्ड - आईएलऐंडएफएस संकट की सबप्राइम संकट से तुलना
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आईएलऐंडएफएस संकट की सबप्राइम संकट से तुलना

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  October 03, 2018

सरकार आईएलऐंडएफएस प्रकरण में दखल देकर इस संकट को थामने की कोशिश कर रही है। क्या यह भारत के लिए 'इतनी बड़ी कंपनी नाकाम नहीं हो सकती है' वाली स्थिति है? वर्ष 2008 में उपजे सबप्राइम संकट का कोई भी उल्लेख आपको अतिरेक लग सकता है, बशर्ते यह अहसास हो कि समूचे गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्र में यह धारणा बनी हुई है कि आईएलऐंडएफएस को अलग मामले के तौर पर देखा जाना चाहिए। एनबीएफसी का यह भी मानना है कि उनकी चूक कर्जदाताओं की तरफ से चूक का संक्रमण नहीं फैलाती है। अगर ऐसा होता है तो कर्जदाता उनके आवेदन पर शायद ही गौर करेंगे।

 
दूसरी जगहों की तुलना में वित्तीय क्षेत्र की समस्याएं दीर्घावधि की  पीड़ा अधिक देती हैं। भारत में पहले से ही बैंकिंग संकट चल रहा है। आईएलऐंडएफएस का पतन एनबीएफसी क्षेत्र में भी संकट को जन्म दे सकता है। आईएलऐंडएफएस का ढांचागत परियोजनाओं में अधिक दखल होने से यह संकट उस क्षेत्र में भी समस्याएं पैदा कर सकता है। इसने ऐसा कर भी दिया है। भारत की एनबीएफसी कंपनियां महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। परंपरागत बैंकों की तुलना में कम नियामकीय नियंत्रण होने से ये कंपनियां लंबी अवधि वाली परियोजनाओं को भी अधिक बेरोकटोक कर्ज दे सकती हैं। लेकिन आईएलऐंडएफएस मामले से पता चलता है कि परिसंपत्ति और जवाबदेही में गहरा असंतुलन हो सकता है। इसकी वजह यह है कि एनबीएफसी दीर्घावधि फंड नहीं जुटा सकते हैं और उनकी फंडिंग लागत भी ऊंची होती है।
 
गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियां अमूमन आम लोगों और छोटी एवं मझोली इकाइयों को कई तरह के वित्तीय उत्पाद एवं सेवाएं मुहैया कराती हैं। इन सेवाओं में घरों को गिरवी रखना, सोने के बदले कर्ज देना, वाहन खरीद के लिए वित्त मुहैया कराना एवं टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों के लिए मासिक किस्त (ईएमआई) पर कर्ज देना शामिल है। ईएमआई सुविधा होने से भारतीय अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में उपभोग बढ़ा है। दीवान हाउसिंग फाइनैंस  (डीएचएफएल) में हुई बिक्री बढ़ती घबराहट की ही निशानी थी। डीएसपी ने डीएचएफएल से जुड़े कुछ कागजात रियायती दर पर बेच दिए जिससे इसके शेयर पिट गए। आईएलऐंडएफएस संकट ने अब निवेशकों को अधिक बेचैन कर दिया है।  
 
एनबीएफसी के लिए वित्त जुटाने की लागत बढ़ सकती है क्योंकि अब उन्हें अपने फंड का अधिक प्रतिफल देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। ये कंपनियां भी उसकी भरपाई के लिए लेनदार इकाइयों से अधिक दर पर ब्याज लेंगी। ऐसा होने पर उनके ग्राहकों की संख्या प्रभावित हो सकती है। साल के इस समय अधिकांश घरों में उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी होती है लेकिन एनबीएफसी अगर ऊंचे दर पर ब्याज लेंगी तो बहुतेरे ग्राहक ईएमआई बढऩे से नाखुश हो जाएंगे। कुछ वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाने के हालिया फैसले से उपभोग पर असर पडऩा लाजिमी है। इससे आखिरकार मुद्रास्फीति ही बढ़ेगी क्योंकि बढ़े शुल्क को लागत में जोड़ लिया जाएगा। मॉनसून का अपेक्षित स्तर पर नहीं होना भी मुद्रास्फीति के मोर्चे पर चिंता का एक और विषय है। खाद्य महंगाई कई महीनों से संतोषजनक रही है लेकिन कृषि उपज के अनुमानित स्तर से कम रहने पर यह तेजी पकड़ सकती है।
 
मुद्रास्फीति का दूसरा कारक ऊर्जा है और किसी भी सूरत में यह महंगाई बढ़ाने जा रही है। ईरान से तेल खरीद को प्रतिबंधित करने के बाद कच्चे तेल के दामों में तेजी आनी तय है क्योंकि पेट्रोलियम निर्यातक देशों ने उत्पादन बढ़ाने से मना कर दिया है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध तेज होने से भी हालात बिगड़े हैं। मुद्रा के मोर्चे पर भी चिंताएं हैं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने न केवल लगातार तीसरी बार ब्याज दरें बढ़ाई हैं बल्कि अगले 18 महीनों में पांच और बार बढ़ोतरी के भी संकेत दिए हैं। इसके अलावा फेड रिजर्व मात्रात्मक संकुचन (क्यूटी) की प्रक्रिया में भी है जिससे मात्रात्मक सरलीकरण (क्यूई) की लंबी अवधि में लिए गए कर्जों से भी राहत मिलेगी। यूरोपीय केंद्रीय बैंक के भी दिसंबर से अपनी क्यूई प्रक्रिया पर लगाम लगाने की संभावना है। अधिक प्रतिफल वाली सख्त मुद्रा स्थिति होने से रुपये पर अधिक दबाव पड़ेगा। रुपये को पहले से ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की नाखुशी का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है।
 
भारतीय रिजर्व बैंक को इस महीने नीतिगत ब्याज दरों की समीक्षा भी करनी है। रिजर्व बैंक को गिरते हुए रुपये और बढ़ते चालू खाता घाटे के बीच संतुलन साधने की चुनौती होगी। आईएलऐंडएफएस प्रकरण के बाद बॉन्ड बाजार में तरलता की जरूरत पर भी उसे अपना ध्यान रखना होगा। घरेलू मुद्रास्फीति भले ही कम है लेकिन खाद्य उत्पादों, तेल और टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों में तेजी आने से यह बढ़ भी सकता है। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला ले सकती है।
 
अगले पखवाड़े में कंपनियों के तिमाही नतीजे आने शुरू हो जाएंगे। सकारात्मक बेस इफेक्ट की वजह से इन नतीजों के काफी हद तक अच्छा रहने की ही संभावना है। शेयर बाजारों में गिरावट के बीच कंपनियों का बाजार मूल्यांकन कम हुआ है। अगर समेकित कमाई को ध्यान में रखें तो निफ्टी पीई 23 के करीब कारोबार कर रहा है। निफ्टी के बरक्स मिडकैप और स्मॉलकैप को अधिक नुकसान उठाना पड़ा है। तकनीकी स्तर पर बाजार में गिरावट का सिलसिला 10,750 से ऊपर ही थमता दिख रहा है जो 200 कारोबारी दिवसों के औसत स्तर के करीब ही है। ऐसे में अब बाजार के फिर से तेजी पकडऩे की संभावना बनती है।
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