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स्वच्छतर भारत

संपादकीय /  October 02, 2018

केंद्र की भाजपानीत सरकार की प्रमुख योजनाओं में से एक स्वच्छ भारत अभियान (एसबीए) के चार वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अभियान का लक्ष्य है वर्ष 2019 में महात्मा गांधी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ तक देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में स्वच्छता का लक्ष्य हासिल करना। सरकार के अनुमानों के मुताबिक अब तक इस अभियान को जबरदस्त सफलता प्राप्त हुई है और महज पांच वर्ष की अवधि में देश खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राष्ट्र का दर्जा प्राप्त कर लेगा। इस तरह स्वच्छता को लेकर संयुक्त राष्ट्र स्थायी विकास लक्ष्य को वह तय अवधि से 11 वर्ष पूर्व हासिल कर लेगा। सरकार का कहना है कि देश में ग्रामीण स्वच्छता का स्तर चार वर्ष पूर्व के 39 फीसदी से बढ़कर अब 93 फीसदी हो गया है। देश के 4.50 लाख गांवों को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व में खुले में शौच में भारत की हिस्सेदारी जो अक्टूबर 2014 में 60 फीसदी के शर्मनाक स्तर पर थी वह सितंबर 2018 में घटकर 20 फीसदी रह गई है।

 
इन उपलब्धियों को देखते हुए आश्चर्य नहीं कि भारत ने अभी हाल ही में दुनिया के देशों के स्वच्छता मंत्रियों, विभिन्न बहुपक्षीय संस्थानों के प्रमुखों और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव समेत विभिन्न विशेषज्ञों की मेजबानी की। ये सभी लोग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे। सम्मेलन में यह बताया गया कि देश ने इतना बड़ा बदलाव कैसे किया। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि अन्य देश मसलन चीन और पाकिस्तान भी अब ऐसा ही अभियान चला रहे हैं। निस्संदेह स्वच्छ भारत अभियान एक सराहनीय पहल है और देश की स्वच्छता और स्वास्थ्य मानकों में सुधार एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिसमें तत्काल सुधार आवश्यक था।
 
बहरहाल, यह गुलाबी तस्वीर स्वच्छ भारत अभियान को लेकर किए गए कुछ निष्पक्ष आंकड़ों से मेल नहीं खाती। उदाहरण के लिए ओडीएफ जो इस अभियान का समानार्थी बन चुका है, के आंकड़ों पर टैक्सस विश्वविद्यालय के निखिल श्रीवास्तव ने सवाल उठाए और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बार्कले की पायल हाथी ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण (एनएआरएसएस) के आंकड़ों के निष्कर्ष को वर्गीकृत कर बताया है कि ग्रामीण भारत में खुले में शौच से मुक्ति का दावा अपरिपक्व है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यवहार में इस सर्वेक्षण को सरकार के दावों की पुष्टि के लिए तैयार किया गया और ये प्रबंधन सूचना तंत्र (एमआईएस) पर आधारित हैं। समस्या यह है कि एमआईएस की रिपोर्ट केवल शौचालय निर्माण को ध्यान में रखती है उसके प्रयोग को नहीं। इतना ही नहीं योजना के पीछे की राजनीति को देखें तो ग्राम स्तर के अधिकारियों पर सफलता दर्शाने का अत्यधिक दबाव है। 
 
निश्चित तौर पर सरकार के दावों को अतिरंजित बताने वाले अन्य नतीजे भी हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के ताजा नतीजे एनएआरएसएस से विरोधाभासी हैं। यह अंतरराष्ट्रीय तुलना करने के लायक उच्च स्तरीय सर्वेक्षण है। इन दोनों को कुछ ही महीनों के अंतर पर अंजाम दिया गया था। ओडीएफ के लक्ष्य के अलावा स्वच्छ भारत अभियान तरल और ठोस कचरे के प्रबंधन आदि के मानकों पर भी औसत रहा है। उदाहरण के लिए हमारे शहरों में रोज 6,200 करोड़ लीटर गंदगी बहती है जिसमें से केवल 2,300 करोड़ लीटर का उपचार होता है। शेष गंदगी नदियों में मिल जाती है। इसी तरह केवल 37 फीसदी कचरे का उपचार होता है। गांवों में स्वच्छता को लेकर व्यवहार के स्तर पर बदलाव एक अन्य चुनौती है। बने हुए शौचालयों का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में 4.50 लाख प्रेरक इस काम में लगे हैं। फिर भी अभी लंबी दूरी तय करनी है।
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