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स्वच्छ शहरों के बिना कैसे बन पाएगा स्वच्छ भारत!

बीएस संवाददाता / नईदिल्ली/हैदराबाद/चेन्नई/लखनऊ/कोलकाता 10 01, 2018

स्‍वच्‍छ भारत अभियान की चौथी वर्षगांठ

देश के सबसे तेजी से बढ़ रहे शहरों में से एक पुणे में बहने वाली मूठा नदी में घुली ऑक्सीजन का स्तर दो पीपीएम से नीचे चला गया है जबकि इसके लिए वैश्विक मानक 8 पीपीएम है। हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करता है और काफी हद तक हमारी जीने की क्षमता निर्धारित करता है। इसी तरह पानी में घुली ऑक्सीजन जीवन को बनाए रखने की इसकी क्षमता का निर्धारण करती है। यानी इस पानी में मछली जिंदा रह सकती है या नहीं या यह मनुष्यों के पीने के अनुकूल है या नहीं। जल संरक्षण कार्यकर्ताओं का दावा है कि मूठा नदी लगभग मर चुकी है। यह नदी भीमा में मिलती है और फिर कृष्णा बनकर चार बड़े राज्यों में लोगों की पेयजल की जरूरत को पूरी करती है, फसलों को सींचती है और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए पानी मुहैया कराती है।

मूठा की तरह भारतीय शहरों और कस्बों से गुजरने वाली नदियां औद्योगिक इकाइयों, रेस्त्रों और शौचालयों से निकलने वाली गंदगी से बजबजा रही हैं। हमारे घरों में पीने के पानी के लिए रिवर्स ओस्मोसिस फिल्टर लगाने का एक कारण है। स्वच्छ भारत अभियान की चौथी वर्षगांठ पर हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि हमने रिकॉर्ड समय में रिकॉर्ड शौचालयों का निर्माण किया है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में ग्रामीण शौचालयों की संख्या 4.5 करोड़ थी जो अब 8.6 करोड़ पहुंच चुकी है। 

लेकिन शहरी इलाकों में यह ज्यादा कारगर नहीं रहा है। शहरी विकास पर संसद की स्थायी समिति के मुताबिक शौचालयों के निर्माण के लिए राज्यों को कुल 59 अरब रुपये जारी किए गए थे जिसमें से केवल 22 अरब रुपये ही इस्तेमाल हुए हैं। यानी केवल 38 फीसदी राशि ही खर्च की गई और उसमें 50 लाख शौचालय बनाए गए। लेकिन शौचालयों के निर्माण के परे साफ सफाई का बुरा हाल है।  केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक हमारे शहरों में रोजाना 62 अरब लीटर सीवेज निकलता है जिसमें से केवल 23 अरब लीटर का ही शोधन होता है। बाकी दो-तिहाई हिस्सा बिना शोधन के नदियों में जाता है। जब साफ पानी गंदे पानी के साथ मिलता है तो जलशोधन का असर शून्य हो जाता है। 

मानव अपशिष्ट शोधन की क्षमता अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीवेज निकलता है और यह 63 फीसदी का शोधन करता है। केरल, पश्चिम बंगाल और बिहार की मलजल शोधन क्षमता दस फीसदी से भी कम है। हर राज्य की राजधानी में शोधन क्षमता दूसरे नगरों से बेहतर है। अहमदाबाद में तीन साल पहले रोजाना 81.7 करोड़ लीटर सीवेज निकलता था जो अब 84.8 करोड़ लीटर हो गया है। अलबत्ता मलजल शोधन क्षमता 81.7 करोड़ लीटर पर ठहरी हुई है। यह राज्य के औसत से बेहतर है। गुजरात में जितना सीवेज निकलता है उसके 75 फीसदी का शोधन किया जाता है। यह सभी राज्यों में सर्वाधिक है। अहमदाबाद नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संशोधित नियमों का पालन करना और कवरेज क्षेत्र को बढ़ाकर 100 फीसदी करना हमारे लिए एक चुनौती रही है।'

आधा से अधिक गंदा जल सुबह छह से नौ बजे तक मलजल शोधन संयंत्र में आता है जब क्षमता घट जाती है और अतिरिक्त सीवेज बाइपास पाइप से निकलकर नदी में चला जाता है। इसका असर स्वच्छ भारत अभियान पर पड़ सकता है। सीपीसीबी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश में चुनिंदा 351 नदी खंडों में से करीब 175 में प्रदूषण स्तर मानकों से अधिक है। तेजी से बढ़ रहे औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण महाराष्ट्र और गुजरात में स्थिति खराब है। जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) पानी में ऑक्सीजन की वह मात्रा है जो मानव अपशिष्ट और भोजन जैसे प्रदूषकों को साफ करने में खर्च होती है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर पानी में बीओडी 6 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है तो वह इस्तेमाल के योग्य है। गुजरात में भादर नदी में जेतपुर से सारण के बीच बीओडी का स्तर 426 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है।

लखनऊ की स्थिति भी भारतीय शहरों के हालात और स्वच्छता के स्तर की ओर इशारा करती है। शहर का केवल 55 फीसदी हिस्सा सीवर नेटवर्क से जुड़ा है। शहर के आधे हिस्से से 60 करोड़ लीटर प्रतिदिन मैला निकलता है और यहां 50 करोड़ लीटर प्रति दिन गंदे पानी के शोधन की क्षमता है। बाकी आधे हिस्से से निकले कचरे के लिए कोई अपशिष्ट शोधन संयंत्र नहीं है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की संयुक्त राजधानी हैदराबाद में भी आधे गंदे पानी और कचरे का निस्तारण नहीं हो पाता है। अगर गंदे पानी के शोधन की स्थिति स्वच्छता के पैमाने से काफी दूर है तो ठोस कचरे के शोध का रिकॉर्ड तो और भी कम है।

हालांकि दरवाजे पर मिलने वाली सेवाओं में काफी सुधार हुआ है। भारतीय शहरों के आधे वार्ड में से अब दो-तिहाई शहरी वार्ड में कचरे का संग्रह दरवाजे पर होने लगा है। हालांकि जिस कचरे का संग्रह किया जाता है वह सूखे और गीले जैविक कचरे का मिला-जुला रूप होता है। ऐसी स्थिति में गीला कचरा सूखे कचरे के साथ प्रतिक्रिया कर कीचड़ ही बना देता है जो शहर में बदबू फैलाने के साथ ही भूजल को प्रदूषित करता है और यह सफाई कर्मचारियों के लिए भी काफी घातक साबित होता है। 

शहरी विकास से जुड़ी संसदीय समिति ने अपनी प्रतिक्रिया में इस साल की शुरुआत में सरकार को बताया कि देश में केवल 33 फीसदी नगरपालिका वार्ड के पास 100 फीसदी कचरा संग्रह करने की जगह है। इसके बाद कचरा शोधन की बारी आती है। स्वच्छ भारत अभियान का एक प्रमुख उद्देश्य अक्टूबर 2019 तक ठोस कचरे का 100 फीसदी वैज्ञानिक प्रसंस्करण और निस्तारण है। अब तक देश में केवल 37 फीसदी नगरपालिका के कचरे का शोधन होता है। यह अनुपात हरियाणा में और भी कम महज 17 फीसदी और ओडिशा में महज 10 फीसदी ही है।

देश की ऑटो राजधानी चेन्नई में लगभग 2,800 वाहन घरों से कचरा इकट्ठा करते हैं जो इस प्रक्रिया का पहला चरण है। हालांकि कचरा प्रबंधन तंत्र के अभाव में पिछले 25 सालों से शहर के 2 स्थानों पर लगभग 4,500 टन ठोस कचरा गिराया जा रहा है। हैदराबाद में कचरे को अलग-अलग इकट्ठा करने का औसत लगभग 60 प्रतिशत है और ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के अधिकारियों का दावा है कि एक निजी संस्था के साथ मिलकर एकीकृत नगर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजना (आईएमएसडब्ल्यूएम) के तहत पूरे कचरे का निस्तारण किया जा रहा है। कचरा जमा करने वाले स्थानों पर 1.2 करोड़ टन की अधिकतम सीमा के बावजूद तेलंगाना में केवल 64 प्रतिशत कचरे का निस्तारण किया जा रहा है।

स्वच्छ भारत मिशन के आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश में यह क्षमता केवल 27 प्रतिशत है। हाल में महाराष्ट्र सरकार ने बड़े शहरों में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है। ओडिशा सरकार भी स्वच्छ भारत सालगिरह पर 2 अक्टूबर से 9 बड़े शहरों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा रही है।  अक्टूबर 2019 तक पूरे देश को स्वच्छ बनाने के लक्ष्य के अंतिम वर्ष में पहुंचने पर एक लंबी दूरी दिखाई दे रही है। यदि ग्रामीण क्षेत्र में शौचालयों का उपयोग एक समस्या है तो शहरी क्षेत्रों में शौचालयों के अतिरिक्त दूसरे कार्यों से समस्या बनी हुई है। 

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