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भारत में डिजिटल प्रकाशन का कैसा होगा भविष्य?

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  October 01, 2018

अमन गोकलानी पॉडकास्टिंग के बारे में बहुत नरम आवाज में बात करते हैं लेकिन उनकी बातों में काफी गहराई है। वह ऑडियोबूम के भारत कारोबार के प्रमुख हैं। गोकलानी कहते हैं कि अधिकांश डिजिटल प्रकाशक इस बात को लेकर संघर्ष कर रहे हैं कि लोग उनकी साइट या ऐप पर अधिक से अधिक समय बिताएं। हैरी पॉटर जैसी किसी काल्पनिक शृंखला, किसी किताब, किसी लेख, साक्षात्कार या शोध पत्र अथवा संगीत की पॉडकास्टिंग को समय बिताने के लिहाज से काफी अहम पाया गया है। ब्रिटेन की कंपनी ऑडियोबूम पॉडकास्ट को होस्ट करती है, उनका वितरण करती है और उनका मुद्रीकरण करने में सहायता करती है। गत वर्ष अमेरिका में कंपनियों ने 12.4 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाने के लिए 31.4 करोड़ डॉलर की राशि खर्च की। इन लोगों तक पहुंच उस समय बनाई गई जब वे बिल ब्राइसन की किताब का पॉडकास्ट सुन रहे थे या तमाम अन्य चीजों के साथ पैरेंटिंग पर चर्चा में शामिल थे। भारत का बाजार अभी भी काफी छोटा है लेकिन यह बहुत तेजी से बढ़ रहा है। 

 
पॉडकास्टिंग और वीडियो से जुड़े माहौल में इसकी संभावनाएं उन तीन शुरुआती चीजों में से हैं जिनके बारे में पिछले दिनों गुरुग्राम में आयोजित डिजिटल प्रकाशन सम्मेलन डिजिपब में चर्चा हुई। यहां जिन अन्य बातों पर चर्चा हुई उनमें विज्ञापनों को लेकर ऑनलाइन प्रकाशकों का रुख और प्रकाशन के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमता की संभावित सहायक भूमिका। पॉडकास्ट को लेकर गोकलानी की बातें उन बातों की पुष्टि ही करती हैं जो कॉमस्कोर के भारतीय कारोबार के उपाध्यक्ष केदार गवाने ने इस कार्यक्रम से इतर एक बातचीत में मुझसे कही थीं। उनका कहना था कि विज्ञापनों को ऑनलाइन बेचने में मात्रा की अहमियत बहुत ज्यादा है न कि उत्कृष्टता की। हालांकि गवाने ने यह नहीं कहा कि उत्कृष्टता को प्रभावित करने वाले कारक में संबद्धता का बहुत महत्त्व है लेकिन इसे इस बात से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों कम दर्शकों के बावजूद एनडीटीवी को अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में ऑनलाइन और ऑफलाइन बेहतर विज्ञापन मूल्य मिलते हैं। अगर डिजिटल प्रकाशक इन्वेंटरी को एक साथ लाने में कामयाब हो सकें, और अधिक संबद्धता और दृश्यता वाली सामग्री के लिए अधिक शुल्क वसूल कर सकें तथा प्रति हजार व्यक्तियों तक पहुंच के आधार पर आगे बढ़ा सकें तो इस क्षेत्र में काफी बेहतरी आ सकती है।
 
बाजार और पहुंच दोनों ही मौजूद हैं। कॉमस्कोर की प्रस्तुति ने दिखाया कि देश में इस्तेमाल किए जाने वाले तमाम डिजिटल उपकरणों में डिजिटल प्रकाशकों का पूरा आकार क्या है। उदाहरण के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया  की वेबसाइट्स की पहुंच 10.80 करोड़ लोगों तक है। एनडीटीवी 7.53 करोड़ के साथ दूसरे स्थान पर है। बीते 8 से 10 महीनों के बीच अधिकांश प्रकाशकों की पहुंच दोगुनी हुई है लेकिन इसके बावजूद प्रति एक हजार उपयोगकर्ता उनके मूल्य में कोई सुधार नहीं हुआ और वह 50 रुपये से 200 रुपये के इर्दगिर्द  बना रहा। वहीं वैश्विक प्रकाशकों की बात करें तो उन्हें प्रति हजार उपयोगकर्ता 2 से 10 डॉलर यानी 140 से 700 रुपये की राशि मिलती है। भारत में इस क्षेत्र में मुद्रीकरण की दर कम होने को लेकर कई तरह की बातें चर्चा में हैं। परंतु, एक वरिष्ठ विश्लेषक कहते हैं कि सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रकाशक अपने विज्ञापनों की इन्वेंटरी बेचने का काम बहुत खराब ढंग से करते हैं। उदाहरण के लिए एक स्थानीय समाचार पत्र या मीडिया हाउस गूगल अथवा फेसबुक की तुलना में विज्ञापनदाताओं के अधिक करीब होता है लेकिन इसके बावजूद वह बेहतर दर या बेहतर संबद्धता हासिल करने में इसका इस्तेमाल नहीं करते। इसके अलावा डिजिटल प्रकाशक विज्ञापित की जाने वाली सेवाओं, उनके स्वरूप या भाषाई विज्ञापन को लेकर बहुत अधिक प्रयोग भी नहीं करते। कारण? भारत के अधिकांश मीडिया हाउस निजी स्वामित्व वाले हैं और उन पर कोई तिमाही दबाव नहीं होता। विश्लेषक कहते हैं कि जिन पर तिमाही नतीजों का दबाव होता है, वे कहीं अधिक प्रयोगधर्मी होते हैं।
 
शायद ऐसा हो लेकिन तथ्य तो यही है कि अधिकांश डिजिटल प्रकाशकों का ऑफलाइन कारोबार खासा मुनाफे वाला है। यानी उस मोर्चे पर भी किसी तरह का दबाव नहीं है। केवल एनडीटीवी का मामला अलग है जिसे मार्च 2018 में समाप्त वित्त वर्ष में 144 करोड़ रुपये के राजस्व पर 20 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। इसके अलावा अधिकांश डिजिटल प्रकाशक मुनाफे में नहीं हैं। यहां बात आती है तीसरे बिंदु की। कृत्रिम बुद्धिमता अभी भी प्रकाशन जगत में महज एक शिगूफा ही है। यहां तक कि विकसित बाजारों में जहां कई समाचार कक्ष इसे लेकर प्रयोग कर रहे हैं, वहां भी यह बहुत अधिक आगे नहीं बढ़ सकी है। कृत्रिम बुद्धिमता ढेर सारे डेटा आदि की मदद से विश्लेषण करने का काम करती है। मशीन हमारे बारे में  और सीखने में लगी हुई हैं। यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारे लिखे या विषयवस्तु तैयार करे। एक पैनल के वक्ताओं ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमता वितरण सुधार और पहुंच बनाने तथा लागत कम करने में हमारी मदद कर सकती है। यह शोध कार्यों को भी मजबूत बनाने का काम करेगी। फिलहाल पत्रकार राहत की सांस ले सकते हैं।
Keyword: digital, podcasting, online,,
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