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स्वच्छ भारत अभियान का वैश्विक दायरा

परमेश्वरन अय्यर /  October 01, 2018

महात्मा गांधी की जयंती पर शुरू हुआ स्वच्छ भारत अभियान साफ-सफाई को बढ़ावा देने में बेहद सफल रहा है। इस अभियान के वैश्विक प्रसार की अहमियत बता रहे हैं परमेश्वरन अय्यर

 
आज महात्मा गांधी की 149वीं जयंती है और यह स्वच्छ भारत अभियान की चौथी वर्षगांठ भी है। इस अवसर पर भारत स्वच्छता से संबंधित दुनिया भर के प्रतिनिधियों की मेजबानी भी कर रहा है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन में 50 से अधिक देशों के स्वच्छता मंत्री, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की अगुआई में विभिन्न बहुआयामी संगठनों के प्रमुख और तमाम विशेषज्ञ एवं नीति-निर्माता शिरकत कर रहे हैं। दिल्ली में 29 सितंबर से चल रहे इस सम्मेलन का गांधी जयंती पर समापन होगा।
 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन साफ-सफाई के मुद्दे पर दुनिया भर में अपनी तरह के सबसे बड़े आयोजनों में से एक है। दुनिया के सभी हिस्सों में मौजूद देश स्वच्छता को लेकर चलाए गए दुनिया में अपनी तरह के सबसे बड़े अभियान से भारत को हासिल अनुभवों से सीखने के लिए इक_ा हुए हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तहत खुले में शौच की सदियों पुरानी आदत को महज चार वर्षों में ही काफी हद तक छुड़ाया जा चुका है। करीब 45 करोड़ लोग खुले में शौच की अपनी आदत छोड़ चुके हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तीन बुनियादी पहलुओं के बारे में जानने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासी रुचि देखी जा रही है। ये पहलू हैं- स्वच्छता एजेंडा पर जोर देने के लिए उच्चतम स्तर पर राजनीतिक प्रतिबद्धता होना, साफ-सफाई को बढ़ावा देने के लिए संसाधनों का समुचित आवंटन एवं  सार्वजनिक व्यय सुनिश्चित करना और लोगों की आदतों में बदलाव के लिए एक जनांदोलन तैयार करना। इनके अलावा महात्मा गांधी स्वच्छता सम्मेलन से भारत को स्वच्छता अभियानों का सफल संचालन कर चुके दूसरे देशों के अनुभवों से भी सीखने का मौका मिलेगा।
 
पूरी दुनिया ने वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को आत्मसात करते हुए 2030 तक धरती से गरीबी का उन्मूलन करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इन लक्ष्यों में एसडीजी 6.2 भी शामिल है जिसमें सभी लोगों को स्वच्छ पानी एवं स्वच्छता मुहैया कराने की प्रतिबद्धता जताई गई है। वैसे एसडीजी के तौर पर स्वच्छता को शामिल किए जाने के पहले ही भारत के प्रधानमंत्री ने अक्टूबर 2014 में स्वच्छता अभियान की शुरुआत कर दी थी। उस समय सबको यह लगा था कि भारत ने महज पांच वर्षों में खुले में शौच से निजात पाने और एसडीजी में वर्णित स्वच्छता लक्ष्यों को निर्धारित समय से 11 साल पहले ही हासिल कर लेने का जो लक्ष्य रखा है उसे हासिल कर पाना एक नामुमकिन ख्वाब जैसा है। प्रधानमंत्री के अक्टूबर 2014 के उस ऐलान को यह बात एक हद तक दु:साहसी बनाती थी कि उस समय ग्रामीण भारत का केवल  39 फीसदी हिस्सा ही स्वच्छता के दायरे में शामिल था। आज यह दायरा बढ़कर 93 फीसदी से भी अधिक हो चुका है और 4.5 लाख से अधिक गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है। इस कामयाबी की वजह से खुले में शौच करने वाली वैश्विक आबादी में भारत की हिस्सेदारी अक्टूबर 2014 के 60 फीसदी से घटकर सितंबर 2018 में 20 फीसदी से भी नीचे आ गई है। सारी दुनिया खुले में शौच से निजात पाने में भारत को मिली नाटकीय कामयाबी से कौतूहल में है और यह जानने को बेकरार है कि आखिर इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया गया, भारत को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा और उन पर किस तरह जीत हासिल की? खासकर अफ्रीका के देश भी अपने यहां स्वच्छता की चुनौतियों से जूझ रहे हैं और वे यह जानना चाहते हैं कि भारत ने स्वच्छ भारत अभियान को किस तरह एक ऐसे आंदोलन में तब्दील कर दिया जिसमें लोगों की चौतरफा भागीदारी थी। खास तौर पर भारत ने ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के निर्माण और स्वच्छता संबंधी आकांक्षाओं को हासिल करने में किस तरह सफलता पाई? स्वच्छ भारत अभियान समुदाय की सघन भागीदारी और व्यवहार में बदलाव के बारे में जानकारी देकर साफ-सफाई की चाहत किस तरह पैदा कर पाया?
 
संभवत: स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी में सबसे अहम कारक यह रहा है कि खुद प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम को अपना व्यक्तिगत अभियान बना लिया है। वह इस अभियान के मुख्य प्रचारक भी हैं। सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यिऊ की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राष्ट्रीय विकास के एजेंडा में स्वच्छता को शीर्ष पर रखा है। इसका असर यह हुआ कि केंद्र से लेकर राज्यों तक, राज्यों से लेकर जिलों तक और जिले से लेकर गांवों और घरों तक स्वच्छता को प्राथमिकता दी जाने लगी। स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए पहले चलाए गए कार्यक्रमों के ड्रिप-ड्रिप नजरिये से क्रमिक प्रगति हुई थी वहीं स्वच्छ भारत अभियान में केंद्र एवं राज्यों ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन का इंतजाम कर स्वच्छता के मोर्चे पर जबरदस्त छलांग लगा ली है। इससे देश भर में साफ-सफाई को लेकर लोगों के नजरिये एवं सोच में भी व्यापक बदलाव देखने को मिला है।
 
इस स्वच्छता क्रांति की शुरुआत के चार साल पूरे हो जाने पर आज तमाम अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस कार्यक्रम के नतीजों पर मुहर लगा रहे हैं। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वच्छ भारत अभियान की वजह से 2019 तक तीन लाख लोगों को डायरिया के चलते मौत के आगोश में जाने से बचाया जा सकेगा। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने 2017 में अनुमान जताया था कि खुले में शौच से मुक्त हो चुके गांव में रहने वाला हरेक परिवार साल भर में 50,000 रुपये तक की परोक्ष बचत कर पाएगा। यूनिसेफ के मुताबिक कम बीमार पडऩे पर न केवल परिवार के कामगार सदस्यों को कम छुट्टियां लेनी होंगी बल्कि स्वास्थ्य मद पर खर्च भी कम होगा। लंबे समय में इन सकारात्मक बातों का परिणाम यह होगा कि कार्यबल एवं पर्यावरण अधिक स्वस्थ होगा जिससे आर्थिक प्रगति में तेजी आएगी और सकल घरेलू उत्पाद भी बढ़ेगा।
 
दुनिया के लिए बड़ा सबक यह है कि मजबूत नेतृत्व और लोगों के समर्थन से बड़े लक्ष्यों को भी हासिल किया जा सकता है। स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी ने अब एक डोमिनो प्रभाव शुरू कर दिया है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने गत वर्ष अपने देश में स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए 'शौचालय क्रांति' शुरू करने का आह्वान किया था। हाल ही में पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने देश को पांच वर्षों में खुले में शौच से मुक्त करने का वादा किया है। हमें उम्मीद है कि महात्मा गांधी स्वच्छता सम्मेलन के बाद दुनिया के कई दूसरे नेता भी अपने-अपने देशों में इसी तरह के कार्यक्रम चलाने के लिए प्रेरित होंगे।
 
भारत का ध्यान अब तक अर्जित लाभों को कायम रखने और दूसरे देशों को पूर्ण स्वच्छता लक्ष्य हासिल करने के सफर में सलाह और मदद देने पर है। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में घरेलू स्तर पर शुरू हुई इस पहल को अब वैश्विक स्तर पर ले जाने और दुनिया भर में स्वच्छता क्रांति का सूत्रपात करने की क्षमता है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन इस दिशा में चर्चाओं की शुरुआत का माकूल मंच है। इससे स्वच्छ भारत अभियान को वैश्विक स्तर पर भी स्थापित किया जा सकेगा।
 
(लेखक केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय में सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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