बिजनेस स्टैंडर्ड - अगर सुखोई होता राफेल तो एचएएल भरती उड़ान
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अगर सुखोई होता राफेल तो एचएएल भरती उड़ान

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 30, 2018

हालिया इतिहास का विभाजन 20 साल पुराने गूगल के आगमन के पहले और बाद के दौर में हो चुका है। यह कहानी भी 1998 से संबंधित होने के नाते इस पैमाने पर फिट बैठती है। जॉर्ज फर्नांडिस  को अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री बनाया गया था। सवाल उठा था कि कुर्ता-पायजामा और चप्पल पहनने वाला एक ट्रेड यूनियन नेता भारत के सर्वाधिक औपचारिक और नफासत वाले मंत्रालय को आखिर कैसे संभालेगा? लेकिन फर्नांडिस ने बड़ी जल्दी मंत्रालय पर अपनी पकड़ बनाकर हमें अचरज में डाल दिया था। उनके सामने पहली चुनौती मंत्रालय में जड़ें जमाए बैठी नौकरशाही के उस दुष्चक्र को तोडऩे की थी जो 'न तो खुद कुछ करने और न ही दूसरे को करने' देती थी। फर्नांडिस के लिए सियाचिन ग्लेशियर पसंदीदा तीर्थस्थल बनकर उभरा था। उन्होंने मुझसे एक साक्षात्कार में कहा था, 'रक्षा मंत्रालय में मुझे सबसे तकलीफदेह बात यह लगी है कि वे कभी भी हां या ना नहीं बोलते हैं। वे फाइल को केवल गोल-गोल घुमाते रहते हैं। ऐसे में आप बस पीछा ही कर सकते हैं।' 

 
ऐसे ही एक दौरे पर उन्हें यह पता चला कि जवानों को ग्लेशियर परचहलकदमी के लिए स्नो-मोबाइल और स्नो-स्कूटर की सख्त जरूरत है। कुछ स्नो-स्कूटरों की खरीद का प्रस्ताव भी रखा गया था। सियाचिन से लौटने के बाद फर्नांडिस को पता चला कि कुछ नौकरशाह इस फाइल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इन अधिकारियों को फौरन सियाचिन जाने और वहां पर बर्फीले स्कूटरों की अहमियत का अहसास होने तक रहने का निर्देश दिया गया। यह दुखद है कि फर्नांडिस अभी बातचीत कर पाने की हालत में नहीं हैं। ऐसे में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं कि राफेल की फाइल पर असहमति जताने वाले रक्षा मंत्रालय के अधिकारी के बारे में उनकी क्या राय होती? अगर उन्होंने यह बुद्धिमानी भरी टिप्पणी पढ़ी होती तो उन्होंने इस अधिकारी को फौरन एक बेहतरीन रॉकेट वैज्ञानिक घोषित कर दिया होता। उस अधिकारी ने राफेल विमानों से संबंधित फाइल को भी चक्कर लगाने के लिए मजबूर कर दिया था।
 
अगर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) संप्रग सरकार के समय के सीएजी की ही तरह सुर्खियों में रहने के आदी हुए तो इस अधिकारी को अब भी व्हिसल-ब्लोअर ठहराया जा सकता है। ऐसे में एक नौकरशाह की समझदारी पर सवाल उठाने का मैं जोखिम लेता हूं। उनकी सलाह थी कि फ्रांसीसी कंपनी दसॉ को 36 राफेल विमानों के लिए जितना भुगतान किया जाना है उतने में वह हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से इससे अधिक सुखोई विमान खरीद लेते। एचएएल में निर्मित सुखोई ही अगर जवाब था तो फिर हमें दूसरा विमान खरीदने की जरूरत ही क्या थी? शायद फर्नांडिस उस अधिकारी से कहते कि एक सुखोई विमान की कीमत में एचएएल से छह नए मिग-21 विमान क्यों नहीं खरीद लेते? 
 
मैंने अभी तक एक भी ऐसा खरीद घोटाला नहीं देखा है जिसमें अदालत से किसी को सजा हुई हो। मैं बोफोर्स की चर्चाओं के बीच पली-बढ़ी पीढ़ी से अपशब्द का जोखिम होने पर भी यह कहता हूं। सच तो यह है कि भारत में कभी भी किसी के पास कोई रकम नहीं मिली है। वी पी सिंह और वाजपेयी की सरकारों ने भी स्वीडन पर अपनी सार्वभौम गारंटी पर खरा उतरने के लिए दबाव नहीं डाला था। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि कोई घोटाला नहीं हुआ था। लेकिन शायद इस मसले को लंबे समय तक जिंदा रखना रकम की वसूली और कुछ लोगों को जेल भेजने से अधिक कीमती है ताकि इसे वोट के रूप में भुनाया जा सके। बोफोर्स मामला उछलने का एक और नतीजा यह निकला कि इसने गैर-रूसी रक्षा उपकरणों की खरीद रोक दी। 1982 में फ्रांस से मिराज-2000 विमान खरीदे जाने के बाद राफेल पहला गैर-रूसी लड़ाकू विमान होगा।
 
अगर राफेल भी भारतीय रक्षा खरीद के पुराने ढर्रे पर चला तो काफी दुखद होगा। 20 वर्षों की हिचकिचाहट के बाद इस विमान को खरीदने का फैसला होता है और दो-चार अफवाहों के बाद हर कोई दूसरे को 'चोर' कहने लगता है। हालांकि कोई भी पकड़ा नहीं गया है लेकिन अगला ऑर्डर देने को कोई भी तैयार नहीं है। हमारी सेना को यहां-वहां से जरूरत के सामान जुटाने पड़ रहे हैं जिससे हथियारों की संख्या और असर दोनों ही सीमित हो रहे हैं। चुनावी मौसम में राफेल विवाद का सर्वाधिक नुकसानदेह असर यह हुआ है कि एचएएल को नया देवता बताया जाने लगा है। रिलायंस-एडीएजी की तुलना में यह कंपनी जबरदस्त लगती है लेकिन हमें इस सरकारी रक्षा कंपनी को वास्तविकता के धरातल पर भी परखने की जरूरत है। दुनिया में चौथी बड़ी सेना भारत की है। एचएएल वायुसेना की करीब 75 फीसदी, थलसेना की 100 फीसदी, नौसेना की 66 फीसदी और तटरक्षक बल की 100 फीसदी जरूरतों को पूरा करता है। अब इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। इसका टर्नओवर करीब 180 अरब रुपये का है जो अशोक लीलैंड के टर्नओवर का आधा और इंडिगो एयरलाइंस एवं इंडसइंड बैंक के टर्नओवर से भी नीचे है। ऐसा तयशुदा ग्राहकों वाले एकाधिकार के बावजूद है। यह अनुसंधान एवं विकास कार्यों पर बहुत कम खर्च करती है और इसका उत्पादन इसकी तस्दीक करता है। एचएएल का सालाना निर्यात 4 अरब रुपये के दायरे में सिमटा हुआ है जबकि मिर्जापुर या पानीपत के कुछ बुनकरों का ही निर्यात इससे अधिक होता है।
 
एचएएल ने 4,000 से अधिक विमान बनाए हैं लेकिन तकरीबन सभी विमान लाइसेंस की नकल हैं। भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान मारुत की भी 150 इकाइयां इसने बनाई हैं लेकिन वह नाकाम ही रहे हैं। हम इसके कारोबारी मॉडल को समझ ही नहीं पाए। सरकार विदेश से एक विमान खरीदती है और उसके साथ सह-उत्पादन की शर्त रखती है जिसके बाद एचएएल को उसके निर्माण का ठेका उपहार के तौर पर मिल जाता है।  वैसे एचएएल ने इसरो और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट इस्टेब्लिशमेंट (एडीई) के सहयोगी के तौर पर शानदार काम भी किया है। लेकिन आत्म-निर्भरता के मामले में यह नाकाम है। असल में यह 'पकी-पकाई' कारोबार से मोटी हुई पीएसयू वाली नौकरशाही है। वायुसेना को भी इसकी क्षमताओं पर संशय रहा है। हमें वायुसेना के मौजूदा प्रमुख के उस बयान को अधिक तवज्जो नहीं देना चाहिए जिसमें उन्होंने तेजस विमानों के 12 स्क्वाड्रन खरीदने की संभावना जताई है। लेकिन एचएएल के पिछले रिकॉर्ड को देखें तो इनमें से आधे विमानों की आपूर्ति होने तक चालक वाले हल्के लड़ाकू विमान तो लुप्तप्राय हो चुके होंगे।
 
कोई शख्स पैसा चुराए या नहीं, हमारी रक्षा खरीदों में बड़े घोटाले का होना निश्चित ही है। रक्षा उत्पाद खरीदने में हमारी नाकामी रक्षाबलों को कमजोर बनाती है। रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के आगामी भारत दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें एचएएल में बना एक मिग-21 विमान भेंट करने वाले हैं। यह अपने आप में एक मजाक ही होगा क्योंकि दुनिया भर में हम इकलौते बड़े देश हैं जो अब भी इस पुराने विमान का इस्तेमाल कर रहा है।  भारत वैश्विक स्तर पर अजेय अपनी निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में शामिल न कर अपना ही गला दबा रहा है। हम भारत में निजी कंपनियों को हथियार नहीं बनाने देंगे लेकिन बाकी दुनिया से निजी क्षेत्र में बने हथियार खरीदेंगे। राफेल बनाने वाली दसॉ भी तो एक निजी कंपनी ही है। 
 
संप्रग सरकार के रक्षा मंत्री ए के एंटनी इस दिशा में आगे बढऩे का साहस नहीं दिखा सके थे। हालांकि मोदी सरकार ने नई पहल की और इसे मेक इन इंडिया का नाम दिया। वह निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन में शामिल करने से हिचकी नहीं। लेकिन इसकी शुरुआत रिलायंस-एडीएजी के साथ करने को किसने कहा था? उसके दंभ और अस्पष्टता ने हालात को और बिगाड़ दिया जबकि पारदर्शिता और सच्चाई उसकी सबसे बड़ी ढाल होती।  
 
पुनश्च: क्या किसी ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति जिस सिकोस्र्की एस-92 हेलीकॉप्टर में उड़ान भरते हैं उसका केबिन हैदराबाद में टाटा की एक कंपनी ने बनाया हुआ है? यह एक संयुक्त उपक्रम का नतीजा है, किसी उपहार का परिणाम नहीं। अब टाटा की यह कंपनी चिनूक और अपाचे हेलीकॉप्टरों के लिए भी केबिन बनाने जा रही है। रक्षा क्षेत्र की बेहतरीन कंपनियां भारतीय निजी क्षेत्र की ताकत समझ रही हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।
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