बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल जोखिमों के बेहतर प्रबंधन से ही मिल सकेगी राहत
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तेल जोखिमों के बेहतर प्रबंधन से ही मिल सकेगी राहत

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 28, 2018

पिछले पांच महीनों में पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों में हुई तीव्र बढ़ोतरी ने केंद्र में आसीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। भाजपा के लोग निजी बातचीत में यह मानते हैं कि पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में आई तेजी पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर तगड़ी चोट कर सकते हैं। पिछले पांच महीनों में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के पैटर्न और इस दिशा में सरकार की तरफ से उठाए गए और आगे उठाए जा सकने वाले कदमों का विश्लेषण किया जाए तो इस पूरी कवायद में तीन व्यापक प्रवृत्तियां ऐसी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। दिल्ली में पेट्रोल के खुदरा भाव अप्रैल के पहले हफ्ते से लेकर अब तक करीब 12 फीसदी बढ़ चुके हैं। डीजल के मामले में यह बढ़ोतरी 14 फीसदी से भी अधिक है। इस वृद्धि के पीछे दो अहम कारक हैं। पहला, रिफाइनरियों का कच्चे तेल की लागत एवं ढुलाई पर खर्च 15-16 फीसदी बढ़ गया है और दूसरा, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में 11 फीसदी से भी अधिक गिरावट आई है।

 
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह दोहरी मार है। यह स्थिति 2010-11 और 2011-12 से अलग है जब कच्चे तेल के भाव काफी बढ़ गए थे। अगर डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में इतनी गिरावट नहीं आई रहती तो कच्चे तेल के भाव चढऩे पर भी पेट्रोल और डीजल के खुदरा भाव इतने अधिक नहीं होते। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव में तेजी रोक पाना सरकार के हाथ में नहीं है। वह भारतीय रुपये में गिरावट को भी स्थायी रूप से नहीं थाम सकती है। सरकार से केवल यही उम्मीद की जा सकती है कि वह अधिक उठापटक के बगैर रुपये में स्थिर मूल्यह्रास को संभव बनाए। 
 
दूसरी प्रवृत्ति तेलशोधन की लागत एवं ढुलाई पर रिफाइनरियों की असमान गतिविधि से संबंधित है। वितरकों से पेट्रोल एवं डीजल की आपूर्ति के समय वसूले जाने वाले मूल्य में भी असमानता देखी गई है। मसलन, अप्रैल में पेट्रोल और डीजल के शोधन पर रिफाइनरियों की लागत एवं ढुलाई व्यय क्रमश: 31.08 और 33.16 रुपये प्रति लीटर था। लेकिन सितंबर के अंतिम सप्ताह में पेट्रोल एवं डीजल दोनों के लिए कच्चे माल की लागत एवं ढुलाई व्यय 27-28 फीसदी बढ़ चुका है।  लेकिन रिफाइनरियों ने वितरकों से वसूले जाने वाले भाव में बढ़ोतरी इस अनुपात में नहीं की है। पेट्रोल एवं डीजल के वितरक खरीद मूल्य में क्रमश: 20-21 फीसदी बढ़ोतरी ही हुई है। इससे पता चलता है कि तेल रिफाइनरियों ने अपने मार्जिन में पहले से ही कटौती कर रखी है। अप्रैल में रिफाइनरियां पेट्रोल-डीजल दोनों पर प्रति लीटर 4 रुपये का मार्जिन वसूलती थीं लेकिन सितंबर के अंत में यह घटकर 2-3 रुपये पर आ गया है। इस तरह रिफाइनरियों ने कच्चे तेल कीमतों में हुई तीव्र बढ़ोतरी का कुछ बोझ खुद भी उठाया है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि रिफाइनरियों ने ऐसा कदम स्वैच्छिक रूप से उठाया है। उन्हें सरकार की तरफ से इसके लिए निर्देश दिया गया होगा। सार्वजनिक तेल रिफाइनरियों को कीमत निर्धारण पर भला कितनी आजादी मिलती है?
 
तीसरी प्रवृत्ति, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव डालना शुरू कर दिया है। केरोसिन एवं रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल बढ़ता जा रहा है। अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में पेट्रोलियम सब्सिडी बिल बढ़कर 414 अरब रुपये तक हो जाएगा जो 2017-18 के 255 अरब रुपये की तुलना में 62 फीसदी अधिक होगा। सरकार ने वर्ष 2018-19 के लिए 249 अरब रुपये के पेट्रोलियम सब्सिडी का ही प्रावधान किया था। सरकार का अनुमान था कि कच्चा तेल 65 डॉलर प्रति बैरल और रुपया प्रति डॉलर 65 रुपये के आसपास ही रहेगा। लेकिन सरकार के ये दोनों अनुमान गलत साबित हो चुके हैं। ऐसे में राजकोषीय घाटे पर असर पडऩा लाजिमी है।
 
ऐसी स्थिति में सरकार क्या कर सकती है? पेट्रोल एवं डीजल पर लागू उत्पाद शुल्क में किसी भी तरह की कटौती करने से सरकारी खजाने पर तगड़ा बोझ पड़ेगा। इनको जीएसटी के दायरे में लाने का कदम काफी सोच-समझ कर उठाना होगा क्योंकि केंद्र एवं राज्यों के राजस्व में इन उत्पादों की व्यापक निर्भरता को देखते हुए कर संग्रह पर इस कदम का व्यापक असर पड़ेगा। इस स्तर पर तीन उपायों पर विचार किया जा सकता है। रिफाइनरियों का लागत एवं ढुलाई मूल्य व्यापार-अनुरूपता आधारित फॉर्मूले से तय होता है जिसमें पेट्रोल एवं डीजल के आयात एवं निर्यात मूल्यों को 80:20 के अनुपात में रखा जाता है। समय आ गया है कि ऐसे अक्षम एवं सुस्त मूल्य-निर्धारण फॉर्मूले को तिलांजलि दी जाए। इसके बजाय लागत-आधारित पारदर्शी फॉर्मूला अपनाना चाहिए। यह अधिक कारगर प्रणाली होगी जिससे पेट्रोल एवं डीजल पर लागत एवं ढुलाई मूल्य भी कम हो सकेगा। ऐसा होने पर उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। 
 
दूसरा, जीएसटी परिषद को यह संभावना परखनी चाहिए कि राज्य पेट्रोल एवं डीजल पर एक खास दर से वैट लगाने के लिए राजी हो जाएं। केंद्र से आरोपित उत्पाद शुल्क एक खास दर पर ही लगता है। अगर राज्यों ने पेट्रोल-डीजल पर अपने वैट को एक खास दर से ही लगाया होता तो इनकी खुदरा कीमतें मौजूदा स्तर से 2-3 फीसदी कम होतीं। अभी भी जीएसटी परिषद के लिए राज्यों को विशिष्ट वैट दर के बारे में राजी करने में अधिक देर नहीं हुई है। अंत में, सरकार को यह मान लेना चाहिए कि तेल अर्थव्यवस्था के लिए परंपरावादी बजट बनाना ही सही है। तेल अर्थव्यवस्था के लिए आक्रामक बजट निर्धारण करने से राजकोषीय जोखिम बढऩे की आशंका होती है। अगर वित्त वर्ष 2018-19 के लिए भी परंपरावादी बजट बनाया गया होता तो ऐसे जोखिमों से बचा जा सकता था।
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