बिजनेस स्टैंडर्ड - एलआईसी का खुलेआम हो रहा दुरुपयोग
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एलआईसी का खुलेआम हो रहा दुरुपयोग

जैमिनी भगवती /  September 28, 2018

भारी कर्ज में डूबी आईएलऐंडएफएस को संकट से निकालने के लिए एलआईसी का इस्तेमाल इस सरकारी कंपनी को मूल मकसद से भटका सकता है। बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
समय बीतने के साथ भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) नाकामी के कगार पर जा पहुंचे बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) में निवेश के लिए आखिरी पनाह साबित हुआ है। एलआईसी की बीमा एवं अन्य योजनाओं में निवेश करने वालों को अब अपेक्षाकृत कम दर पर रिटर्न मिल रहा है। इसकी वजह यह है कि भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी एलआईसी आईडीबीआई बैंक और आईएलऐंडएफएस जैसे संस्थानों में निवेश कर अक्षम संस्थानों को आर्थिक मदद दे रही है। बीमा कंपनी होने के नाते एलआईसी का नियमन भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) करता है। बीमाधारकों के हितों का संरक्षण और बीमा उद्योग का नियमन, संवद्र्धन एवं इसकी व्यवस्थित प्रगति को सुनिश्चित करना आईआरडीएआई का मकसद है। एलआईसी की सबसे पहली प्राथमिकता अपने मौजूदा बीमाधारकों को सक्षम सेवाएं एवं उनके निवेश का बेहतर रिटर्न मुहैया कराने की होनी चाहिए। लेकिन इसके बजाय सरकार एलआईसी को अवांछित जोखिम लेने के लिए मजबूर कर रही है और आईआरडीएआई भी इसमें भागीदार बनी हुई है। एलआईसी का बैंकों, वित्तीय संस्थानों और सूचीबद्ध एवं गैर-सूचीबद्ध दोनों ही तरह की कंपनियों में इक्विटी हिस्सेदारी है। 
 
एलआईसी की प्रबंधन के अधीन परिसंपत्ति का कुल आकार करीब 22 लाख करोड़ रुपये है और यह समूची राशि बीमा पॉलिसी एवं योजनाओं में निवेश करने वालों के जरिये आई है। भारत के बीमा बाजार के करीब 70 फीसदी हिस्से पर एलआईसी का कब्जा है और अगर यह शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई रहती तो सबसे बड़ी भारतीय कंपनी होती। एलआईसी के निवेश का एक बड़ा हिस्सा सरकारी बॉन्ड में है। लिहाजा शेयरों में निवेश कर एलआईसी के निवेश पोर्टफोलियो को विविधीकृत करना तर्कसंगत कदम लगता है। लेकिन इस सरकारी कंपनी ने ऐसे कई सार्वजनिक बैंकों एवं संस्थानों में निवेश कर रखा है जो तरलता एवं दिवालिया होने के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। अपने असली उद्देश्य से एलआईसी के अलगाव का यह प्रत्यक्ष संकेत है।
 
तथ्यों से पता चलता है कि जब शेयर बाजार बिकवाली के दबाव में होते हैं तो भारत सरकार एलआईसी को खरीदारी का निर्देश देती है। अगर बैंक या लंबी अवधि के कर्जदाता संस्थानों को पूंजी की जरूरत होती है तो एलआईसी को ही आगे आने को कहा जाता है। एलआईसी के दखल देने से बाजार की धारणा प्रभावित होती है क्योंकि यह थोक में शेयरों की खरीद या बिक्री करती है। ऐसी अटकलें हैं कि कुछ निवेशकों को पहले ही पता चल जाता है कि एलआईसी खास शेयरों की खरीद या बिक्री करने वाली है। आरोप है कि ये रहस्यमयी इकाइयां एलआईसी की खरीद या बिक्री के थोड़ा पहले उतने ही शेयरों की खरीद या बिक्री करती हैं। बाजार नियामक सेबी को 'फ्रंट रनिंग' की पड़ताल कर यह पता लगाना चाहिए कि क्या पिछले 15-20 वर्षों में एलआईसी की खरीद-बिक्री के पहले दूसरे निवेशकों ने भी खरीद-बिक्री की है?
 
यह दलील दी जा सकती है कि एलआईसी को मुश्किल में फंसे सार्वजनिक बैंकों का समर्थन करना चाहिए क्योंकि इन बैंकों के निवेशकों को संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। जनवरी 2018 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने आईडीबीआई बैंक और किंगफिशर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। विजय माल्या के स्वामित्व वाली किंगफिशर एयरलाइंस को करीब 9 अरब रुपये का कर्ज देने के लिए ऋण सीमा मानकों की अवहेलना का आरोप आईडीबीआई पर लगा था। घोटाले में फंसे आईडीबीआई बैंक को फंड मुहैया कराना एलआईसी के पॉलिसीधारकों के हित में नहीं हो सकता है। 
 
एलआईसी के पास आईएलऐंडएफएस के 25.3 फीसदी शेयर हैं और यह इस कंपनी की सबसे बड़ी एकल शेयरधारक है। एनबीएफसी कंपनी होने से आईएलऐंडएफएस जमा नहीं ले सकता है। ऐसे में यह दलील भी नहीं दी जा सकती है कि जमाकर्ताओं के हित संरक्षित रखने के लिए उसे समर्थन की जरूरत थी। इसके अलावा आईएलऐंडएफएस एक निजी फर्म है जो इसके शीर्ष अधिकारियों को मिलने वाले मोटे वेतन पैकेज से उजागर भी होता है। वित्त वर्ष 2017-18 में इसके चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और संयुक्त मुख्य कार्याधिकारी को क्रमश: 9.2, 7.0 और 6.1 करोड़ रुपये का सालाना वेतन मिला था। आईएलऐंडएफएस के शीर्ष प्रबंधकों को मिले वेतन की तुलना में एलआईसी एवं एसबीआई के चेयरमैन को क्रमश: 90 लाख और 30 लाख रुपये ही वेतन के तौर पर मिले थे। आईएलऐंडएफएस पर 90 हजार करोड़ रुपये की कर्ज देनदारी है और उसने एक छोटे हिस्से में ही चूक की है। इसकी तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) दस गुने से भी अधिक करीब 10 लाख करोड़ रुपये हैं। आईएलऐंडएफएस को कर्ज देने वाले संस्थानों को यह पता रहा होगा कि दीर्घावधि कर्ज के जोखिम भी अधिक होते हैं। म्युचुअल फंडों को चार साल पहले ही आईएलऐंडएफएस में निवेश धीमा कर देना चाहिए था। उस समय भारतीय रिजर्व बैंक के संशोधित दिशानिर्देशों के मुताबिक लंबी परिपक्वता अवधि वाले बैंक ऋण को एनपीए के तौर पर दिखाना शुरू हो चुका था।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की है जिसके जरिये करीब 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा देने का लक्ष्य है। फिर भी ऐसे बहुतेरे लोग हैं जिन्हें जीवन बीमा एवं अन्य तरह की बीमा की जरूरत होगी। ऐसे में एलआईसी को अपना दायरा बढ़ाने की कोशिशें बढ़ा देनी चाहिए। अगर एलआईसी ने अपनी वित्तीय क्षमता का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया है तो वह म्युनिसिपल बॉन्ड में निवेश कर दीर्घावधि के बॉन्ड बाडार में तरलता को प्रोत्साहित कर सकती है।
 
मीडिया रिपोर्टों से बेहद चिंताजनक जानकारी मिली है। गत 25 सितंबर को वित्त मंत्री की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में यह फैसला लिया गया कि एलआईसी और एसबीआई संकटग्रस्त आईएलऐंडएफएस को अतिरिक्त वित्तीय मदद देंगी। मीडिया में मची हायतौबा के बावजूद आईएलऐंडएफएस को अगर अपने बलबूते कर्ज देनदारियां चुकाने के लिए छोड़ दिया जाता है तो भी वित्तीय बाजार में व्यवस्थागत नाकामी का कोई खतरा नहीं है। हाल में शेयरों के भाव गिरे हैं और रुपये के मूल्य में भी गिरावट आई है। दरअसल इक्विटी बाजार काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे और रुपये का भी काफी अधिमूल्यन हो गया था। लेकिन यह स्थिति आईएलऐंडएफएस को अधिक वित्तीय मदद देने में एलआईसी एवं एसबीआई काअधिक दुरुपयोग करने में रिजर्व बैंक एवं आईआरडीएआई को भागीदार बनाने का औचित्य नहीं साबित करती है। 
 
इसके बजाय  आईएलऐंडएफएस में 23.5 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली जापानी कंपनी ओरिक्स कॉर्पोरेशन को अपना समर्थन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता था। ऐसा करने से इस एनबीएफसी कंपनी के वित्त को लेकर अधिक पारदर्शिता का भी माहौल बनता। निष्कर्ष के तौर पर कहें तो वित्त मंत्रालय को आईडीबीआई बैंक और आईएलऐंडएफएस जैसे वित्तीय संस्थानों को अपने बूते छोड़ देना चाहिए। अगर बहुत जरूरी लगे तो रिजर्व बैंक के जरिये व्यवस्थित तरीके से इसे संभाला जा सकता है।
 
(लेखक इक्रियर में आरबीआई पीठ के प्रोफेसर हैं)
Keyword: IL&FS, fund, share, LIC, sidbi, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस सर्विसेज,
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