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तेल का अपशगुन

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 28, 2018

वर्ष 2014 के मध्य में जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, तब ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल पर था। जनवरी 2016 में यह घटकर 29 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। इसके बाद इसमें दोबारा तेजी का दौर आया और एक वर्ष पहले यह 50 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार कर गया था। दिसंबर 2017 तक यह 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गया था। बीती मई में यह 70 डॉलर और अब 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर है। तमाम लोग अनुमान लगा रहे हैं कि ईरान पर प्रतिबंध लागू होने के बाद यह 100 डॉलर का स्तर पार कर जाएगा। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि 2019 में यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो हम एक बार फिर वहीं पहुंच जाएंगे जहां से हमने शुरुआत की थी। इस बीच डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा है और करों में इजाफा हुआ है, ऐसे में पेट्रोल ही नहीं डीजल की कीमत भी 100 रुपये प्रति लीटर तक जा सकती है। 

 
जब भी तेल कीमतों ने झटका दिया है, देश की अर्थव्यवस्था इससे प्रभावित हुई है। अक्सर यह अन्य कारकों के मेल से भी हुआ है। वर्ष 1973-74 में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत खराब फसल उत्पादन वाले वर्ष में अचानक एक साल के भीतर दोगुनी बढ़ गई थी और मौजूदा मूल्य के हिसाब से 46 डॉलर हो गई थी (सारे मूल्य डॉलर के 2017 के मूल्य से हैं ताकि गणना में सुविधा हो)। उस समय देश की वृद्घि दर लुढ़क गई थी और मुद्रास्फीति की दर में तेजी से इजाफा हुआ था। तेल का दूसरा झटका सन 1979-80 में लगा जब तेल कीमत 111 डॉलर तक गई। उस वर्ष भी उपज खराब थी और जीडीपी पर नकारात्मक असर देखने को मिला। वह 5 फीसदी तक घट गया। 
 
तीसरा झटका प्रथम इराक युद्घ के समय अल्पावधि की मूल्यवृद्घि से लगा था। सन 1990 में कच्चे तेल का औसत मूल्य 43 डॉलर प्रति बैरल था लेकिन उतने भर से देश सन 1990-91 के विदेशी मुद्रा विनिमय के संकट का शिकार हो गया था। वर्ष 2008 का तेल का झटका (औसत मूल्य 104 डॉलर, जबकि उच्चतम स्तर कहीं अधिक था) उसी वर्ष आए वित्तीय संकट के साथ आया था। इसी वजह से जीडीपी वृद्घि में तेज गिरावट देखने को मिली। तेल कीमतें वर्ष 2011 से 2014 तक लगातार ऊंची बनी रहीं। इस पूरी अवधि में कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहीं और देश का चालू खाते का घाटा वर्ष 2012-13 में जीडीपी के 4.8 फीसदी तक जा पहुंचा। यह एक दशक का निम्रतम स्तर था। अगर अनुमान लगाने वाले सही हुए और तेल कीमत 100 या 120 डॉलर तक पहुंची तो हम छठी बार झटके के शिकार हो सकते हैं। यानी अर्थव्यवस्था को छठा झटका। व्यापार घाटा, मुद्रास्फीति, रुपये का बाह्य मूल्य और आर्थिक वृद्घि सभी दबाव में आ सकते हैं। 
 
चालू खाते का घाटा पहले ही जीडीपी के 3 फीसदी के साथ जोखिम के क्षेत्र में है और आगे और बढ़ सकता है। रुपये में और गिरावट आ सकती है। अगर सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर कर कम करके उपभोक्ताओं पर से दबाव हटाती है तो राजस्व का नुकसान राजकोषीय आंकड़ों को क्षति पहुंचाएगा। मुद्रास्फीति बढ़ी और आरबीआई मुद्रास्फीति के अपने लक्ष्य पर टिका रहा तो उच्च ब्याज दर निवेश और खपत को प्रभावित करेगी। इससे वृद्घि दर में धीमापन आएगा। तेल के कारण लगे पिछले हर झटके के वक्त या तो सरकार बदली या राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ। सन 1973-74 में तेल के  झटके के बाद कई घटनाएं घटीं। मुद्रास्फीति बढ़ी, फिर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छिड़े आंदोलन के बाद सन 1975 में आपातकाल लगा। केवल 2009 के झटके के वक्त राजनीतिक बदलाव नहीं हुआ, उस वक्त मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने। 
 
क्या सरकार उठापटक के लिए तैयार है? अल्पावधि में कुछ खास कर पाना मुश्किल है। यही वजह है कि अब तक घोषित कदम सीमित हैं। इस वर्ष के आरंभ में की गई शुल्क वृद्घि जैसे कुछ कदम अनावश्यक भी रहे। जनवरी से अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया 13 फीसदी गिर चुका है और घरेलू उत्पादकों को आयात से पहले ही अच्छा संरक्षण मिल रहा है। ऐसे में उच्च शुल्क दर नुकसान ही पहुंचाएगी। यह बात पहले से ही संकटग्रस्त विमानन क्षेत्र को और तकलीफ में डाल रही है। सबसे अहम बात यही है कि ईरान से तेल खरीदना जारी रखा जाए या नहीं। ईरान पर लगे प्रतिबंध से तेल कीमतों में इजाफा हो रहा है। ईरान से तेल खरीदना जारी रखने से कीमतों में नरमी आ सकती है लेकिन यह अमेरिकी प्रतिबंधों को न्योता दे सकता है। क्या देश इसके लिए इच्छुक है? 
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