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अर्थव्यवस्था को संभालने में मोदी से हुई बड़ी देर

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 27, 2018

महज चार महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में एक लंबा भाषण दिया था। उस भाषण में मोदी ने कहा था कि उनके पद संभालने के समय अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही खराब थी। उन्होंने कहा था कि भारत को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने नाजुक हालत वाले देशों की सूची 'फ्रैजाइल फाइव' में रखा हुआ था। लेकिन मोदी की मानें तो उनकी सरकार ने भारत को उस स्थिति से उबार लिया और अब अर्थव्यवस्था नाजुक हाल में नहीं है। उनके इस बयान का सत्ता पक्ष ने मेजें थपथपा कर स्वागत किया था।

 
इसके 16 हफ्ते बाद ही हालात अगर खराब नहीं तो कम आकर्षक जरूर हो चुके हैं। रोजगार, कृषि और निर्यात के मोर्चे पर चली आ रही दीर्घकालिक संरचनात्मक समस्याओं की बात छोडि़ए, रोजमर्रा के आर्थिक मसले भी बड़े हो चुके हैं। अनिश्चित महंगाई, गिरता हुआ रुपया, उच्च ब्याज दरें और जीएसटी मद में राजस्व का कम संग्रह जैसे मसले खड़े हो चुके हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि मोदी सरकार भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली की तरह नजर आ रही है जो हाल ही में एक टेस्ट मैच में 86 रन पर छह विकेट गिराने के बावजूद इंगलैंड को 300 रन से ऊपर बनाने से नहीं रोक पाए। समस्या यह थी कि कोहली ने ऑफ स्पिनर आर अश्विन पर एकतरफा दांव लगाया था लेकिन वह उस उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाए। इस वजह से कोहली मैच पर अपनी पकड़ गंवा बैठे और अंत में वह मैच भी हारना पड़ा। इसी अंदाज में मोदी सरकार के आर्थिक प्रबंधक भी अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के नीचे रहने पर एकतरफा दांव लगाते नजर आते हैं। लेकिन जैसे ही तेल की कीमतें बढऩी शुरू हुईं, हालात सरकार के हाथ से फिसलते चले गए। मई में मजबूत स्थिति में रही भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ी अनिश्चितता का दौर शुरू हो चुका है और ऐसे समय में मोदी ने मामले को सीधे अपने हाथ में ले लिया है। 
 
लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच रवि शास्त्री की तरह वह भी मैदान पर हालात काबू में करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बात नहीं बनी। अर्थव्यवस्था की निगरानी का मोदी का फैसला भी एक सीमा के बाद कारगर नहीं होगा। उन्होंने काफी देर कर दी है। मोदी सरकार ने लंबे समय तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने के लिए तेल की कम कीमतों, जीएसटी मद में अधिक राजस्व संग्रह और कम महंगाई पर भरोसा किया हुआ था। सरकार अंतिम दो बिंदुओं पर तो काबू पा सकती है लेकिन पहला बिंदु उसके दायरे से बाहर ही है। 
 
जीएसटी के क्रियान्वयन में पैदा हुई अड़चनें असल में इस कानून के निर्माण में ही निहित रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अप्रैल के बाद से ही जीएसटी राजस्व में करीब 10,000 करोड़ रुपये की मासिक कमी होती रही है। लेकिन सरकार ने क्षतिपूर्ति उपकर मद में जमा 90,000 करोड़ रुपये की राशि को सहारा बनाते हुए हालात संभालने की कोशिश की है। अगर नकदी आपूर्ति वृद्धि को संवेदनशील तरीके से संभाला जाए तो मुद्रास्फीति के मोर्चे पर कायम अनिश्चितता को भी संभाला जा सकता है। कृषि क्षेत्र से होने वाली आपूर्ति में झटका लगने की आशंका इस साल के लिए तो फिलहाल दूर हो गई है।
 
लेकिन वैश्विक तेल कीमतों के मामले में कहानी अलग है। वे भारत में घरेलू नीतियों के हिसाब से नहीं चलती हैं। पूरी आशंका है कि निकट भविष्य में तेल कीमतों में बढ़ोतरी ही होगी क्योंकि पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन में कटौती का फैसला किया हुआ है। प्रमुख तेल उत्पादक देश ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भी तेल आपूर्ति बाधित हो रही है। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था कच्चे तेल की कड़ाही में पड़ी हुई है।  जब भी आप एकतरफा दांव लगाते हैं तो इस तरह की स्थिति पैदा होना लाजिमी है। असल में आप यह दांव इस सोच के चलते लगाते हैं कि कोई भी प्रक्रिया एक दिशा में ही चलती है। लेकिन जब यह सोच गलत साबित होती है तो आपकी हालत काफी बदतर हो जाती है। तेल कीमतों के मामले में मोदी सरकार की हालत ऐसी ही है।
 
बाजी लगाने के मसले पर तमाम गणितीय एवं सांख्यिकीय शोध हुए हैं। सभी अध्ययनों से केवल इतना ही पता चलता है कि यह मान लेना गलत है कि अनुमानित स्थिति से उलटी स्थिति पैदा नहीं हो सकी है और न ही पैदा होगी।  सवाल उठता है कि 2015-17 के दौरान जब तेल कीमतें निचले स्तर पर थीं तो उस समय मोदी सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए थे? सरकार को भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई बी रेड्डी से कुछ सीख लेनी चाहिए थी। रेड्डी ने वर्ष 2003-08 के दौरान अनुकूल वित्तीय परिवेश का इस्तेमाल सार्वजनिक बैंकों का पूंजी भंडार बनाने में किया था। भारत को 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट से निपटने में उनकी इस दूरदर्शी नीति का फायदा हुआ था।
 
इसी तरह मोदी सरकार को भी कुछ कदम उठाने चाहिए थे। पहला, पिछले तीन वर्षों में सरकार को रुपये की कीमत गिरने देनी चाहिए थी ताकि आयात अधिक महंगा और निर्यात अधिक प्रतिस्पद्र्धी हो सके। दूसरा, सरकार को रणनीतिक तेल भंडार का आकार बढ़ाना चाहिए था जो महज 60 लाख टन ही है। सरकार को इसे बढ़ाकर दोगुना करना चाहिए था। अब उठाए गए नीतिगत कदमों को लेकर केवल यही कहा जा सकता है कि ये देरी से उठाए गए हैं। यह देरी भाजपा को 2019 के चुनाव में राजनीतिक रूप से काफी महंगी पडऩे वाली है क्योंकि मतदाताओं का हरेक तबका पेट्रोल, डीजल और आयातित उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढऩे से गुस्से में है। वृहद आर्थिक मसलों पर अधिक ध्यान नहीं देने का संकेत देने वाले मोदी को आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए मिल रही सलाहों की गुणवत्ता पर हम केवल अचरज ही जता सकते हैं। लेकिन मोदी को अब इन मसलों की अहमियत का अंदाजा बड़े ही कठोर अंदाज में होने वाला है।
Keyword: india, economy, narendra modi,,
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