बिजनेस स्टैंडर्ड - तकनीक की दुनिया में आसन्न संकट
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 23, 2018 12:24 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

तकनीक की दुनिया में आसन्न संकट

अजित बालकृष्णन /  September 27, 2018

कृत्रिम बुद्धिमत्ता में अत्याधुनिक गणना का इस्तेमाल खूब होता है। लेकिन इन गणनाओं पर आधारित निर्णय की सटीक व्याख्या कर पाना खासा मुश्किल है। बता रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
न्यूयॉर्क सिटी में पिछले हफ्ते एक सम्मेलन में एकत्र हुए हजारों तकनीकी विशेषज्ञों में वक्ता की बात सुनते ही गहरा सन्नाटा छा गया था। उस वक्ता ने कहा था, 'आप ऋण के लिए किए गए आवेदन को खारिज करते हैं और आवेदक उसकी वजह पूछता है तो अगर आप यह जवाब देते हैं कि गणना पद्धति (अल्गोरिद्म) के चलते उसका आवेदन निरस्त हुआ है तो आप नियामकीय मुश्किल में फंस सकते हैं।' कर्ज आवेदन की मंजूरी, शेयरों की खरीद-बिक्री के बारे में निर्णय करने और स्वास्थ्य देखभाल से संबंधित मामलों में नतीजे तक पहुंचने में अल्गोरिद्म अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अल्गोरिद्म-जनित फैसलों पर 'स्पष्टीकरण' की औचक मांग कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा विश्लेषकों को आसमानी आफत की तरह लगी।
 
इस बहस के संदर्भ में सांख्यिकीय गणना के शुरुआती दौर की तरफ लौटना अहम है। सांख्यिकीय पद्धतियां ही आज के मशीन लर्निंग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के केंद्र में हैं। ब्रिटिश सांख्यिकीविद कार्ल पियर्सन ने  सांख्यिकी के 'सहसंबंध गुणांक' का जिक्र किया था। आज भी स्कूली स्तर पर सांख्यिकी पढऩे वाले छात्र पियर्सन की इस धारणा से अवगत होते हैं। मसलन, यह अवधारणा यह तय करने में मदद करती है कि इंसानों में उम्र के साथ ग्लूकोज का स्तर बढ़ता जाता है। अलग उम्र वाले करीब दर्जन भर लोगों के रक्त में ग्लूकोज स्तर के आधार पर हमें यह गणना करने में मदद मिलती है कि उम्र और ग्लूकोज के बीच क्या कोई सहसंबंध है? पियर्सन ने 1880 के दशक में कई अन्य अवधारणाएं भी दीं जो सांख्यिकी की बुनियाद साबित हुईं। आज भी प्रमुख अवयव विश्लेषण, ची-स्क्वेयर परीक्षण और बार चार्ट विश्लेषण (हिस्टोग्राम) जैसे मशीन लर्निंग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी अनुप्रयोगों में पियर्सन की अवधारणाएं कारगर साबित हो रही हैं। जिन सांख्यिकीय उपादानों का हम आज भी प्रमुखता से उल्लेख करते हैं, उनका इस्तेमाल मूलत: 'यूजेनिक्स' की कल्पित धारणा की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए किया गया था। 
 
यूजेनिक्स में माना जाता है कि इंसानी वजूद कई नस्लों से आया है और कुछ नस्लें श्रेष्ठ तो कुछ कमतर होती हैं। यह राय भी है कि कमतर नस्ल के इंसान को किसी भी प्रशिक्षण या शिक्षण से बेहतर नहीं बनाया जा सकता है। सांख्यिकी के शुरुआती वर्षों के बाद जैसे-जैसे बीसवीं सदी आगे बढ़ी, इस गणना पद्धति का इस्तेमाल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना करने में भी होने लगा। किसी भी देश या सरकार के अच्छे या बुरे प्रदर्शन का पैमाना जीडीपी का यह आंकड़ा ही माना जाता है। 1950 का दशक आते-आते सांख्यिकीविद नीति-निर्माण के शीर्ष पदों को सुशोभित करने लगे थे और उन्होंने ही पंचवर्षीय योजनाओं का खाका भी तैयार किया।
 
हालांकि 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में आर्थिक नियोजन के प्रति मोहभंग होने लगा था और उसके स्थान पर मुक्त बाजार एवं प्रतिस्पद्र्धा की दलीलें दी जाने लगी थीं। इस बदलाव के चलते सांख्यिकीविदों के लिए रोजगार के मौके भी कम होने लगे। लेकिन समकालीन दौर में सांख्यिकी में महारत रखने वाले युवा पुरुषों एवं महिलाओं को स्नातक के बाद ही मोटा वेतन मिलने लगा है। सांख्यिकी के नवीनतम स्वरूप मशीन लर्निंग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आविर्भाव के साथ यह प्रवृत्ति कई गुना बढ़ गई है। इन अत्याधुनिक अध्ययन शाखाओं के केंद्र में पियर्सन और उनके समकालीनों की अवधारणाएं ही हैं। सहसंबंध और प्रतिगमन जैसी पुरानी अवधारणाएं मौजूदा दौर में भी कारगर हैं।
 
लेकिन 19वीं सदी में ईजाद इन सांख्यिकीय उपादानों को दोबारा अहमियत मिलने के साथ ही स्पष्टीकरण का मसला भी प्रमुखता से उभरा है। सांख्यिकीय गणना पद्धति (अल्गोरिद्म) के जरिये पहुंचे गए निष्कर्ष की व्याख्या कर पाना मुश्किल साबित हो रहा है। कर्ज के लिए डाली गई किसी अर्जी को अल्गोरिद्म ने तो खारिज कर दिया लेकिन आवेदक केवल इतने स्पष्टीकरण से ही संतुष्ट नहीं होगा कि अल्गोरिद्म ने ऐसा किया है। फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स के मृदुल मिश्रा ने न्यूयॉर्क के उसी सम्मेलन में 'व्याख्या की क्षमता' के बारे में कुछ सुझाव दिए। पहला, उनका सुझाव था कि अगर अल्गोरिद्म में शामिल किए गए तथ्यों में कोई बदलाव होता है तो विरोधाभास को एक वजह बताया जा सकता है। इसे इस तरह समझते हैं, अगर आवेदक हर महीने अपने वेतन में से होने वाली बचत को 10 फीसदी दर से बढ़ाता जाता है तो अल्गोरिद्म कर्ज के लिए किए गए उसके आवेदन को स्वीकृत कर देता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो अल्गोरिद्म में उसके आवेदन को नकारे जाने की सफाई यह दी जा सकती है कि वह समुचित बचत नहीं कर रहा है। वह एक बढिय़ा व्याख्या के कई अन्य तरीके भी बताते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अल्गोरिद्म के जरिये पहुंचे गए नतीजे की व्याख्या करना भी अब अपने आप में एक उद्योग का दर्जा लेने लगा है।
 
अगर किसी निर्णय के पीछे की वजह की अच्छी तरह व्याख्या की जाती है तो कोई भी प्रभावित व्यक्ति उस पर एतराज नहीं जता सकता है। निकट भविष्य में मुझे कुछ रोचक बहसों की जमीन तैयार होती हुई दिख रही है। उदाहरण के लिए, अगर कैट परीक्षा में 85 फीसदी अंक हासिल करने वाले छात्र के आईआईएम में प्रवेश के लिए आवेदन को खारिज कर दिया जाता है तो हम उसे क्या जवाब देंगे? अगर वह छात्र प्रबंधन से इस फैसले के बारे में स्पष्टीकरण मांगता है तो क्या उसे यह जवाब दिया जाएगा कि कैट परीक्षा में ऊंचा स्कोर हासिल करने वाले छात्र के आईआईएम से पास होने के बाद एक बेहतर प्रबंधक बनने के सांख्यिकीय साक्ष्य हैं? (हालांकि इस मुद्दे पर अध्ययन करने के बाद मेरा यह मानना है कि कैट स्कोर और अच्छे प्रबंधक के बीच कोई सहसंबंध नहीं होता है।) इसी तरह के सवाल छंटनी करने वाली परीक्षाओं में हासिल अंकों को लेकर भी उठ सकते हैं। उस समय हमारे पास अच्छी व्याख्या क्या होगी? क्या यह जवाब दिया जाएगा कि हाई स्कूल की परीक्षा में मिले अंकों का माता-पिता के साक्षरता स्तर और न्यूनतम आय स्तर से भी सहसंबंध है? अगर यह सही साबित होता है तो क्या हाई स्कूल परीक्षा के अंक एक छात्र के सामाजिक मूल का मापक भी हैं?
 
वर्तमान में इस तरह की बहस तकनीकी दुनिया से संबंधित सम्मेलनों तक ही सीमित हैं लेकिन आने वाले समय में मुझे बहस और संघर्षों का रोचक दौर नजर आ रहा है। वह दिन भी आ सकता है जब अदालतें अल्गोरिद्म के जरिये किए गए फैसले की बढिय़ा व्याख्या देने को भी कह सकती हैं।
 
(लेखक 'द वेव राइडर, ए क्रॉनिकल ऑफ द इन्फॉर्मेशन एज' के रचयिता हैं)
Keyword: digital, AI, कृत्रिम बुद्धिमत्ता,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सीबीआई विवाद से सरकार की साख पर पड़ेगा असर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.