बिजनेस स्टैंडर्ड - सीईओ के मोटे वेतन से कंपनी जगत में बढ़ती असमानता
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, December 14, 2018 04:59 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सीईओ के मोटे वेतन से कंपनी जगत में बढ़ती असमानता

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  September 26, 2018

ऐसा लगता है कि ढांचागत क्षेत्र की इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस कंपनी (आईएलऐंडएफएस) खराब कंपनी प्रबंधन में फोर्टिस हेल्थकेयर और आईसीआईसीआई बैंक को धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही है। तीनों मामलों में टिप्पणीकारों ने कंपनी बोर्ड पर अपने दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरतने की ओर इशारा किया है। लेकिन आईएलऐंडएफएस के भीतर हुए धमाके ने भारतीय कंपनी जगत में कहीं अधिक गहराई तक जड़ें जमा चुके एक नैतिक संकट को भी रेखांकित किया है। वह संकट है: वरिष्ठ प्रबंधक कंपनी के प्रदर्शन से बेपरवाह होने के बावजूद खुद को इनाम देने में अधिक रुचि दिखाते हैं और यह काम वे कर्मचारियों और शेयरधारकों की कीमत पर करते हैं।

 
आने वाले महीनों में बड़े भुगतान संकट की ओर बढ़ रही आईएलऐंडएफएस वित्त वर्ष 2015-16 से ही खतरे में रही है। वर्ष 2017-18 में इसका घाटा बढ़कर करीब 2,100 करोड़ रुपये हो गया था। ऐसी स्थिति में कोई भी यही सोचेगा कि वरिष्ठ प्रबंधन को खुद ही अपने मोटे वेतन बिल में कटौती का फैसला करना चाहिए था। लेकिन इसके ठीक उलट हुआ। करीब तीन दशकों तक इस कंपनी की बागडोर संभालते रहे रवि पार्थसारथि की छवि एक महापुरुष जैसी बन चुकी थी। आर्थिक संकट के इस दौर (2015-18) में भी पार्थसारथि के वेतन एवं भत्तों के मद में 58 फीसदी की जोरदार उछाल देखने को मिली। इसी समय  कंपनी के वाइस चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हरि शंकरन का वेतन 64 फीसदी बढ़ गया। हालांकि कंपनी के संयुक्त मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) अरुण साहा का वेतन महज 14 फीसदी ही बढ़ा।
 
आईएलऐंडएफएस के बारे में समाचार वेबसाइट 'द वायर' पर  विवेचनात्मक रिपोर्ट लिखने वाले हेमिंद्र हजारी भी अपने लेख में कंपनी के निदेशक मंडल की नियुक्ति एवं पारिश्रमिक समिति की स्तब्धकारी निष्क्रियता का जिक्र करते हैं।  हालांकि आईएलऐंडएफएस अलहदा नहीं है। सीईओ के वेतन के बारे में बिज़नेस स्टैंडर्ड के हाल ही में प्रकाशित सर्वे को सरसरी तौर पर भी देखें तो पता चलेगा कि भारतीय कंपनियों के वरिष्ठ प्रबंधक अपनी वेतन बढ़ोतरी को कंपनी के प्रदर्शन से अलग रखकर अपनी अंतरात्मा पर कोई बोझ नहीं महसूस करते हैं। बड़ी तस्वीर थोड़ी परेशान करने वाली है। वित्त वर्ष 2015-16 और 2017-18 के बीच सीईओ के वेतन में हुई वृद्धि ने इस दौरान शुद्ध बिक्री और शुद्ध लाभ में हुई वृद्धि को अच्छे खासे मार्जिन से पीछे छोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि केवल शेयरधारकों को ही इसका खमियाजा भुगतना पड़ा, कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और बोनस में भी बढ़ोतरी सीईओ की तुलना में प्रतिकूल रही। 
 
मानक अवधारणा यह है कि कॉर्पोरेट परिलब्धियों में इस तरह की विरोधाभासी प्रवृत्ति का परिवारों के स्वामित्व वाली कंपनियों के वर्चस्व के बीच होना अपेक्षित है। लेकिन सूचीबद्ध कंपनियां भी इस प्रवृत्ति से कुछ खास अलग नहीं नजर आती हैं। यह अलग बात है कि कई तरह की समीक्षाओं के दायरे में आने के चलते ये कंपनियां इस झुकाव की तरफ कम मुखर होती हैं। इस तरह अमर राजा बैटरीज के सीईओ का वेतन उसके मुनाफे का 13 फीसदी था वहीं लार्सन ऐंड टुब्रो के मामले में यह आंकड़ा 2.4 फीसदी ही था। इसके बावजूद एलऐंडटी के ए एम नाइक वेतन के मामले में भारत के शीर्ष कंपनी प्रबंधकों की सूची में शामिल थे।
 
सीईओ के मेहनताने में इस तीव्र बढ़ोतरी की कोई सीमा भी नहीं दिख रही है। सुधारों के बाद के दौर में हमें यह देखने को मिला कि सीईओ के वेतन वैश्विक स्तर पर जा पहुंचे हैं। गरीबी और असमानता से भरे देश के बावजूद भारत की कंपनियों के सीईओ के वेतन वैश्विक सूचकांकों के करीब पहुंचते जा रहे हैं। आज के समय में भारत में काम का अनुभव रखने वाले भारतीय सीईओ भी विदेश से लाए जा रहे सीईओ के बराबर खड़े हैं। ऐसे में ब्लूमबर्ग के उस आंकड़े को देखकर कोई अचरज नहीं होता है जिसके मुताबिक भारत में कर्मचारियों और सीईओ के वेतन का फर्क अमेरिकी फासले को भी पार कर गया है।
 
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 11 साल पहले उद्योग संगठन सीआईआई के एक कार्यक्रम में यह आह्वान कर सनसनी ही मचा दी थी कि कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन को खुद को उदारतापूर्वक लाभान्वित करने की चाहत से परहेज करना चाहिए। इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई जाने लगी थीं लेकिन मनमोहन सरकार इस सिलसिले में कोई कानून लेकर नहीं आई थी। हालांकि कंपनी अधिनियम 2013 में यह प्रावधान किया गया है कि कंपनी के लाभ के 11 फीसदी से अधिक राशि शीर्ष प्रबंधन को वेतन के तौर पर देने के पहले सरकार की मंजूरी लेनी जरूरी है। लेकिन लगता है कि यह प्रावधान भी कंपनी के शीर्ष प्रबंधन को खुद पर सदाशयता जताने से नहीं रोक पा रहा है। गत दिनों जारी एक अधिसूचना में भी इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि वरिष्ठ प्रबंधन को तय सीमाओं से अधिक वेतन देने के लिए शेयरधारकों की मंजूरी भी लेनी जरूरी होगी। भारत में कंपनियों के भीतर लोकतंत्र की कमजोर प्रकृति को देखते हुए सीईओ के वेतन पर शायद ही इसका कोई असर पड़े। 
 
मुक्त बाजारों की इस दुनिया में कर्मचारियों और शेयरधारकों के पास किसी भ्रष्टाचारी कंपनी से निकलने का विकल्प सिद्धांत रूप में ही मिला होता है। ऐसे में सीईओ के मोटे वेतन पर एतराज जताने का क्या वाकई में कोई मतलब रह जाता है? बेहद अमीर व्यक्तियों को मिलने वाली कर छूट सीईओ को भी दिए जाने की दलील दी जाती है। अमीर लोग तो अपने पास रखी अतिरिक्त नकदी को शेयर बाजारों और वित्तीय समाधानों में लगाते हैं जिससे उनकी समृद्धि और बढ़ती है। लेकिन अमीरी के पैमाने पर नीचे रहने वाले लोग अपनी कमाई के अतिरिक्त हिस्से को स्पा, कारों और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों जैसी चीजों पर लगाते हैं जिनमें वृद्धि की कोई संभावना नहीं होती है। ऐसा लगता है कि असमानता की शुरुआत भारतीय कॉर्पोरेट जगत से ही होती है। 
Keyword: IL&FS,company, CEO, directors, salary, share,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या चुनावी नतीजों से जीएसटी परिषद में बन पाएगी आम सहमति?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.