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नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को लेकर नई चिंताएं

अरुणाभ घोष /  September 26, 2018

भारत के पास नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक छाप छोडऩे का अवसर है, बशर्ते कि वह सोच समझकर कदम उठाए। इस क्षेत्र से जुड़ी चिंताओं पर जानकारी दे रहे हैं अरुणाभ घोष

 
चार वर्ष पहले एक अत्यंत वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने मुझसे पूछा था कि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में हम कितना अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं? उस मुलाकात के कुछ महीने बाद भारत ने 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय किया। अब तक इसमें से 72 गीगावॉट क्षमता स्थापित की जा चुकी है। बोली की प्रक्रिया के पारदर्शी होने से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और देश में नवीकरणीय ऊर्जा की दरें कम हुई हैं। फिलहाल यह दर दुनिया की चंद न्यूनतम दरों में शुमार हैं। अगले सप्ताह भारत नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेशकों के सबसे बड़े सम्मेलन आरई-इन्वेस्ट के दूसरे संस्करण की मेजबानी करेगा। इसके साथ ही साथ भारत समर्थित अंतरराष्ट्रीय सौर गठजोड़ की पहली बैठक भी चलेगी।
 
इस प्रगति के बावजूद देश में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल है। इस क्षेत्र में बीते चार वर्ष में सालाना निवेश 100 करोड़ डॉलर तक का रहा है परंतु दिक्कत यह है कि ये कुल वैश्विक निवेश का केवल 3 फीसदी है। हमें अभी भी इतना निवेश और तकनीकी साझेदारी नहीं हासिल हो पा रही जो हमें एक अलग श्रेणी में पहुंचाए। अब वक्त आ गया है कि भारत नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर नए ढंग से सोचे। अगर भारत 2022 तक ऐसा नहीं भी कर पाता है तो भी यह तय है कि वह आगामी दशक के अंत तक नवीकरणीय ऊर्जा के अपने लक्ष्यों को अवश्य हासिल कर लेगा। ये लक्ष्य देश के ऊर्जा क्षेत्र के बदलाव के लिए एक नई दिशा तय करते हैं। ये लक्ष्य देश के ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की दिशा तय करते हैं। परंतु क्या यह संभावना यह भी है कि नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर प्रतिबद्घता को बदला जाएगा और नीतियां बदली जाएंगी? क्या भारत ने वाकई स्वच्छ ऊर्जा के मिश्रण के लिए जरूरी आर्थिक, पर्यावरण और नीतिगत चीजों को आत्मसात किया है? आम चुनाव अब कुछ ही महीने दूर है, ऐसे में ये सवाल जायज हैं?
 
नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर प्रतिबद्घताओं से पीछे नहीं हटना चाहिए। बल्कि हमें न केवल केंद्र स्तर पर बल्कि हर राज्य, जिले और शहर में नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर मांग बढ़ानी होगी। मांग को परिवार के स्तर पर समेकित किया जा सकता है। इससे मांग आधारित वृद्घि की बुनियाद मजबूत होती है। बिजली खरीद समझौतों की विश्वसनीयता को लेकर एक और किस्म की अनिश्चितता है। सरकारी उपक्रमों की बात करें तो वे अपनी ही सफलता के शिकार हैं। नवीकरणीय ऊर्जा के दाम में तेज गिरावट ने उम्मीद पैदा की है कि हर बार बोली लगने पर दरें और नीचे आएंगी। यही वजह है कि कंपनियां पीपीए पर हस्ताक्षर करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। यह सही नहीं है। या तो हम पारदर्शी बोली में यकीन करें या राज्य सरकार द्वारा तय दरों पर काम करें।
 
हमें यह समझना होगा कि यहां राजनीतिक अर्थव्यवस्था काम कर रही है। गलत खरीद प्रक्रिया, व्यवस्थागत खामियों और क्रॉस सब्सिडी आदि के चलते बिजली उपक्रमों की हालत खस्ता है। अत्यंत संकट से जूझ रही बिजली वितरण कंपनियों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा आकर्षक विकल्प है। ऐसी प्रक्रिया से बोली के लिए उत्साह तो बढ़ रहा है लेकिन उचित मूल्य निर्धारण नहीं हो पा रहा है। डेवलपरों और निवेशकों के बीच भरोसा भी पैदा नहीं हो पा रहा है। हमें न केवल अतीत की दिक्कतें दूर करने के लिए बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी पीपीए गठित करने होंगे। बकाया प्रक्रिया को नकारा नहीं जा सकता है, न ही अनुबंधों की विफलता को।
 
तीसरी बात, प्रोजेक्ट डेवलपरों को यह जोखिम रहता है कि ग्रिड नवीकरणीय ऊर्जा को नहीं भी अपना सकते। अगर पारेषण तंत्र प्रदर्शन के न्यूनतम मानक से भी मेल नहीं खाता है तो भी नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स को कोई हर्जाना नहीं दिया जाता। इतना ही नहीं सारी कटौती केवल तकनीकी वजहों से नहीं होती। जब बिजली वितरण कंपनियां बिजली नहीं खरीदती हैं तो संस्थागत निवेशक इन परियोजनाओं से दूरी बनाने लगते हैं। ऐसे में जबकि देश के लाखों को घरों को पर्याप्त बिजली तक नहीं मिल पा रही है, वैसे में इस्तेमाल न होने वाल हर इलेक्ट्रॉन संसाधन की बरबादी है। जोखिम कम करने और जवाबदेही बढ़ाने के लिए मेरे सहयोगी ग्रिड इंटीग्रेशन गारंटी का डिजाइन तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल डेवलपर्स बल्कि ग्रिड प्लानिंग करने वालों और परिचालकों का जोखिम भी कम होगा। जोखिम का बाजार आकलन को डेवलपरों को बिजली कटौती के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करना चाहिए।
 
चौथी अनिश्चितता सेफगार्ड शुल्क से जुड़ी हुई है। इस महीने सर्वोच्च न्यायालय ने चीन और मलेशिया से आयात होने वाले सोलर सेल्स और पैनल्स पर प्रस्तावित 25 फीसदी के शुल्क पर लगी रोक हटा दी है। एक वर्ष बाद ये कीमतें 20 फीसदी और छह महीने पश्चात 15 फीसदी और घटेंगी। इसका लक्ष्य है घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा देना और चीन से होने वाले सस्ते आयात पर निर्भरता कम करना। प्रोजेक्ट डेवलपर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि घरेलू उपकरणों की लागत बढऩे के कारण उनकी पूर्व बोली वाला टैरिफ अव्यवहार्य हो जाएगा। भविष्य की परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वाले हताश हैं क्योंकि लागत बढ़ रही है और सरकार दरों की बढ़ोतरी की सीमा तय कर रही है।
 
देश की मौजूदा विनिर्माण क्षमता मौजूदा मांग को पूरा नहीं कर सकती। बचाव शुल्क (सेफगार्ड ड्यूटी) से देसी विनिर्माताओं को अस्थायी मदद मिल सकती है लेकिन इससे मजबूत विनिर्माण आधार नहीं तैयार किया जा सकता। भारत ऐसी स्थिति में उलझ चुका है जहां या तो डेवलपरों को सफलता मिलेगी या फिर विनिर्माण को, जबकि हमें दोनों की आवश्यकता है। नीतिगत झटके और अदालती निर्णयों से बात नहीं बनेगी। हमें समूची विनिर्माण मूल्य शृंखला पर विचार करना होगा जिसमें सेल्स, मॉड्यूल, वायर, इन्वर्टर आदि सभी शामिल हैं। नवीकरणीय ऊर्जा केवल सोलर फोटोवोल्टेइक और पवन ऊर्जा तक सीमित नहीं है। सौर ताप तकनीक से भंडारण की जरूरत कम होती है और इससे घरेलू विनिर्माण में मूल्य वृद्धि भी होती है। वित्तीय उपाय अपनाकर जोखिम कम किया जा सकता है या डेवलपरों की ऋण तक आसान पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है। कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा को एकीकृत करने, वितरित उत्पादन और इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग के रूप में नए कारोबार खड़े कर सकती हैं। भविष्य में उच्च तीव्रता वाले औद्योगिक ताप के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा के नए क्षेत्र में निवेश किया जा सकता है।
 
देश में नवीकरणीय ऊर्जा की क्रांति अद्भुत लेकिन आरंभिक स्थिति में है। आने वाले दिनों में हमारे पास अवसर होगा कि हम लक्ष्य को लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराएं, अनुबंधों का मान रखें, घाटा कम करें और नवाचार को बढ़ावा दें। भारत बाजार के अनुकूल सिद्धांतों पर चलता हुआ दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा बाजार बन सकता है। बशर्ते कि वह सही कदम उठाए।
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: power, electric, plant, Renewable energy,
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