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सन 1883-84 में कैसी नजर आती थी दिल्ली?

विवेक देवरॉय /  September 25, 2018

उस वक्त के दिल्ली गजेटियर के मुताबिक उस दौर की दिल्ली में ज्यादा विनिर्माण नहीं होता था और यहां से हिमालय साफ नजर आता था। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विवेक देवरॉय 

 
क्या दिल्ली से हिमालय को देखा जा सकता है? मेरा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि दिल्ली के आकाश से हवाई जहाज से हिमालय दिख सकता है या नहीं। एक वक्त था जब दिल्ली शहर से हिमालय नजर आता था। सन 1883-84 का दिल्ली गजेटियर हमें बताता है, 'दिल्ली की पहाडिय़ां अपने आप में बहुत खूबसूरत नहीं हैं लेकिन यमुना के पार खूबसूरत नजारा दिखता है। अगर मौसम साफ हो तो हिमालय की झलक भी दिख जाती है।' रोहतक की तरह दिल्ली को भी सिंचाई की निरंतर सुविधाएं उस कदर हासिल नहीं थीं। गजेटियर में लिखा गया है कि जिन गांवों में पश्चिमी यमुना नहर से सिंचाई होती थी वहां लोगों के स्वास्थ्य की स्थिति अन्य स्थानों की तुलना में कमतर थी। गजेटियर के मुताबिक, 'डॉ. टेलर ने क्षेत्र में तिल्ली बढऩे की बीमारी का स्पष्ट उल्लेख किया है। उन्होंने स्थानीय कीचड़ और दलदल से उसका निकट संबंध भी बताया है। उनका कहना है कि यहां कई इलाकों में नालियों की आवश्यकता है। जिन गांवों को सिंचाई की बेहतरीन सुविधा मिल पा रही थी वे दरअसल ऐसे गांव थे जहां इस बीमारी के सबसे अधिक मामले सामने आए।'
 
मुझे पूरा यकीन है कि गजेटियर में इसके बाद जो बात सामने आई, वह पूरी तरह अप्रत्याशित है। गजेटियर में कहा गया है, 'बुखार के अलावा नहर से लगने वाले गांवों के जमींदार कहते हैं कि जमीन की सिंचाई के साथ पुरुषों में नपुंसकता की समस्या पैदा हो रही है, हालांकि उनको इसकी वजह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। श्रीमान शेरर ने भी इस संबंध में यही राय प्रकट की।'  नहर सिंचाई वाले गांवों में महिलाओं का संतान रहित होना चर्चा का प्रमुख विषय है और यही वजह है कि अन्य जाट परिवार पानीपत के लोगों के घर अपनी बेटियों का ब्याह करने से हिचकते हैं। हालांकि आमतौर पर नहर के आसपास का पर्यावरण बहुत अच्छा है।' 
 
डॉ. टेलर ने सुना कि पुरुषों में यौन अक्षमता बहुत बड़े पैमाने पर मौजूद है लेकिन महिलाओं में उसी अनुपात में नि:संतानता नहीं देखी गई। गजेटियर के मुताबिक स्थानीय मान्यता भी ऐसी ही है। बल्कि कहा तो यहां तक जाता है कि यहां की महिलाएं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक तंदुरुस्त भी होती हैं। इसके लिए दो वजह दी जाती हैं: पहली बात तो यह कि ये महिलाएं दूसरे गांवों से आती हैं। ये वे गांव होते हैं जो प्राय: नहर के पानी से नहीं सींचे जाते। दूसरी बात, वे पुरुषों से अधिक काम करती हैं। यह थोड़ा अजीब प्रतीत होता है और इसमें आधी सच्चाई है। परंतु इसमें कोई दो राय नहीं है कि नहर से लगे गांवों की महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम सुस्त होती हैं और हतोत्साहित भी नहीं दिखतीं। 
 
दिल्ली में बहुत अधिक विनिर्माण भी नहीं होता था। दिल्ली की विनिर्माण के बड़े केंद्र के रूप में छवि शायद वहां मौजूद आधुनिक उद्योग धंधों की वजह से है। गजेटियर में लिखा गया  है, 'कई उद्योग जिनके लिए आज इस शहर को जाना जाता है वे लखनऊ, गुलबर्ग और हैदराबाद जैसे मुस्लिम इलाकों से संबंध रखते हैं और किसी तरह अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। अब ऐसे लगभग सभी कारोबार हिंदुओं के हाथों में हैं। दिल्ली मुगलों की राजधानी बनने के पहले एक हिंदू शहर था और ऐसा प्रतीत होता है कि संपत्ति और सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव के मामले में वे अपना खोया गौरव हासिल कर रहे हैं। आधुनिक युग में उच्च जातियों का रुझान व्यापार की ओर अधिक है। वे शिल्पकारी के बजाय धन जुटाना चाहते हैं। ऐसे में शहर का विकास तो हो रहा है और उसकी वाणिज्यिक स्थिति जाहिर तौर पर मजबूत हो रही है वहीं इसमें संदेह ही है कि क्या वे कलाएं भी फल-फूल रही हैं जिनसे इसकी ऐतिहासिक पहचान बनी थी।' 
 
बहरहाल, 'उत्पादित वस्तुओं में शायद ही कोई ऐसा आभूषण होगा जिसकी नकल दिल्ली में न होती हो और यहां पर्यटकों के निरंतर आवागमन ने कई तरह के काम पैदा किए हैं जो अनिवार्य तौर पर स्थानीय नहीं हैं। इसमें अंग्रेजी शैली की वस्तुओं का निर्माण भी शामिल है। पीतल, रंगीन कांच और सादे कांच के नकली आभूषण बहुत बड़ी तादाद में यहां बनते और बिकते हैं। इनके माध्यम से कान की देसी बालियों, कंगन और सर पर पहुंचने के आभूषणों आदि का संरक्षण किया गया। ये सभी अक्सर बेहद खूबसूरत होते हैं। साल दर साल बड़ी तादाद में यूरोपीय आभूषणों की नकल देश में आयात होती है। ऐसी चीजों के मामले में प्राय: यह कहना मुश्किल होता है कि कहां जर्मनी और बर्मिंघम समाप्त होते हैं और कहां दिल्ली शुरू होती है। कहने का अर्थ यह है कि पूरा हो चुका आभूषण देखने में एकदम असली आभूषण जैसा नजर आता है।'
 
'आज के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) और दिल्ली (ओरिएंटल) कॉलेज के बीच ऐसा रिश्ता है जिसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। जाकिर हुसैन कॉलेज की स्थापना सन 1692 में की गई थी ताकि दिल्ली कॉलेज की कमी पूरी की जा सके।  निजी सबस्क्रिप्शन के माध्यम से इस कॉलेज को दोबारा शुरू करने की कोशिश बार-बार की गई लेकिन अब तक इस मामले में नाकामी हाथ लगी है। यह कॉलेज मूल रूप से प्राच्य साहित्य, विज्ञान और कला आदि में मुसलमानों की शिक्षा के लिए खोला गया था। ओरिएंटल कॉलेज सन 1792 में खोला गया था और यह दिल्ली के अमीर लोगों की सहायता से चलता था। सन 1824 के आसपास यह कॉलेज एक बेहतर कॉलेज की बुनियाद बना और सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया। इसमें अंग्रेजी का एक विभाग जोड़ा गया जिसे दिल्ली इंस्टीट्यूशन कहा जाता था।'
 
जब भी आप दिल्ली के रेलवे कार्यालय के पास से गुजरें तो यह बात ध्यान रखें। गजेटियर के मुताबिक, 'ईस्ट इंडियन रेलवे का हिस्सा जो जिले से गुजरता है वह उप परिवहन महानिरीक्षक, इलाहाबाद के अधीन है। जबकि सिंध, पंजाब और दिल्ली रेलवे लाहौर के परिवहन महानिरीक्षक के अधीन है। जिले से गुजरने वाला राजपूताना-मालवा रेलवे का हिस्सा अजमेर में रहने वाले प्रबंधक के नियंत्रण में है। इन तीनों रेलवे का मुख्यालय क्रमश: कलकत्ता, लाहौर और अजमेर में है।'
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